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12 January 2016

चर्चा: मंदिर के साथ कल्याण | आलोक मेहता

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परिषद या उसकी मातृ संस्‍था राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ राजनीति को दलदल से अलग नहीं मानती हैं। लेकिन उसके साथी अथवा बिछुड़े बंधु भारतीय जनता पार्टी के साथ सत्ता के शिखर तक पहुंचे हैं। इसलिए मंदिर निर्माण के ‘पुण्य कार्य’ से गांवों में धूमधाम के साथ 2017 में भाजपा को विधानसभा चुनाव में भी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष ‘सवारी’ निकालने का पुण्य अर्जित होगा। मंदिर शताब्दियों से उपासना के केंद्र रहे हैं। हमने अपने बचपन में गांव के मंदिर सामाजिक समरता की दृष्टि से ग्रामीणों को दुःख-सुख में साथ मिलकर रहने, सुबह-शाम आरती के बाद किसी भेदभाव के बिना प्रसाद ग्रहण करते देखा है। मंदिर में देवी-देवताओं के समक्ष लगने वाले भोग से पुजारियों के साथ मंदिरों के आसपास जमा गरीब लोगों की क्षुधा शांत करने की व्यवस्‍था हो जाती थी। मेरे दादा और नाना कहते थे कि भारतीय परंपरा के अनुसार मंदिरों के प्रागंण अथवा परिसर में बच्चों के लिए गुरुकुल-पाठशाला और सामान्य जनों के लिए चिकित्सा केंद्र का प्रावधान रहा है।

इसी तरह मस्जिदों के साथ मदरसे और हकीम साहब के दवाखाने, गिरिजाघरों के साथ स्कूल और मुफ्त दवा बांटने वाले डॉक्टर-नर्स, बौद्ध मठों में भी शिक्षा-चिकित्सा, जैन मंदिरों के इर्द-गिर्द महावीर शिक्षा केंद्र, गुरुद्वारों के साथ हर आगंतुक के लिए लंगर और बच्चों के लिए शैक्षणिक केंद्र की व्यवस्‍था रही है। सचमुच यह कितनी आदर्श बात है। सरकारी निर्भरता के बिना गांव-कस्बों में सुख-शांति के इंतजाम हो सकते हैं। लेकिन प्रगति के साथ उपासना के केंद्र राजनीतिक और कुछ हद तक सांप्रदायिक शक्ति केंद्र बन गए। मंदिर आंदाेलन ने तो सत्ता हटाने-बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।सत्ता कांग्रेस की रही हो या प्रगतिशील गठबंधन अथवा भाजपा नेतृत्व वाली गांवों के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता घोषित होती रही।

फिर भी साढ़े छः लाख गांवों में से हजारों गांवों में अब तक शौचालयों, न्यूनतम शिक्षा के लिए पाठशाला और प्राथमिक चिकित्सा केंद्र उपलब्ध नहीं हो पाए। वर्तमान भाजपा सरकार ने भी ‘शौचालय निर्माण’ का कार्यक्रम तेज किया है। लेकिन स्कूल-अस्पताल के लक्ष्य पूरे करने में अभी अगले चुनावों तक प्रतीक्षा करनी होगी। इस दृष्टि से विश्व हिंदू परिषद ही नहीं अन्य धर्मों-संप्रदायों की संस्‍थाएं लाखों गांवों में उपासना केंद्रों के साथ शिक्षा और प्राथमिक चिकित्सा की सु‌विधा वाले केंद्र भी बनाने का संकल्प क्यों नहीं ले लेती? वहीं एक संकल्प तो अनिवार्य है कि किसी उपासना केंद्र से अफवाह फैलाकर किसी मासूम की जान लेने का प्रयास कभी नहीं होगा, क्योंकि उससे बड़ा पाप कोई नहीं है।

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TAGS: विश्‍व हिंदू परिषद, उत्‍तर प्रदेश, मंदिर निर्माण, रामनवमी, जन कल्‍याण, राजनीति, सांप्रदायिकता, आलोक मेहता
OUTLOOK 12 January, 2016
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