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31 January 2026

असमः पहचान और अधिकार का संघर्ष

लगभग दो शताब्दियों से, असम के चाय बागानों में लाए गए आदिवासी अनुसूचित जनजाति का दर्जा और अधिकार के लिए लड़ रहे

कई पीढ़ियों से अमरजीत केरकेट्टा का परिवार असम में रह रहा है। उनके पूर्वजों को लगभग 200 साल पहले चाय बागानों में काम करने के लिए असम लाया गया था। तब से उनका परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी इसी राज्य में बसा हुआ है। अमरजीत के पूर्वजों की तरह झारखंड से लाखों आदिवासी परिवारों को चाय बागानों में काम करने के लिए असम लाया गया था। आज उनकी संतानों को “टी ट्राइब्स” कहा जाता है। लेकिन 41 वर्षीय अमरजीत इस पहचान को सख्ती से खारिज करते हैं। खड़िया समुदाय से ताल्लुक रखने वाले अमरजीत इस शब्द पर आपत्ति जताते हैं। वे कहते हैं, “पूरे भारत में हमें आदिवासी के रूप में पहचाना जाता है, लेकिन यहां हमें टी ट्राइब्स कहा जाता है। आखिर टी ट्राइब का मतलब क्या है? खड़िया, उरांव, मुंडा, हो, संथाल, गोंड यही हमारी असली पहचान है। हम अपनी पहचान के साथ जीना चाहते हैं। हम आदिवासी के रूप में मान्यता के हकदार हैं।”

अमरजीत की लड़ाई केवल ‘टी ट्राइब’ लेबल के विरोध तक सीमित नहीं है। यह संघर्ष असम में रहने वाले उनके जैसे लाखों आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का आरक्षण न दिए जाने के खिलाफ भी है, क्योंकि देश के अन्य हिस्सों में उनकी आदिवासी पहचान को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है।

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अमरजीत असम के सोनितपुर जिले के डिब्रू दरंग गांव में रहते हैं। वे कई वर्षों से वे ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ असम (एएएसएए) से जुड़े हुए हैं और आदिवासी आरक्षण के अधिकार के लिए सक्रिय रूप से संघर्ष कर रहे हैं।

एएएसएए के अनुसार, असम में एक करोड़ से अधिक आदिवासियों और दलितों को राज्य सरकार ने ओबीसी श्रेणी में रखा हुआ है। असम में लगभग 70 लाख आदिवासियों को टी ट्राइब्स के रूप में चिन्हित किया गया है, इनमें से किसी को भी अब तक एसटी का दर्जा नहीं मिला है। पश्चिम बंगाल में इन आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिल चुका है, लेकिन असम में इन्हें आज भी मान्यता के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

असम में झारखंड मूल के आदिवासियों का मुद्दा झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी कई बार उठा चुके हैं। उन्होंने घोषणा की थी कि उनकी स्थिति का अध्ययन करने के लिए एक प्रतिनिधिमंडल असम भेजा जाएगा। 2025 की शुरुआत में झारखंड सरकार ने अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति मामलों के मंत्री चामरा लिंडा के नेतृत्व में एक टीम को असम भेजने का निर्णय लिया था। यह टीम असम में रहने वाले झारखंड मूल के आदिवासियों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति का अध्ययन करेगी।

एएएसएए के मुख्य सलाहकार अनिल टोप्पो उरांव जनजाति से हैं। उनके पूर्वज झारखंड के छोटा नागपुर क्षेत्र से असम आए थे। 43 वर्षीय अनिल कहते हैं कि उन्हें खुशी है कि झारखंड सरकार की एक टीम आखिरकार उनकी स्थिति का आकलन करने आ रही है। चामरा लिंडा के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल आने से वे विशेष रूप से खुश हैं, क्योंकि इस मुद्दे पर वे पहले उनसे मिल चुके हैं। कार्बी आंगलोंग जिले के बालिजन गांव से ताल्लुक रखने वाले अनिल असम के पहले मुख्यमंत्री को उनकी वर्तमान स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं।

अनिल का आरोप है, “आजादी के बाद 1950 तक हमारे पूर्वजों को यहां आदिवासी माना जाता था। लेकिन जब गोपीनाथ बोरदोलोई असम के पहले मुख्यमंत्री बने, तब क्षेत्रीय प्रतिबंध लगाए गए और हमें डी-शेड्यूल कर दिया गया। हमारे निर्वाचित विधायकों को बुलाया गया और उनसे पूछा गया कि चूंकि आप चाय बागानों में काम करते हैं, तो अगर आपको टी ट्राइब कहा जाए तो कैसा रहेगा? विधायकों ने इस पर सहमति दे दी।”

अमरजीत और अनिल दोनों का कहना है कि यदि उनके समुदायों को असम में एसटी का दर्जा मिल जाता है, तो वे राजनीतिक रूप से अधिक मजबूत हो जाएंगे। ऐसे में असम की 126 विधानसभा सीटों में से 42 से 45 सीटें आरक्षित हो जाने की संभावना है। इससे आदिवासी समुदाय से मुख्यमंत्री बनने की संभावना भी बन सकती है। फिलहाल असम में केवल 19 सीटें एसटी और नौ सीटें एससी के लिए आरक्षित हैं।

उल्लेखनीय है कि 2014 के लोकसभा चुनाव और 2016 के असम विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा ने आदिवासी चाय बागान मजदूरों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का वादा किया था। भूमि पट्टे और दैनिक मजदूरी बढ़ाने की घोषणाएं भी की गई थीं। लेकिन पिछले दस वर्षों में इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।

हाल ही में असम सरकार ने एक विधेयक पारित किया है, जिसके तहत 200 वर्षों से अधिक समय से राज्य में रह रहे समुदायों को भूमि स्वामित्व अधिकार देने की बात कही गई है। असम कैबिनेट ने छह समुदायों को एसटी दर्जा देने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी है। इसके बाद कई आदिवासी संगठनों और छात्र समूहों ने विरोध प्रदर्शन किए हैं। उनका तर्क है कि इससे मूल निवासी आदिवासी समुदायों के हित कमजोर होंगे। इसके अलावा यह निर्णय अभी लागू नहीं हुआ है। हालांकि कई लोगों का मानना है कि भले ही यह लागू हो जाए, इससे लाखों आदिवासियों की मांग पूरी नहीं होगी।

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष और झारखंड के पूर्व मंत्री रमेश्वर उरांव मानते हैं कि असम में आदिवासियों को एसटी दर्जा देने में कई बाधाएं हैं। उनके अनुसार, केवल असम सरकार ही इस संबंध में केंद्र सरकार को सिफारिश भेज सकती है।

राज्य-विशिष्ट आधार पर संवैधानिक प्रावधान के अनुसार अनुसूचित जनजातियों को मान्यता देते हैं। यही कारण है कि असम में मौजूदा आदिवासी समुदाय अन्य क्षेत्रों से आए प्रवासियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का विरोध करते हैं।

अहोम समुदाय असम में राजनैतिक रूप से प्रभावशाली माना जाता है। उनकी अनुमानित आबादी 15 से 17 लाख है और लगभग 35 विधानसभा क्षेत्रों में उनका निर्णायक प्रभाव है। असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई इसी समुदाय से थे। अहोम उन छह समूहों में शामिल हैं जिन्हें हाल ही में असम कैबिनेट ने एसटी दर्जे के लिए मंजूरी दी है।

एएएसएए के पूर्व अध्यक्ष प्रभात दास पनिक्का का मानना है कि असम में झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और ओडिशा के आदिवासियों को जनजातीय के रूप में मान्यता देने से इनकार करना राजनीतिक इरादे को दर्शाता है। उनकी आबादी मौजूदा जनजातीय समुदायों से कहीं अधिक है। उन्हें अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने से राजनीतिक सत्ता में महत्वपूर्ण बदलाव आएगा।

पनिक्का कहते हैं, “सरकार ने चाय बागान मजदूरों को टी ट्राइब कहा। जब वे बागानों से निकलकर अन्य जगहों पर बस गए, तो उन्हें एक्स-टी ट्राइब कहा गया। यह अपमानजनक है। चाय उद्योग केवल 200 साल पुराना है, जबकि आदिवासी इतिहास हजारों साल पुराना है। सौ साल पुराना उद्योग कैसे हजारों साल पुरानी पहचान को मिटा सकता है?”

राजनीतिक दल, खासकर भाजपा और कांग्रेस, इस डर से एसटी दर्जा देने से बचते हैं कि इससे आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ेगी, अधिक आदिवासी विधायक चुनकर आएंगे और आदिवासी मुख्यमंत्री बनने की संभावना प्रबल हो सकती है।

दो सौ से अधिक वर्षों से असम में रह रहे आदिवासी उधार की पहचान के साथ जीने को मजबूर हैं। उन्हें उनकी वास्तविक पहचान से वंचित रखा गया है। अनुसूचित जनजाति की मान्यता की मांग केवल आरक्षण की नहीं है, बल्कि यह गरिमा, भूमि अधिकार और राजनीतिक आवाज की मांग है।

असम में आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने में कई बाधाएं हैं। इसकी सिफारिश सिर्फ केंद्र सरकार ही कर सकती है। राज्य सरकार मंत्रालय को सिफारिश भेजती है

रामेश्वर उरांव, पूर्व अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति

TAGS: Assam, struggle, identities, india, rights
OUTLOOK 31 January, 2026
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