अफीम पर भारी पड़ रहा है आम, जानें कैसे बदल गयी इस गांव की सूरत
लोहाजिमी गांव जहां हम खड़े हैं, नहीं रह सकते थे। खूंटी जिला के तोरपा ब्लाक के तपकरा पंचायत का यह गांव कोयल कारो जल विद्युत परियोजना के कारण यह डूब गया होता। इसी की तरह सौ से अधिक गांव डूब क्षेत्र में आते। डूब से बचाने की कवायद में 2001 की पुलिस फायरिंग में आठ ग्रामीण मारे गये थे, अनेक घायल हुए थे। यह संघर्ष की भूमि है। गांव के रोयलन गुड़िया कहते हैं कि दो दिन पहले भी यहां हाथी आया था, भालू भी आते हैं। लोगों ने उनकी उपस्थिति को स्वीकार कर लिया है। यह वही खूंटी है जो पूरे देश में अफीम के गढ़ के रूप में बदनाम है। अंदाज इसी से लगा सकते हैं कि पिछले साल जिससे अफीम तैयार होता है उस पोस्ता के कोई एक हजार एकड़ में फसल को पुलिस ने नष्ट किया था।
माओवादियों के संरक्षण में यह लंबे समय से चल रहा है। बिचौलिये खेती के लिए पैसे देते हैं, बीज भी उपलब्ध कराते हैं, संरक्षण भी देते हैं, सिंचाई के लिए जरूरत पड़ने पर आर्थिक मदद और तैयार फसल को बाजार भी। यहां के सुदूर ग्रामीण, जंगली इलाके ज्यादातर लोग या जमीन मालिक ज्यादा फायदे के लिए मोटे तौर पर मजदूर की भूमिका में होते हैं। आज अफीम के लिए बदनाम इस जिले में आम के बाग लहरा रहे हैं। अम्रपाली और मल्लिका ज्यादा हैं। स्वयंसेवी संगठन प्रदान के क्षेत्रीय को आर्डिनेटर प्रेम शंकर कहते हैं कि अफीम की खेती से हमने प्रेरणा ली। जमीन रहते काम के लिए पलायन करने वाले लोगों को गांवों में रोका, सरकारी योजनाओं के माध्यम से संसाधन उपलब्ध कराये। मजदूर को किसान होने का एहसास कराया।
अब तो मजदूरी करने वाले बड़े बागों के मालिक भी हो गये हैं। दूसरों को काम दे रहे हैं। यह मेहनत का काम था। सिर्फ तोरपा के ही कोई 1600 एकड़ में आम की खेती हो रही है। इसी साल कोई डेढ़ सौ मीट्रिक टन आम का उत्पादन हुआ है। तोरपा मुख्यालय से कोई 25-30 किलोमीटर अंदर जंगल और हरियाली से झूमते गांवों में आपको बाहर से इस क्रांतिकारी परिवर्तन का एहसास भी नहीं होगा। मध्य प्रदेश के ख्यात संस्थान से प्रबंधन की डिग्री हासिल करने वाले प्रेम शंकर को गांवों में घूमते हुए ग्रामीणों से पहचान, दूर से जोहार (अभिवादन ) की आवाज लगाती महिलाएं, पुरुष, बताने की जरूरत नहीं कि ग्रामीणों से इनके आत्मीय रिश्ते हैं। टीकाकरण के अवेयरनेस कैंप और लोगों से मुंडारी में बात करते देख थोड़ा हैरत होता है। इसी साल कोई डेढ़ सौ मीट्रिक टन आम का उत्पादन हुआ। साथ में टमाटर, मिर्च, आदि, तरबूज की भी खेती। हर परिवार का अतिरिक्त आय कोई चालीस से पचास हजार तक बढ़ी है। कुछ बागों में आम के पेड़ तैयार हो रहे हैं। आने वाले एक-दो साल में इनकी आमदनी और बढ़ने वाली है। गुफू गांव के विश्वनाथ सिंह शिमला में सुरंग बनाने वाले मजदूर थे। लौट आये हैं। अपने बाग में आमों को निहारते हुए कहते हैं यहां 24 एकड़ में सिर्फ आम लगाया है। गांव के 22 में 17 परिवारों ने आम की बागवानी की है। आम से एक साल में उन्होंने एक लाख से अधिक की कमाई की है। अपर लैंड, पथरीली जमीन देखकर लगेगा यहां कुछ नहीं हो सकता। मगर ढलान पर पानी रोकने के लिए नियोजित तरीके से खोदे गये अनगढ़ ट्रेंच, खेतों में पानी-नमी के लिए अनगिनत गड्ढे, पहाड़ी ढलान से आने वाले पानी को रोकने के लिए बांधों का लेयर, तालाब, सोलर सिस्टम से पटवन का इंतजाम।
बागवानी की उन्नत तकनीक के साथ वास्तव में बंजर जमीन की तकदीर ही बदली हुई दिखती है। लोहाजिमी गांव में भी कर्रा नदी से उपरी जमीन पर पानी पहुंचाने के लिए सोलर सिस्टम की मदद से सामूहिक पटवन की व्यवस्था है। वहां भी हरियाली ऐसी कि बाहर निकलने का रास्ता भी नहीं दिखेगा। बगल के डेरांग के पठान टोली की सुसारी टोप्पनो बताती है कि यहां के 60 में 57 परिवारों ने आम के बाग लगाये हैं। उसके खेत में आम तब तैयार है।
प्रदान के प्रेम शंकर बताते हैं कि 2016 में जब एनएन सिन्हा ग्रामीण विकास सचिव और सिद्धाथ त्रिपाठी मनरेगा आयुक्त थे मनरेगा से आम की बागवानी को जोड़ा और तीन के बदले पांच साल की योजना को मंजूरी दी। पायलट प्रोजेक्ट के तहत खूंटी, गुमला, पाकुड़, लातेहार के नौ प्रखंडों में बिरसा मुंडा बागवानी योजना के तहत आम और थोड़ा इमारती लकड़ी लगाने का काम शुरू हुआ। तोरपा में पायलट प्रोजेक्ट के तहत आम की बागवानी शुरू हुई थी। 95 में 75 गांवों में आम की बागवानी शुरू हुई। विशेष स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना के बाद मनरेगा से इसे जोड़ने का बेहतरीन नतीजा सामने आया है।
अंडामन में मजदूरी, अब सालाना एक लाख
गुफू की आरती चार एकड़ जमीन की मालिक है। खेती से घर नहीं चलता था। मजदूरों की टोली के साथ पति अंडमान चले गये थे। सुनामी आई तो उसे पति की चिंता हुई। बेटी की शादी और अंडमान जाने के लिए जमीन को गिरबी रखा, अंडमान पहुंच गई। लौटने के लिए पैसे नहीं थे तो दो साल वहीं मजदूरी की। फिर वापस लौटी और नई तकनीक और योजनाओं की मदद से आम की बागवानी और सब्जी उत्पादन में लग गई। इसी कमाई से बंधक जमीन को छुड़वाया। दूसरी बेटी को कॉलेज में पढ़ाया, शादी की। आज उसके खेतों दूसरे मजदूर भी काम करते हैं। आरती बताती है कि कम से कम एक लाख तो सालाना आमदनी हो ही जाती है। घर के कमरों में पड़े आम के टीले दिखाकर वह निहाल होती है। आरती की तरह कई और परिवार हैं जो अब कमाने के लिए बाहर नहीं जाते। हालात इसी तरह रहे तो औरों के दिन भी बदलेंगे। हेमन्त सोरेन ने भी आम की खेती की महत्ता को स्वीकार किया है। शासन में आने के बाद बिरसा हरित ग्राम योजना की शुरुआत की। 25 हजार एकड़ में आम की बागवानी का लक्ष्य रखा। काम तेजी से चल रहा है।