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10 January 2026

बीता बरस/क्या-क्यों खोजाः गूगल उस्ताद के शागिर्द

बीता बरस/क्या-क्यों खोजाः गूगल उस्ताद के शागिर्द

बस किसी शब्द, मीम या किसी चैलेंज के आने की देर रहती हैं, उसके बाद की पूरी जिम्मेदारी सर्च इंजन की होती है, जो है हर मर्ज की दवा

गूगल और यूट्यूब की ‘ईयर इन सर्च’ की सूची क्या हमारे समय, हमारी बैचेनी और उम्मीदों का आईना कहला सकती है। क्रिकेट स्टार से लेकर रेसिपी तक, बेवसीरीज से लेकर, ‘हाउ टू’ तक। 2025 में देश के लोगों ने गूगल से बहुत कुछ पूछा, यूट्यूब पर बहुत देखा। कुछ के बारे में इतना पूछा कि वे ‘मोस्ट सर्च्ड’ की सूची में अव्वल आ गए। क्या पूछा और क्यों पूछा, यह शायद बेमानी है, अलबत्ता इस खोज में लोगों की चाहतें और मनोविज्ञान का मोटा अंदाजा शायद लगता है।

यह कयास भी बेमतलब नहीं कि जो पूछा, वह जिज्ञासा से ज्यादा समय बिताने की कवायद या बैठे-ठाले दिलबहलाव जैसी थी। हमेशा फोन हाथ में रहने पर हम शायद भूल ही गए हैं कि फोन देखने और हर छोटी-छोटी बात को ‘सर्च’ करने के सिवाय भी हमारे पास बहुत से काम हैं।

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तमाम जानकारियों की खोज से यह भी लगता है कि गूगल के सर्च इंजन ने और यूट्यूब के सर्च बार ने जीवन में इतनी विश्वसनीयता हासिल कर ली है कि अब हम शायद ही किसी पर इतना भरोसा करते हों, जितना इन दोनों पर करते हैं। गूगल का जवाब, ‘भरोसे का दूसरा नाम’ है।

इस खोज के पीछे एक कारण और भी है, यहां लोग वह बात भी पूछ सकते हैं, जो वे खुलकर किसी से नहीं पूछते। अपने डर, जिज्ञासा, मामूली सी कोई रेसिपी, भविष्य, खुद को मोटिवेट करने के लिए कोई सलाह, मन के द्वंद्व, यानी जो आप सोच सकते हैं, वह सब कुछ।

2025 की “सबसे ज्यादा खोजी गई” सूची इस बात का संकेत है कि यह साल सितारों का नहीं, संभावनाओं का था। हर संभावनाशील व्यक्ति के बारे में खोज ने उन संभावनाओं को भी सितारा बना दिया। ऐसा ही एक सितारा है, वैभव सूर्यवंशी, जिसे लोगों ने इतना खोजा कि वह इंटरनेट पर सर्च की गई सबसे बड़ी शख्सियत बन गया। इस सूची में, ज्यादातर क्रिकेटर थे। वैभव सूर्यवंशी के अलावा, प्रियांश आर्य, अभिषेक शर्मा, जेमिमा रोड्रिग्स, आयुष म्हात्रे, स्मृति मंधाना, करुण नायर, उर्विल पटेल, विग्नेश पुथुर के बारे में लोगों की उत्सुकता चरम पर थी। आखिर कौन हैं ये लोग, कहां से आते हैं, यहां तक कैसे पहुंचे वह सब कुछ लोग जानना चाहते थे। 

वैभव कथा

इस सूची में सबसे ऊपर वैभव सूर्यवंशी रहे। ऐसा नाम जिसने साबित किया कि भारत अब सिर्फ स्थापित नायकों को नहीं, बल्कि आने वाले कल को खोज रहा है। लोग उन्हें इसलिए नहीं खोज रहे थे कि उन्होंने क्या हासिल किया है, बल्कि इसलिए कि वे क्या बन सकते हैं। यह खोज भारतीय मध्यवर्ग की सामूहिक कल्पना का नतीजा भी है, ‘‘अगर वह कर सकता है, तो हमारा बच्चा भी कर सकता है।’’

जब समाज अपने आने वाले कल को लेकर बेचैन रहता है, तो वह सबसे पहले उभरते चेहरों को ही खोजता है। स्थापित लोगों का आकर्षण रहता है लेकिन स्थापित होने के बाद तो बहुत सी कहानियां गढ़ी भी जा सकती है। इसलिए नए चेहरे के बारे में सब कुछ जान लेना इस खोज में सबसे अव्वल हो जाता है।

करुण नायर जब इस सूची में आए, तो यह कमबैक का आकर्षण था। जीवन में हर व्यक्ति चाहता है कि उसे जिंदगी दूसरा मौका जरूर दे। इसमें करुण नायर से अच्छा उदाहरण भला और कौन हो सकता था। करुण नायर की खोज बताती है कि भारत को आज भी वापसी की कहानियों पर भरोसा है। यह सिर्फ खेल या खिलाड़ी का सवाल नहीं था। यह खेल से ज्यादा जीवन का सवाल है, गिरने के बाद उठ पाने का सवाल। सब जानना चाहते थे कि आखिर करुण नायर ने यह कैसे कर दिखाया। उनके लिए फिल्मी संवाद को बदल कर कहा गया, ‘‘हार कर जीतने वाले को करुण नायर करते हैं।’’

सर्च का कोई पैटर्न या तयशुदा फार्मूला नहीं होता। कई बार सिर्फ स्क्रॉल करते-करते रील में दिख रही कुछ अजीबो गरीब चीज को सर्च करने से भी कुछ चीजें, ‘वायरल’ हो जाती हैं। फिर ये ऐसी वायरल होती हैं कि साल के आखिर में ट्रेंडिंग सर्च में आ जाती हैं। वेबसीरीज, किसी फिल्म का कोई संवाद, खाना बनाने का कोई ढंग, कोई मामूली सी रेसिपी, मोबाइल की रोशनी में कांच के गिलास में हल्दी डालने जैसी बिना सिर-पैर की कोई हरकत कुछ भी। यह कुछ भी हो सकता है।

लोग सिर्फ यह नहीं खोजते कि सीरीज अच्छी है या बुरी, वे यह भी खोजते हैं कि इसे बनाने के बीचे मकसद क्या है, इसका अंत ऐसा ही क्यों है, क्या यह असली कहानी पर है, ये किस सच्चाई की ओर इशारा करती है। ऐसी खोज एक बार होती है, तो खबरें बनती हैं और बहुसंख्यक लोग जिन्हें उस बात से मतलब भी नहीं रहता वे भी इस भेड़चाल में शामिल हो जाते हैं। क्योंकि ‘‘अरे, ये नहीं पता?’’ सुनना किसी को अच्छा नहीं लगता।

सामूहिक प्रक्रिया

सर्च करना सामूहिक प्रक्रिया है। आज दर्शक अकेले कुछ नहीं देखता। वह पूरे समाज के के साथ किसी कहानी को देखते है। जीवन में कितना भी खालीपन या अकेलापन हो, लेकिन गूगल और यूट्यूब के जरिए सब एक रहते हैं, अपने-अपने मोबाइल फोन के जरिये। आखिर क्यों कोई रील या वेब सीरीज ज्यादा खोजी गई? यह जानना सबके लिए जरूरी रहता है। सत्ता, अपराध, रिश्तों पर सोशल मीडिया में खुलकर बात होती है, तब दर्शक सिर्फ मनोरंजन में नहीं बल्कि बहस में भी भागीदार होते हैं। यह बहस इडली पर भी हो सकती है। इडली कब खाना चाहिए, कैसे खाना चाहिए पर भी इंटरनेट पर सैकड़ों रील डली हुई हैं। यहां स्वाद से ज्यादा सुकून की खोज रहती है। फिर यही इडली सबसे ज्यादा खोजी गई रेसिपी के रूप में ट्रेंड करने लगती है। फिर कोई इससे आगे बढ़ कर ‘आसान घर का खाना’ खोजने लगता है। फिर त्योहारों की मिठाइयां और झटपट बनने वाले स्नैक्स, फास्ट फूड के हेल्दी विकल्प ट्रेंडिंग में आ जाते हैं। रेसिपी सर्च करना अक्सर हल्का विषय लगता है, लेकिन यह सबसे गहरी खोजों में से एक है। जब दुनिया में अनिश्चितता हो, तो रसोई वह जगह बन जाती है जहां कुछ बातें वाकई आपके नियंत्रण में रहती हैं। भोजन बनाने का भी एक मनोविज्ञान है। खाना बनाना और उसका तरीका खोजना चिंता को कम करने का एक मनोवैज्ञानिक तरीका है।

सवालों में छुपी बेचैनी

आप गूगल के सर्च बार पर ‘हाउ टू’ लिखिए। नीचे तुरंत सवालों के विकल्प आने लगेंगे। आपको इनमें से बस एक चुनना है। भारत तो छोड़िए दुनिया में कहीं भी हाउ टू से शुरू होने वाले सवाल कभी ट्रेंड से बाहर नहीं होंगे।

भारत को नई साझा भाषा देने वाले यूट्यूब ट्रेंड

यूट्यूब पर अब मिस्टर बीस्ट धाराप्रवाह तेलुगु बोलते हैं, राज शमानी अपने पॉडकास्ट से दुनिया के बड़े व्यापारिक दिग्गजों को मुख्यधारा में ले आए हैं, लोग मराठी गायक और संगीतकार संजू राठौड़ के हिट गाने को गुनगुनाना चाहते हैं, केएल ब्रो बिजू ऋत्विक की कहानियों के सब दीवाने हैं, इटैलियन ब्रेनरोट जैसा एक अवास्तविक मीम ट्रेंड है, जिसके बारे में किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा लेकिन यह बस ट्रेंड बन गया है।

भारतीय इंटरनेट की नई साझा शब्दावली ने यूट्यूब पर आकार लिया है। 2025 में, कंटेंट एक साथ वैश्विक, स्थानीय और सार्वभौमिक हो गया है। भारत के रचनाकार अब क्षेत्रीय बारीकियों तक सीमित नहीं हैं, वे इन बारीकियों को और आगे बढ़ा रहे हैं। एआई के इस युग में, तुंगतुंगतुंग सहुर के अतार्किक आकर्षण पर सिर्फ विचार ही किया जा सकता है। एक वैश्विक मीम, जिसे रचनात्मक लोगों ने स्थानीय बना दिया है। यह डिजिटल शब्दावली इतनी शक्तिशाली है कि भारत में 68 फीसदी जेनरेशन जेड इन डिजिटल वीडियो से सीखी गई भाषा का ही उपयोग करती है।

एक अमेरिकी यूट्यूबर, व्यवसायी परोपकार करता है और मिस्टर बीस्ट नाम से ऐसा प्रसिद्ध होता है कि लोग उनका असली नाम जिमी डोनाल्डसन भूल ही जाते हैं। यूट्यूब पर 40 करोड़ से ज्यादा सब्सक्राइबर वाला यह व्यक्ति, टीम ट्रीज और टीम सीज जैसे अभियानों से अलग ही पहचान बनाए हुए है। हर स्थानीय भाषा में उसके वीडियो दिखाई पड़ जाते हैं। एक वैश्विक स्टार बनने की यह 2025 की सबसे बड़ी सफलता की कहानी है। 

दूजा न कोयः धुरंधर के एक गाने का अर्थ खोजने के लिए बाढ़ आ गई

यूट्यूब ने भाषाओं की सारी हद तोड़ दी। कुली का ट्रेलर रिलीज हुआ, तो तमिल, कन्नड़, हिंदी और तेलुगु में था लेकिन दूसरी भाषाओं में भी इसे तुरंत देखा जाने लगा। जब आशीष चंचलानी ने अपनी नई हॉरर सीरीज लॉन्च की, तो वह पांच भाषाओं में डब की गई। भाषा अब कोई बाधा नहीं रही, बल्कि विशेषता बन गई है।

2025 ने साबित कर दिया कि यूट्यूब राष्ट्र को एकजुट करने वाला नया सांस्कृतिक मंच है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में 76 फीसदी जेन जेड पीढ़ी दुनिया में होने वाली किसी भी घटना के बारे में जानने के लिए यूट्यूब का सहारा लेती है।

इस साल सनम तेरी कसम के फिर रिलीज को लेकर सिनेमाघरों में मची हलचल से लेकर आइपीएल एशिया कप के उत्साह तक, क्षेत्रीय रचनात्मकता को बढ़ावा देने वाले के पॉप शो डीमॉन हंटर्स की वैश्विक सफलता जैसी कई बातें इसमें शामिल हैं। सब मिलकर मूवी ट्रेलर से लेकर मैच विश्लेषण, गेमिंग और संगीत तक स्क्रीन संस्कृति का नया मंच है। जो चाहे खोजिए, अब खोज के लिए किसी को कहीं भटकने की जरूरत नहीं है। 

TAGS: Google search, Trends, year 2025, wrap up trends
OUTLOOK 10 January, 2026
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