केरल: सबरीमाला का फिर लंबा साया
चुनाव के वक्त सुप्रीम कोर्ट की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के मुद्दे पर फिर सुनवाई के फैसले से सत्ताधारी वाम मोर्चा अपने रुख में बदलाव को लेकर सवालों के घेरे में
साढ़े सात साल बाद सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा केरल में फिर राजनैतिक हलचल पैदा कर रहा है। सबरीमाला समीक्षा याचिका में उठाए गए मुद्दों पर सप्रीम कोर्ट ने 7 अप्रैल से सुनवाई का फैसला किया है। इससे सत्ताधारी वाम लोकतांत्रिक मोर्चा सरकार नई मुश्किल में फंस गई है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के नेतृत्व वाली सरकार अब कोर्ट के सामने अपना रुख जाहिर करने के लिए मजबूर हो सकती है। सरकार ने पहले महिलाओं के प्रवेश मामले में खुलकर पक्ष लिया था, लेकिन हाल के वर्षों में उसका रुख नरम होता गया है। 2018 में वाम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अमल करने की पूरी कोशिश की थी। उस फैसले में अदालत ने रजस्वला उम्र की महिलाओं समेत हर उम्र की महिलाओं को मंदिर प्रवेश की इजाजत दी थी।
अब समीक्षा याचिका के लिए प्रधान न्यायाधीश ने नौ न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ का गठन किया है। कोर्ट ने सभी पक्षकारों से मार्च तक अपनी राय देने को कहा। इसलिए केरल सरकार और त्रावणकोर देवासम बोर्ड को फिर मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर अपनी राय देनी पड़ सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के 2018 के फैसले का विरोध कर रहे जाति समूहों ने सरकार से अपना रुख बदलने और सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के प्रवेश का विरोध करने की अपील की। कांग्रेस ने कहा कि वह परंपरा बनाए रखने के पक्ष में है। उसका रुख आज भी कायम है। माकपा ने तब फैसले के पक्ष में आक्रामक रुख अपनाया था, लेकिन अब नरम पड़ गई है। सत्ताधारी पार्टी इधर संकेत दे रही है कि वह 2018 के अपने प्रगतिशील रुख पर कायम नहीं रहेगी।
अदालत के 2018 के फैसले से केरल का समाज बंट गया था। कई रूढ़िवादी जाति समूह और संगठन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतर आए थे। आंबेडकरवादी गुट सहित वामपंथी और प्रगतिशील ताकतों ने फैसले का स्वागत किया था। आरएसएस ने शुरू में फैसले का समर्थन किया था, लेकिन बाद में पलट गया और धार्मिक रीति-रिवाजों के पक्ष में हिंसक विरोध किया।
वाम मोर्चे को 2019 के लोकसभा चुनाव में बड़ी हार का सामना करना पड़ा। उसे सिर्फ एक सीट मिली। कांग्रेस बड़ी विजेता बनकर उभरी। चुनावी हार के बाद वाम मोर्चा ने अपना रुख नरम किया और खुद को परंपरा का रक्षक बताने की कोशिश की। पिछले साल हुआ ग्लोबल अयप्पा कॉन्क्लेव समाज के रूढ़िवादी तबकों को साधने की उसकी कोशिशों में सबसे नया था।
सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर ऐसे वक्त पुनर्विचार करने जा रहा है, जब माकपा सरकार सबरीमाला सोना चोरी केस और रुपये-पैसे के गबन के आरोपों से जूझ रही है। कन्नूर विश्वविद्यालय की इतिहासकार डॉ. मालविका बिन्नी कहती हैं, “चुनाव पास हैं, इसलिए मुझे उम्मीद नहीं है कि सरकार खासकर हाल के स्थानीय निकाय चुनावी नतीजों के बाद सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर कोई प्रगतिशील रुख अपनाएगी। बेशक, नारीवादी होने के नाते मैं चाहूंगी कि सरकार न सिर्फ महिलाओं के प्रवेश के अधिकार का साथ दे, बल्कि महिलाओं के प्रदर्शन के दौरान किए गए वादों पर भी खड़ी रहे। समानता के अधिकार को चुनावी राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए, लेकिन बदकिस्मती से वह जुड़ा हुआ है।”
सबरीमाला पर 2018 के फैसले के बाद मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने स्त्री-पुरुष समानता के लिए बड़ा अभियान चलाया, जिसमें सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की इजाजत देने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले को केरल के पुनर्जागरण आंदोलन का हिस्सा बताया गया। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी इस मुद्दे पर अपना स्टैंड नहीं बदलेगी, भले ही उसे चुनाव में हार का सामना करना पड़े। लेकिन बदलते समय ने साबित कर दिया कि यह संकल्प से ज्यादा बयानबाजी थी।
हालात ये हो गए कि वही मुख्यमंत्री बाद में अयप्पा कॉन्क्लेव में आस्तिक गुणों को बताने के लिए भगवद गीता का जिक्र करते देखे गए। संस्कृत विद्वान तथा लेखक डॉ. टी.एस. श्याम कुमार कहते हैं, “आज, कोई भी सरकार से सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर प्रगतिशील रुख अपनाने की उम्मीद नहीं करता है। असल में, सरकार के हाल के कदमों ने रूढि़वादी ताकतों को बढ़ावा दिया है।”
वाम मोर्चे ने 2019 में चुनावी हार से शायद यह नतीजा निकाला कि महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में उसके सख्त रुख की वजह से ही झटका लगा। उसके बाद पार्टी ने घर-घर पहुंचकर और कई तरह के कार्यक्रम चलाकर लोगों को भरोसा दिलाया कि उनके पुराने रीति-रिवाजों के खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाएगा। इस बदलाव का नतीजा ग्लोबल अयप्पा सम्मेलन में दिखा। वाम मोर्चे के एक समर्थक नाम न जाहिर करने की शर्त पर कहते हैं, “माकपा के रुख में बदलाव से फिर साबित होता है कि वैचारिक प्रतिबद्धता का दावा करने वाली कोई भी पार्टी, वामपंथी सहित, समाज में जमी रूढ़ि को चुनौती देने की हिम्मत नहीं करती।”
महिला अधिकार एक्टिविस्ट डॉ. सुजा सुसान जॉर्ज कहती हैं, “अलग-अलग समूहों से दबाव हो सकता है, लेकिन इंसाफ की बात करने वाले वामपंथी होने के नाते, मैं अब भी उम्मीद करती हूं कि सरकार सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं के अधिकारों का बचाव करेगी।” उनके मुताबिक, सरकार को संवैधानिक मूल्यों के हिसाब से रुख अपनाना चाहिए।
जब यह पूछा गया कि अब सुप्रीम कोर्ट में सरकार का क्या रुख होगा? माकपा के राज्य सचिव एम.वी. गोविंदन ने टालमटोल की। उनका कहना था, “बदलाव के अलावा सब कुछ बदलेगा।” उन्होंने साफ तौर पर यह नहीं बताया कि सबरीमाला पर पार्टी क्या रुख लेगी। उनके चेहरे पर बेचैनी साफ दिख रही थी। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, सरकार महिलाओं के प्रवेश पर अस्पष्ट रुख अपना सकती है। श्याम कुमार कहते हैं, “यह भी प्रगतिशील ताकतों के लिए झटका है। इससे रूढि़वादी लोगों को भी हिम्मत मिलेगी।”
इस मुद्दे पर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसी पार्टियों में माकपा जैसी कोई उलझन नहीं दिखती। ये पार्टियां लगातार पहाड़ी मंदिर में महिलाओं के पूजा करने के अधिकार का विरोध करती हैं।
वी.एस. अच्युतानंदन के नेतृत्व में वाम मोर्चा सरकार ने 2006 में सुप्रीम कोर्ट को सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के पक्ष में अपनी राय जताई थी।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश और उस समय राज्य सरकार के समर्थक रुख का कड़ा विरोध करने वाली नायर सर्विस सोसाइटी (एनएसएस) सरकार के बदले हुए नजरिए से खुश है। एनएसएस के महासचिव सुकुमारन नायर ने कहा, ‘‘सरकार ने खुलकर रुख बदलने की बात नहीं मानी है, लेकिन उनके काम से साफ है।’’ माकपा-भाजपा दोनों से रिश्ते वाले एसएनडीपी ने सरकार से मंदिर में रजस्वला महिलाओं के प्रवेश का विरोध करने की अपील की।
यह मामला ऐसे समय पर खुलेगा, जब राज्य में चुनाव प्रचार चल रहा है। प्रगतिशील ताकतें और बुद्धिजीवी माकपा की भले आलोचना करें कि सरकार रूढि़वादी दबावों के आगे झुक गई है, लेकिन पार्टी इस बड़े चुनाव में अपनी प्रगतिशील पहचान दिखाने के मूड में नहीं दिखती। फिर भी, तय है कि सरकार के रुख में किसी भी तरह के बदलाव को निशाने पर लेंगे और उसका राजनैतिक फायदा उठाने की कोशिश करेंगे।