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11 February 2019

इन कारणों से कांग्रेस को है प्रियंका पर भरोसा, यूपी में इन समीकरणों पर नजर

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कहा जाता है कि दिल्ली की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। प्रदेश में 80 लोकसभा सीटें हैं। यानी केंद्र में सरकार बनाने के लिए जितनी सीटें चाहिए उसकी करीब एक तिहाई। ऐसे में 23 जनवरी को प्रियंका गांधी वाड्रा की राजनीतिक एंट्री के साथ कांग्रेस ने अपना बड़ा दांव चल दिया। जिसका भव्य प्रदर्शन सोमवार को उत्तर प्रदेश के लखनऊ मेगा रोड शो के जरिए किया जा रहा है। इस कदम के बाद माना जा रहा है कि प्रियंका सपा-बसपा गठबंधन और सत्तारूढ़ भाजपा को चुनौती देने का पुरजोर प्रयास करेंगी। खासकर उत्तर प्रदेश में अपने बुरे दौर से गुजर रही कांग्रेस को भी प्रियंका से चमत्कारिक प्रदर्शन की उम्मीद है।

अब लोकसभा चुनाव के मद्देनजर पार्टी का यह दांव कहां तक सफल होता है यह आने वाला वक्त बताएगा लेकिन इतिहास में नजर डालें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में राहुल और सोनिया गांधी के अलावा कोई कांग्रेसी नेता सांसद नहीं बन सका। राहुल गांधी के लिए यूपी में यह जबरदस्त नाकामी थी। उसके बाद राहुल ने नए राजनीतिक समीकरण के तहत 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री पद का दावेदार और राज बब्बर को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर यूपी जीतने की योजना तैयार की। कांग्रेस ने ‘27 साल यूपी बेहाल’ का नारा दिया। राहुल गांधी ने पूरे प्रदेश की यात्राएं शुरू कर दीं। लेकिन चुनाव से पहले ही राहुल को अंदाजा लगा कि उनका दांव सफल नहीं हो रहा है। पार्टी ने एक बार फिर रणनीति बदली और समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर 2017 का विधानसभा चुनाव लड़ा। कांग्रेस ने नारा बदलकर ‘यूपी को ये साथ पसंद है’ कर दिया। लेकिन कांग्रेस को महज 7 विधानसभा सीटें ही मिलीं।

बता दें कि 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को यूपी में 18 फीसदी से ज्यादा वोट और 20 से ज्यादा लोकसभा सीटें मिलीं थी। 1984 के बाद यूपी में कांग्रेस का यह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था।

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उत्तर प्रदेश में हर चुनाव के साथ ही दिलचस्प तरीके से कांग्रेस का वोट बैंक खिसकता चला गया। कभी दलितों और मुसलमानों के बीच मजबूत आधार रखने वाली कांग्रेस का वोट बैंक सिमट चुका है। एक ओर दलित कांग्रेस छोड़ बीएसपी के पाले में चले गए हैं, वहीं मुसलमानों का झुकाव एसपी की ओर अधिक है। लोकसभा चुनाव से पहले ही एसपी-बीएसपी ने गठबंधन की घोषणा कर दी है। वहीं, सवर्णों में पार्टी पहले ही अपनी पैठ खो चुकी है।

प्रियंका गांधी को जिस पूर्वी उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई है, वह अभी भाजपा का सबसे ताकतवर किला माना जाता है। क्षेत्र के दो सबसे बड़े शहरों वाराणसी और गोरखपुर में प्रियंका के लिए रास्ता कठिन बताया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से सांसद हैं, जबकि यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ गोरखपुर से आते हैं। यहां की 43 लोकसभा सीटों (पूर्वांचल और अवध क्षेत्र की मिलाकर) को मथने के लिए उनके पास वक्त भी बहुत नहीं है। अब तक अमेठी और रायबरेली तक सीमित रहीं प्रियंका को इस बड़े क्षेत्र के जमीनी हालात और समस्याओं को समझना बड़ी चुनौती होगा।

ये है पूर्वी यूपी

प्रियंका पूर्वी यूपी की प्रभारी हैं। इसका अर्थ हुआ कि राहुल, सोनिया के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकसभा सीट वाराणसी, समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव की सीट आजमगढ़, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गढ़ गोरखपुर, राम जन्मभूमि विवाद का केंद्र फैजाबाद लोकसभा सीट, मायावती की पुरानी लोकसभा सीट अकबरपुर सब की सब सीटें प्रियंका गांधी के कार्यक्षेत्र में आएंगी। यहां के मतदाताओं को अपने पाले में करने के लिए प्रियंका को पैठ बनानी पड़ेगी।

सवर्ण वोटबैंक पर नजर

माना जा रहा है कि कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को लाकर अगड़ी जातियों को एक विकल्प दे दिया है। प्रियंका को जिस पूर्वांचल की जिम्मेदारी सौंपी गई हैं, जहां की राजनीति धुरी ब्राह्मण और राजपूत हैं। कहा जाता है कि यूपी में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद ब्राह्मण को वो तवज्जो नहीं मिल सकी, जिसकी वो उम्मीद लगाए हुए थे। ऐसे में कांग्रेस ब्राह्मणों को एक विकल्प दे सकती है। लंबे समय से कांग्रेस का वोटबैंक रहा मौजूदा समय में बीजेपी में शिफ्ट हो चुका है, प्रियंका जिसे वापस लाने की कवायद करेंगी।

इसलिए है कांग्रेस को प्रियंका पर भरोसा

-हमेशा विवादों से दूर रहने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा को गांधी परिवार के वास्तविक उत्तराधिकारी के तौर पर देखा जाता रहा है। इनकी राजनीतिक सूझ को भी बेहतर माना जाता है, इसलिए कहा जाता है कि जब भी राहुल किसी महत्वपूर्ण मौके पर भाषण देते हैं तो वही तय करती हैं कि क्या कहना है और क्या नहीं। प्रियंका कभी विवादों में नहीं रही हैं। उनकी इसी छवि को कांग्रेस अगले आम चुनाव में भुनाना चाहती है।

-अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी का रायबरेली और अमेठी में चुनाव प्रबंधन प्रियंका देखती रही हैं। वह कार्यकर्ताओं से बेहतर संवाद करने में कुशल मानी जाती हैं। वह कार्यकर्ताओं की क्षमता का उपयोग करना जानती हैं। इन्हीं गुणों को ध्यान में रखकर कांग्रेस उनका उपयोग राष्ट्रीय स्तर पर करना चाहती है।

-प्रियंका अपने आकर्षक व्यक्तित्व की वजह से युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं। लोगों का ऐसा मानना है कि यदि प्रियंका राष्ट्रीय स्तर पर लोगों से सीधा संवाद करें और कांग्रेस के लिए वोट मांगें तो इसका काफी प्रभाव पड़ सकता है। प्रियंका में लोग उनकी दादी दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की झलक देखते हैं। चेहरा, ब्वॉय कट बाल, साड़ी पहनने का ढंग, चलने का अंदाज, लोगों से आत्मीयता से मिलना आदि में दोनों में काफी समानता है।

प्रियंका गांधी को उतारना जल्दबाजी तो नहीं?’

बहरहाल कांग्रेस प्रियंका की राजनीतिक एंट्री को भुनाने मैं लगी हुई है। हालांकि पार्टी के बाहर ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो प्रियंका के एंट्री को बेअसर बताने में जुटे हैं। रणनीतिकार जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर ने पिछले दिनों कहा कि अगामी लोकसभा चुनाव में मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और महागठबंधन के बीच होगा क्योंकि कांग्रेस अभी तक मजबूत विपक्ष नहीं है। उन्होंने प्रियंका गांधी को कांग्रेस द्वारा पूर्वी यूपी की जेनरल सेक्रेटरी बनाए जाने पर कहा कि अगर कोई सोचता है कि प्रियंका गांधी या किसी और को देश की सबसे बड़ी पार्टी चुनाव के करीब लाएगी तो बहुत बड़ा फायदा होगा। यह सोचना उचित नहीं होगा। प्रशांत किशोर ने कहा, प्रियंका गांधी को दो-तीन साल समय देना चाहिए। उसके बाद देश के लोग फैसला कर सकते थे कि वह जवाबदेही लेने में सक्षम होंगी या नहीं।

 

 

 

 

 

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TAGS: Priyanka Gandhi., these reasons, Congress has faith, ensure party's victory, Uttar Pradesh
OUTLOOK 11 February, 2019
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