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20 October 2020

पंजाब में कृषि कानून को लेकर बढ़ा नाराज किसानों का डेरा, दशहरे पर प्रधानमंत्री का पुतला फूंकने की चेतावनी

अमृतसर के गुरु जंडियाला के किसान अमरीक सिंह मान को पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अधिकारियों ने खेत में पराली जलाते पकड़ लिया। उनसे पूछा कि प्रतिबंध के बावजूद पराली क्यों जला रहे हैं, तो अमरीक का जवाब था, “पराली नहीं, मैं नेताओं के प्रति अपने मन की भड़ास निकाल रहा हूं। केंद्र सरकार ने किसानों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का हक छीनने की तैयारी की है, अब किसान सरकार का धुआं निकाल देंगे।” यह वाकया बताता है कि नए कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों में कितना रोष है। गुस्साए किसानों ने दशहरे पर रावण की जगह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पुतला जलाने की चेतावनी दी है। पंजाब भाजपा अध्यक्ष अश्विनी शर्मा पर भी हमला हुआ है। पूर्व उपप्रधानमंत्री दिवंगत चौ. देवीलाल के पुत्र एवं हरियाणा के बिजली मंत्री रणजीत चौटाला और पड़पौत्र एवं हरियाणा के उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के सिरसा स्थित घरों का पिछले एक हफ्ते से किसानों ने घेराव कर रखा है। हरियाणा में भी बरोदा उपचुनाव के मद्देनजर गोहाना में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश धनखड़ की ट्रैक्टर रैली को किसानों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। चुनाव प्रचार के लिए उतरे भाजपा नेताओं का किसान बहिष्कार कर रहे हैं।

किसानों की नाराजगी को देखते हुए केंद्र सरकार किसान संगठनों को बातचीत के लिए बुला रही है। हालांकि बुधवार को कृषि मंत्रालय के न्योते पर पहुंचे 29 किसान संगठनों के प्रतिनिधि तब खफा हो गए जब उन्हें पता चला कि बैठक में न तो कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर रहेंगे न कृषि राज्यमंत्री। इसके बाद उन्होंने बैठक का बहिष्कार कर दिया। इससे पहले किसान नेताओं ने आठ अक्टूबर की बैठक का न्योता भी ठुकरा दिया था। इस बीच, केंद्र सरकार के कई मंत्रियों को किसानों से बातचीत का जिम्मा सौंपा गया है। लेकिन किसान संगठनों की समन्वय समिति के सदस्य दर्शन पाल के अनुसार भाजपा नेता पंजाब में वर्चुअल रैली करके हमारे खिलाफ बोल रहे हैं।

कृषि कानूनों का सबसे ज्यादा विरोध पंजाब में ही हो रहा है। यहां सौ से अधिक जगहों पर किसानों के साथ महिलाएं और बच्चे भी मोर्चे पर डटे हैं। रेलवे ट्रैक, टोल प्लाजा और पेट्रोल पंपों पर 20 दिनों से डटे किसानों को हटाने में केंद्र सरकार अभी तक विफल रही है। किसान संगठनों का कहना है कि जब तक सरकार कृषि कानून वापस नहीं लेती और एमएसपी की गारंटी नहीं देती, तब तक विरोध प्रदर्शन जारी रहेंगे। रेलवे ट्रैक और टोल प्लाजा पर किसानों के जाम के चलते पंजाब में अनेक जरूरी वस्तुओं की आपूर्ति बंद हो गई है। कोयले की आवाजाही ठप होने से राज्य के थर्मल प्लांटों में बिजली उत्पादन ठप हो गया है। हालांकि सरकार ने सफाई दी है कि मरम्मत के चलते कुछ प्लांट बंद किए गए हैं। लुधियाना, जालंधर और अमृतसर के उद्योगों से कच्चे और तैयार माल की आवाजाही ठप होने से रेलवे को भी तीन हफ्ते में करीब 250 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।

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कृषि कानूनों पर पंजाब में राजनीति भी तेज हो रही है। एनडीए से अलग होने के बाद शिरोमणि अकाली दल ने कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार के प्रति आक्रामक रुख अपनाया है। 28 अगस्त को विधानसभा सत्र का बहिष्कार करने वाले शिअद ने सदन का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है। मुख्यमंत्री ने 19 अक्टूबर को सत्र बुलाने की घोषणा की है, हालांकि उनका यह भी कहना है कि शिअद ने कृषि कानूनों का प्रारूप तैयार करने से लेकर उन्हें संसद में पारित करने तक सरकार का साथ दिया। अब उसे किसान याद आने लगे हैं।

संसद के मानसून सत्र में सरकार ने कृषि से जुड़े तीन विधेयक पारित कराए थे, जिनकी अधिसूचना जारी की जा चुकी है। कृषि उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सरलीकरण) कानून 2020 के अनुसार किसान एपीएमसी की मंडियों के अलावा किसी फैक्टरी, प्रोसेसिंग प्लांट, उपज संग्रह केंद्र, कोल्ड स्टोरेज या अपने खेत में भी उपज बेच सकेंगे। कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग यानी ठेके पर खेती से जुड़ा है। किसान बड़े खरीदारों, निर्यातकों और रिटेल कंपनियों के साथ समझौता करके खेती कर सकते हैं। आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून 2020 में अनाज, दालें, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू को आवश्यक वस्तुओं की सूची से बाहर किया गया है। विशेष परिस्थितियों के अलावा इन पर स्टॉक लिमिट लागू नहीं होगी।

किसानों का कहना है कि अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) की तर्ज पर फसलों के लिए भी एमआरपी (मिनीमम रिजर्व प्राइस) की गारंटी हो। वे आशंकित हैं कि एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) एक्ट के अधीन राज्य सरकारों की मंडियां खत्म हो जाएंगी और अंततः सरकारी एजेंसियां खरीद बंद कर देंगी। तब व्यापारी मनमाने दाम पर मंडियों से बाहर उनकी उपज खरीदेंगे।

नाराज किसानों का कहना है कि वे पराली जलाकर भी अपने गुस्से का इजहार कर रहे हैं। पराली जलाने के मामले पिछले साल की तुलना में पंजाब में सात गुना और हरियाणा में तीन गुना बढ़ गए हैं। 20 दिनों में पंजाब में पराली जलाने के 1,400 से अधिक मामले सामने आए हैं, जबकि पिछले साल पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस अवधि में 247 मामले पकड़े थे। हरियाणा में भी 500 से अधिक मामले पकड़ में आए हैं। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा और पंजाब रिमोट सेंसिंग सेंटर ने सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने के बढ़ते मामलों पर चिंता जताई है।

पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस चासंलर एस.एस. जोहल का कहना है, “किसान इसलिए पराली जला रहे हैं, क्योंकि धान की कटाई और गेहूं, आलू की बुआई के बीच उन्हें बहुत कम समय मिलता है। करीब एक दशक पहले तक पराली जलाने के मामले इसलिए बहुत कम होते थे क्योंकि हाथ से धान की कटाई के बाद खेतों में पराली बहुत कम बचती थी।” कंबाइन हार्वेस्टर से धान की कटाई बढ़ने से पराली जलाने के मामले भी बढ़े हैं। इसका एक और कारण यह है कि किसानों को पराली का प्रबंधन बहुत मंहगा पड़ता है और इस पर सब्सिडी भी बहुत कम है।

इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चरल रिसर्च (आइसीएआर) के मुताबिक पंजाब में 2016 में पराली जलाने के 1.02 लाख, 2017 में 67,069, 2018 में 59,684 और 2019 में 50,738 मामले रिकॉर्ड हुए। इस साल इनकी संख्या लाखों में जा सकती है। राज्य में करीब 200 लाख टन धान की पराली होती है, जिसमें से 90.8 लाख टन पराली आठ जिलों में जलाई जाती है। पिछले साल हरियाणा में 70 लाख टन पराली में से किसानों ने 10.24 लाख टन पराली जलाई थी। अब देखना है कि किसानों की नाराजगी जताने का यह तरीका सरकार पर कब और कितना असर डालता है।

विरोध देखकर दुष्यंत ने दूरी बनाई

कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के मोर्चा खोलने के कारण पंजाब और हरियाणा के सियासी दलों में भी हलचल जारी है। एनडीए से शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के टूटने के बाद हरियाणा की भाजपा सरकार में सहयोगी जननायक जनता पार्टी (जजपा) पर भाजपा से गठबंधन तोड़ने का दबाव बना हुआ है। जजपा कोटे से सरकार में उपमुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला की इस मामले पर चुप्पी को लेकर विरोधी दलों के साथ जजपा नेता और कार्यकर्ता भी मुखर हैं। पिपली में प्रदर्शनकारी किसानों पर 10 सितंबर को हुए लाठीचार्ज के बाद दुष्यंत चौटाला के छोटे भाई दिग्विजय सिंह चौटाला ने कहा था कि यह लाठीचार्ज किसानों पर नहीं, बल्कि पूर्व उपप्रधानमंत्री दिवंगत देवीलाल के परिवार के सदस्यों पर है। सरकार में भागीदार दल की सरकार के प्रति ऐसी टिप्पणी से भाजपा भी असहज है। जजपा के दस में से छह असंतुष्ट विधायकों ने पहले ही दुष्यंत चौटाला के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। बरोदा उपचुनाव में कांग्रेस इसे मुद्दा बनाकर सरकार को घेर रही है। खुद को घिरते देख दुष्यंत चौटाला और उनकी पार्टी के ज्यादातर नेताओं ने इस उपचुनाव से दूरी बना ली है। कोरोना संक्रमित बता दुष्यंत ने खुद को चंडीगढ़ स्थित अपने सरकारी आवास पर अलग-थलग कर लिया है। दुष्यंत के इस निर्णय पर नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का कहना है कि किसानों के हितों का दम भरने वाली जजपा किसान वोट बैंक के रास्ते ही सत्ता के गलियारों तक पहुंची है। अब जब किसान अपने हितों की लड़ाई के लिए सड़कों पर धरने लगाए बैठे हैं, जजपा नेता कोरोना के बहाने छुप गए हैं।

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OUTLOOK 20 October, 2020
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