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03 November 2019

यूपी पॉवर सेक्टर इम्पलॉइज ट्रस्ट के कर्मचारियों का आरोप- घोटाले को दो महीने से दबाए थे आला अधिकारी

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उत्तर प्रदेश में पॉवर सेक्टर इम्पलॉइज ट्रस्ट के 26 सौ करोड़ रुपए के घोटाले में मौजूदा सरकार के आला अधिकारियों की गर्दन भी फंसती नजर आ रही है। जुलाई माह में घोटाले की शिकायत पर ट्रस्ट के अध्यक्ष और यूपीपीसीएल के चेयरमैन आलोक कुमार ने एक जांच समिति गठित की थी। रिपोर्ट 29 अगस्त को आ गई थी। कर्मचारियों का आरोप है कि रिपोर्ट के ही आधार पर जीएम पीके गुप्ता को निलंबित किया गया था, लेकिन मामला सार्वजनिक ना हो इसलिए इसे दबाए रखा गया।

ऊर्जा मंत्री श्रीकान्त शर्मा ने मामले को लेकर पिछली सरकार को दोषी ठहराया है कि घोटाले की नींव 2014 में रखी गई थी और इसे 2016 में आगे बढ़ाया गया। 19 मार्च को वर्तमान सरकार ने शपथ ग्रहण किया था और उसके ठीक दो दिन पहले यानि 17 मार्च को निजी कंपनी डीएचएफएल में निवेश शुरू कर दिया गया।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि प्रदेश में जब सरकार ने 19 मार्च 2017 से कामकाज संभाल लिया था तो क्यों नहीं इस आदेश को बदला गया? ढाई साल तक बिना आला अधिकारियों की जानकारी के निजी कंपनी में निवेश होता रहा? इससे भी बड़ा सवाल यह है कि बिना ट्रस्ट की मीटिंग के निवेश कैसे होते रहे? 'आउटलुक' के इन सवालों के जवाब ऊर्जा मंत्री नहीं दे पाए। उन्होंने इतना कहा कि मामले में जो भी दोषी होगा, उसे बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वह कितना भी बड़ा हो।ऊर्जा मंत्री के बयान के बाद सपा ने ट्वीट कर कहा कि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी सत्ता नए नए पत्रों से जनता का ध्यान भटका रही है। द्वेष की राजनीति के चलते झूठे आरोप लगा रही। डीएचएफएल से 20 करोड़ का चंदा लेने वाले भाजपा के मंत्री शर्मा जी आप बताएं ये रिश्ता क्या कहलाता है?

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शिकंजे में पॉवर कॉरपोरेशन के आला अधिकारी

विद्युत् कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने निष्पक्ष जांच के लिए घोटाले में प्रथम दृष्टया दोषी पॉवर कारपोरेशन प्रबंधन के चेयरमैन और एमडी को तत्काल हटाने और उन पर कठोर कार्यवाही की मांग की है। पॉवर सेक्टर इम्प्लॉइज ट्रस्ट का पुनर्गठन किया जाए और उसमें पूर्व की तरह कर्मचारियों के प्रतिनिधि को भी शामिल करें। साथ ही कर्मचारियों के देयों के भुगतान की जिम्मेदारी सरकार ले।

संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने सवाल किया कि जब 10 जुलाई को हुई एक अनाम शिकायत पर पॉवर कॉरपोरेशन प्रबंधन ने जांच बैठाई और 29 अगस्त को जांच रिपोर्ट मिल गई तो आज तक किसे बचाने के लिए पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन चुप्पी साधे बैठा था। दूसरा सवाल यह कि 17 मार्च 2017 को डीएचएफएल में पहला निवेश किया गया था, जिसकी अनुमति सरकार के प्रेस नोट के अनुसार चेयरमैन और एमडी से नहीं ली गई, किन्तु मार्च 2017 के बाद भी डीएचएफएल में निवेश कैसे और किसकी अनुमति से होते रहे। यदि यह निवेश चेयरमैन की अनुमति से हुए तो उन पर कार्यवाही क्यों नहीं की गई और यदि यह निवेश उनके संज्ञान के बिना किए गए तो भी ड्यूटी की घोर लापरवाही के चलते उन पर क्या कार्यवाही की गई। कुल निवेश 4122.70 करोड़ का है, जिसमें 2268 करोड़ डूब गया है। तीसरा सवाल यह कि तीन साल से ट्रस्ट की कोई मीटिंग क्यों नहीं की गई और बिना मीटिंग के निवेश कैसे होते रहे। पॉवर कॉरपोरेशन के चेयरमैन ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं और एमडी ट्रस्टी हैं, तो कौन जिम्मेदार है। चौथा सवाल यह कि पॉवर कॉरपोरेशन की जांच समिति की रिपोर्ट में साफ लिखा है कि निवेश में अनियमितता की गई है और 99% निवेश तीन कंपनियों में किया गया है, जिसमें 85% निवेश डीएचएफएल में किया गया है। 29 अगस्त की  रिपोर्ट पर पावर कारपोरेशन प्रबंधन ने अब तक कार्यवाही क्यों नहीं की। पांचवां सवाल यह कि 25 जनवरी 2000 के मुख्यमंत्री के साथ हुए समझौते के अनुसार ट्रस्ट में कर्मचारियों का कोई प्रतिनिधि क्यों नहीं रखा गया। विद्युत् कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति मांग की है कि पॉवर कारपोरेशन प्रबंधन ट्रस्ट में जमा धनराशि और उसके निवेश पर तत्काल एक श्वेतपत्र जारी करे, जिससे यह पता चल सके कि कर्मचारियों की गाढ़ी कमाई की धनराशि कहां-कहां निवेश की गई है।

आला अधिकारियों खिलाफ जांच कराने की मांग

पॉवर ऑफिसर्स एसोसिएशन ने 2017 से लेकर अब तक ट्रस्ट में अध्यक्ष से लेकर उच्च प्रबन्धन में शामिल ट्रस्टियों को उनके पदों से हटाने की मांग की है। एसोसिएशन ने सरकार से मांग की है कि वर्ष 2017 से लेकर अब तक जो प्रबन्धन ऊर्जा विभाग और अन्य कहीं भी किसी अन्य विभाग में तैनात हैं, उसे अविलम्ब पद से हटाकर उनके खिलाफ जांच के आदेश दिए जाएं, जिससे प्रबन्धन का कोई भी अधिकारी जांच को प्रभावित न कर सके।

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TAGS: Uttar Pradesh, autohorities, up power sector employees
OUTLOOK 03 November, 2019
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