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03 July 2017

आईसीएसएसआर प्रमुख को लगता है पाठ्य पुस्तकें जेएनयू जैसे एक्टिविस्ट बना रहीं

क्या सच में पाठ्य पुस्तकें शिक्षा के बजाय जेएनयू टाइप एक्टिविस्ट बना रहीं

सोशल साइंस विषयों को बढ़ावा देने वाली संस्था आईसीएसएसआर के प्रमुख को यह भी लगता है कि जाति आधारित झड़पें और असहिष्णुता बहुत सतही मामले हैं और यह भारतीय समाज पर कोई असर नहीं डालेंगे।  

उनका कहना है, ‘पाठ्यपुस्तकें छात्रों को एक्टिविस्ट बनाने के लिए नहीं होतीं। लेकिन दुर्भाग्य से किताबें आजकल इसी एजेंडा पर चल रही हैं। बृज बिहारी खुद भी एंथ्रोपोलॉजिस्ट रहे हैं। उनका नाम तब प्रमुखता से चर्चा में आया था जब उन्होंने कहा था कि नरेंद्र मोदी से बड़ा असहिष्णुता का शिकार कोई नहीं है। वह उन नक्शों पर भी आपत्ति जताते हैं जिनमें जम्मू और कश्मीर को भारत से अलग दिखाया गया है। या पूर्वोत्तर के राज्य भारत के हिस्से के रूप में नहीं दिखाए जाते। वह कहते हैं कि एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकें पॉलिटिकल एजेंडा के तहत चलती थीं और आंशिक रूप से सामाजिक भिन्नता और अराजक माहौल बनाने में इनका भी योगदान है। 

TAGS: आईसीएसएसआर, बृज बिहारी कुमार, ICSSR, brij bihari kumar
OUTLOOK 03 July, 2017
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