पुस्तक समीक्षा : चंदन किवाड़
लोक की दुनिया में प्रवेश किसी भव्य तोरणद्वार से नहीं होता। वह भीतर की किसी अँधेरी, नम और सुगंधित कोठरी से खुलता है। वहाँ स्मृतियाँ रखी होती हैं, रिश्तों की आहटें, पीढ़ियों से गूँजते स्वर, और उन स्त्रियों की धीमी आवाजें जिन्हें इतिहास ने हाशिए पर रखा। मालिनी अवस्थी की पुस्तक चंदन किवाड़ इसी भीतरी संसार का दस्तावेज है। यह किसी कलाकार की आत्मकथा नहीं है, यह उस सामूहिक चेतना की कथा है जिसके भीतर एक स्वर धीरे धीरे आकार लेता है और फिर सार्वजनिक हो जाता है।
मालिनी अवस्थी को हम एक लोकप्रिय लोकगायिका के रूप में जानते हैं। ठुमरी, कजरी, चैती, सोहर, बिरहा और अवधी, बुंदेली, भोजपुरी अंचलों की लोकधुनों को उन्होंने राष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाया है। पर चंदन किवाड़ में वह मंच की रोशनी से बाहर आती हैं। यहाँ वह अपने भीतर उतरती हैं। गीतों के पीछे छिपी कहानियों, लोकधुनों के जन्म और स्त्रियों के जीवन संघर्षों को वह शब्द देती हैं। यह पुस्तक पढ़ते हुए धीरे धीरे स्पष्ट होता है कि उनके लिए संगीत पेशा नहीं, जीवन की संरचना है।
लोकगीत का प्राणतत्त्व
मालिनी लिखती हैं कि हर गीत में प्राणतत्त्व होता है। वह जब गाती हैं तो उन्हें लगता है कि वह स्वयं नहीं गा रहीं, गीत की नायिका उनके भीतर उतर आती है। यह कथन किसी रहस्यवाद की तरह सुनाई दे सकता है, पर लोक परंपरा को समझने वाले जानते हैं कि लोकगीत व्यक्ति से बड़ा होता है। वह किसी एक कवि की रचना नहीं, सामूहिक अनुभव का संचित स्वर है। उसमें समय की तहें हैं। उसमें जन्म, विवाह, विरह, मृत्यु और उत्सव की स्मृतियाँ हैं।
चंदन किवाड़ का एक महत्वपूर्ण प्रसंग सोहर छापक पेड़ छियुलिया से जुड़ा है। राम के जन्म का उत्सव गाते हुए यह गीत हिरनी की पीड़ा को भी दर्ज करता है। उत्सव के भीतर करुणा की उपस्थिति लोक की नैतिक संवेदना को प्रकट करती है। यह बताती है कि लोकगीत केवल उल्लास का माध्यम नहीं, आत्मालोचन की ध्वनि भी हैं। मालिनी इस बहुस्तरीयता को समझती हैं और पाठक के सामने रखती हैं।
हिंदुस्तानी संगीत परंपरा का संदर्भ
मालिनी अवस्थी की लेखकीय और सांगीतिक विश्वसनीयता को समझने के लिए हिंदुस्तानी संगीत परंपरा की ओर देखना आवश्यक है। यह परंपरा शताब्दियों की साधना पर आधारित है। ध्रुपद से खयाल तक, ठुमरी से टप्पा तक, हर शैली ने समय के साथ रूप बदला पर मूल अनुशासन को बनाए रखा। रागों की संरचना, समय का विधान, तान और आलाप की मर्यादा, यह सब केवल तकनीक नहीं, एक सांस्कृतिक अनुशासन है।
लोक और शास्त्रीय के बीच जो विभाजन हम अक्सर करते हैं, वह ऐतिहासिक रूप से इतना कठोर नहीं है। बनारस घराने की ठुमरी में लोक की मिठास है। दादरा और कजरी लोकधुनों से ही शास्त्रीय मंच तक पहुँचे। मालिनी अवस्थी इसी परंपरा की योग्य उत्तराधिकारी हैं। उन्होंने गुरु गिरिजा देवी से विधिवत शिक्षा प्राप्त की। गिरिजा देवी की गायकी में बनारस का सांस्कृतिक विस्तार था। लोक की सहजता और शास्त्र का अनुशासन एक साथ।
मालिनी की प्रस्तुति में भी यही संतुलन दिखाई देता है। वह लोकगीत को मंचीय रूप देते समय उसकी बोली, उसकी लय और उसकी आंतरिक संवेदना को सुरक्षित रखती हैं। उनके उच्चारण में क्षेत्रीयता की स्वाभाविकता है। उनके सुर में शास्त्रीय प्रशिक्षण का दृढ़ आधार है। यही कारण है कि उन्हें केवल लोकप्रिय कलाकार नहीं, गंभीर साधिका के रूप में स्वीकार किया गया। पद्मश्री सम्मान और राष्ट्रीय मंचों पर उनकी निरंतर उपस्थिति उनकी साधना की सार्वजनिक स्वीकृति है। जब वह लोकगीतों के अर्थ और उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर लिखती हैं तो वह बाहरी टिप्पणी नहीं, भीतर की अनुभूति होती है।
स्त्रियों की स्मृति और इतिहास
चंदन किवाड़ का सबसे मार्मिक पक्ष स्त्रियों के जीवन प्रसंग हैं। दन्नो बुआ दमयंती जैसी स्त्रियाँ, जिनकी जिंदगी अभावों और संघर्षों से भरी रही, पुस्तक में जीवंत हो उठती हैं। गुरु गिरिजा देवी की गुरु बहन छुन्नी का प्रसंग एक बड़ी सांस्कृतिक विडंबना की ओर संकेत करता है। वह राग चारुकेशी अद्भुत गाती थीं, पर पारिवारिक जिम्मेदारियों ने उन्हें गुमनाम कर दिया। यह केवल एक कलाकार की कथा नहीं, उस सामाजिक संरचना का प्रतिबिंब है जहाँ स्त्री प्रतिभा अक्सर निजी दायित्वों के नीचे दब जाती है।
लोकगीतों की नायिकाएँ भी ऐसी ही हैं। वे विरह में हैं, प्रतीक्षा में हैं, पराजित नहीं हैं। वे साहस और कर्तव्य की प्रतिमाएँ हैं। मालिनी इन स्त्रियों को केवल गाती नहीं, उन्हें समझती हैं। उनकी कहानियों को शब्द देती हैं। इस अर्थ में चंदन किवाड़ लोक की स्त्री वाचक स्मृति का पुनर्लेखन है।
साहित्य और लोक का संवाद
मालिनी अपने अनुभवों को व्यापक साहित्यिक संदर्भों से भी जोड़ती हैं। संस्कृत साहित्य, हिंदी लेखकों और रवींद्रनाथ टैगोर की शेषेर कोबिता का उल्लेख पुस्तक में आता है। यह संकेत है कि उनके भीतर का पाठक और विचारक भी सक्रिय है। लोक और शास्त्र को वह दो अलग संसारों की तरह नहीं देखतीं। उनके लिए यह एक ही सांस्कृतिक प्रवाह की अलग अलग धाराएँ हैं।
उनकी भाषा में भावुकता है, पर वह असंयमित नहीं है। स्मृति का ताप है, पर विवेक भी है। कई प्रसंग ऐसे हैं जहाँ लगता है कि इस विषय पर स्वतंत्र पुस्तक लिखी जा सकती है। गुरु गिरिजा देवी पर उनका लेखन विस्तृत रूप की माँग करता है। लोक कलाकारों के जीवन पर अलग से काम हो सकता है। यह अधूरापन नकारात्मक नहीं, संभावनाशील है।
एक निजी प्रसंग
साल 2022 में भुवनेश्वर के कलिंग लिट फेस्ट में मुझे सुविख्यात कवि और संस्कृति चिंतक व्योमेश शुक्ल के साथ मालिनी अवस्थी की एक बातचीत क्यूरेट करने का अवसर मिला। वह सत्र मेरे लिए केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम नहीं था, एक सांस्कृतिक अनुभव था। व्योमेश जी प्रश्नों को सतही नहीं रहने देते। वह कलाकार को उसके आत्मा तक ले जाते हैं। उस शाम उन्होंने मालिनी से लोक, शास्त्र, स्त्री स्मृति और संगीत की आध्यात्मिकता पर बात की।
मालिनी ने जिस सहजता से अपने अनुभव साझा किए, वह उल्लेखनीय था। उन्होंने बताया कि लोकगीत उनके लिए प्रदर्शन नहीं, संवाद है। व्योमेश जी ने उस संवाद को विस्तार दिया। बातचीत केवल प्रश्न उत्तर तक सीमित नहीं रही। वह लोक संस्कृति की वैचारिक पड़ताल बन गई। उस सत्र के बाद मुझे लगा कि चंदन किवाड़ जैसी पुस्तक उसी संवाद का स्वाभाविक विस्तार है। मंच पर जो विचार मुखर थे, पुस्तक में वे व्यवस्थित रूप लेते हैं।
लोक का वर्तमान
चंदन किवाड़ को पढ़ते हुए यह स्पष्ट होता है कि लोक अतीत की वस्तु नहीं है। वह संग्रहालय में बंद नहीं है। वह प्रवासी भारतीयों की स्मृतियों में है। मॉरीशस के विश्व भोजपुरी सम्मेलन का प्रसंग बताता है कि लोकधुनें समुद्र पार भी जीवित रहती हैं। वे पहचान का आधार बनती हैं। लोकगीत समय के साथ बदलते हैं, पर उनका मूल भाव बना रहता है।
मालिनी अवस्थी की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उन्होंने लोक को आधुनिक मंच पर प्रतिष्ठा दी और फिर उसे शब्दों में दर्ज किया। यह कार्य आसान नहीं था। लोकप्रियता और गंभीरता के बीच संतुलन साधना कठिन है। पर उन्होंने यह संतुलन साधा है।
चंदन की सुवास
चंदन किवाड़ एक पुस्तक से अधिक है। यह स्मृति की सुगंध है। यह उस सांस्कृतिक परंपरा का लेखा है जो हमारे भीतर अनसुनी पड़ी रहती है। मालिनी अवस्थी ने अपने छह दशकों के जीवन और दशकों की संगीत साधना को शब्दों में ढाला है। यहाँ गीत केवल सुर नहीं हैं, अनुभव हैं। यहाँ स्त्रियाँ केवल पात्र नहीं, इतिहास की वाहक हैं। यहाँ हिंदुस्तानी संगीत परंपरा केवल तकनीक नहीं, सांस्कृतिक आत्मा है।
इस पुस्तक को पढ़ना अपने भीतर के लोक से मिलना है। चंदन की महक धीरे धीरे खुलती है। किवाड़ धीरे से खुलता है। और पाठक को अहसास होता है कि वह जिस संगीत को बाहर सुनता था, वह दरअसल उसके भीतर भी गूँज रहा है। यही इस पुस्तक की असली शक्ति है।
पुस्तक : चन्दन किवाड़
लेखिका : मालिनी अवस्थी
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
मूल्य : रु. 325/
(आशुतोष कुमार ठाकुर एक मैनेजमेंट प्रोफेशनल हैं, साहित्य और कला पर नियमित लिखते हैं।)