कर्नाटकः उत्तर का बुलडोजर, दक्षिण की ओर
उत्तर प्रदेश की शैली में ‘अतिक्रमण’ के नाम पर घर गिराए जाने के लिए कर्नाटक में बुलडोजर के इस्तेमाल के बाद सैकड़ों लोग बेघर, राज्य सरकार के पुनर्वास आश्वासन के बीच भाजपा का नागरिकता पर सवाल
नव वर्ष के आगमन पर बेंगलूरू शहर का खुला आसमान पटाखों की रोशनी से जगमगा उठा। उल्लास से भरे वातावरण में होटलों, पबों और घरों में लोगों के चेहरों पर आशा की चमक थी। रोशनी भरे इस आसमान के नीचे उत्साह के बीच एक कड़वी सच्चाई भी थी। ऐन नए साल के आने से एक दिन पहले राज्य सरकार ने ‘अतिक्रमण’ के नाम पर कई लोगों के घरों पर बुलडोजर चला कर उन्हें बेघर कर दिया। ठंड से कंपकंपाती रात में कोगिलु गांव के सैकड़ों लोग बिना छत के नए साल में दाखिल हुए। इन लोगों ने नए साल में जश्न के साथ नहीं, बल्कि असहनीय पीड़ा, डर और गहरी निराशा के साथ कदम रखा। मामले ने तब तूल पकड़ लिया जब, केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कर्नाटक सरकार को घेर लिया और कांग्रेस सरकार पर योगी आदित्यनाथ के ‘बुलडोजर मॉडल’ की नकल करने का आरोप लगा दिया। उसके बाद अतिक्रमण हटाने का मामला, राजनैतिक विवाद में बदल गया। कर्नाटक सरकार को आनन फानन घोषणा करना पड़ी कि राज्य सरकार सभी बेदखल परिवारों को बयप्पनहल्ली में 350 वर्ग फुट के फ्लैट देगी। सरकार का कहना था कि पिछले बजट में ही एक आवास योजना की घोषणा की गई थी, जिसका उद्देश्य शहरी गरीबों को घर उपलब्ध कराना है।
मकान देने के वादे पर भाजपा का कहना है कि यहां अतिक्रमण करने वालों को ‘सुविधाएं’ दी गई थीं। विपक्ष नेता आर. अशोक ने इलाके का दौरा कर कुछ प्रभावित परिवारों से मुलाकात की। निवासियों के 25 साल से अधिक समय से वहां रहने के दावों को खारिज करते हुए अशोक ने कहा कि “एक साल पहले तक गूगल मैप पर वहां कोई घर नहीं था।” उन्होंने पुनर्वास योजना को तुष्टीकरण बताया।
हालांकि राज्य सरकार का कहना है कि राजस्व विभाग और ग्रेटर बेंगलूरू प्राधिकरण ने उन सभी लोगों के दस्तावेजों की जांच पूरी कर ली है, जिनके घर तोड़े गए थे। सरकार ने भरोसा दिलाया था कि पात्र परिवारों को वैकल्पिक आवास दिया जाएगा। जांच प्रक्रिया पर भाजपा का कहना है कि राज्य भविष्य में, बंगाल जैसा हो जाएगा। भाजपा ने यहां रह रहे लोगों की पृष्ठभूमि पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। बिना पूर्व सूचना के की गई इस तोड़फोड़ पर जब राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा और तीखी आलोचना हुई, तो सिद्धारामैया सरकार ने तेजी से कदम उठाते हुए प्रभावित परिवारों को फ्लैट देने की घोषणा की। लेकिन इसके बाद भाजपा ने यह कहते हुए मोर्चा संभाल लिया कि यहां रहने वाले घुसपैठिए हैं और उनके बारे में जानकारी जुटाने के लिए एनआइए जांच की मांग तक कर डाली। स्वराज अभियान के आर. कलीमुल्लाह कहते हैं, “सरकार ने कहा है कि एक-दो दिन में फ्लैटों की चाबियां सौंप दी जाएंगी। लेकिन भाजपा इस प्रक्रिया को पटरी से उतारना चाहती यही वजह है कि ‘बांग्लादेशियों’ का डर फैलाया जा रहा है।”
राजस्व विभाग के किए गए सर्वेक्षण के दौरान, जिन लोगों के घर गिराए गए, उनमें से अधिकांश ने मतदाता पहचान पत्र और आधार कार्ड दिखाए थे, जिससे साबित हुआ कि ये लोग लंबे समय से यहां रह रहे थे। प्रभावित परिवारों के साथ काम कर रहे कार्यकर्ताओं का कहना है कि कई निवासियों ने 10 से 12 साल पुराने बिजली के बिल और अन्य दस्तावेज पेश किए हैं, ताकि साबित किया जा सके कि वे लंबे समय से यहां रह रहे हैं। लेकिन जैसे-जैसे विवाद ने सांप्रदायिक रूप ले लिया, वैसे-वैसे ठंडे मौसम में अस्थायी झोपड़ियों में रहने को मजबूर ये लोग अनिश्चित भविष्य को लेकर चिंता में आ गए हैं। वसीम लेआउट की निवासी बानुप्रिया बताती हैं, “हमारे पास सभी दस्तावेज हैं और हमने उन्हें अधिकारियों को सौंप दिया है। उन्होंने हमें वैकल्पिक व्यवस्था का भरोसा दिया था, लेकिन अब कुछ लोग और समूह हम पर झूठे आरोप लगा रहे हैं ताकि हमें छत न मिले। हमें नहीं पता आगे क्या होगा। हमारे पास जाने के लिए कोई और जगह नहीं है।”
भाजपा के दावों के विपरीत, राज्य सरकार के अधिकारियों का कहना है कि यहां रहने वाले आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जैसे इलाकों से आए हैं और कुछ परिवार उत्तर प्रदेश से भी आए हैं। इसके अलावा कुछ लोग कर्नाटक के अलग-अलग हिस्सों से आए हुए हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सरकार ने जैसे ही पुनर्वास पैकेज की घोषणा की इस तरह के आरोप लगने लगे। इनमें से कई लोग फकीर मुस्लिम समुदाय हैं, जो कव्वाल के रूप में रोजी-रोटी कमाते हैं। वे जन्म, विवाह और मृत्यु से जुड़े धार्मिक अवसरों पर गाते हैं। कुछ लोग खिलौने जैसी छोटी-मोटी चीजें बेचते हैं, जबकि कुछ भीख मांगकर गुजारा करते हैं। अन्य समुदायों के लोग दिहाड़ी मजदूरी जैसे काम करके परिवार चलाते आए हैं।
आरोप-प्रत्यारोप के बीच बेघर लोगों का जीवन राजनीतिक बयानबाजी के औजार से ज्यादा कुछ नहीं है। उन्हें ‘घुसपैठिया’ ठहरा कर राजनीतिक फायदा निकालने की कोशिश की जा रही हैं। सपने देखने के लिए उनके पास अब ज्यादा कुछ बचा नहीं है। वे बस इतना चाहते हैं कि उनके सिर पर छत हो और उनकी नागरिकता पर सवाल न उठाए जाएं। एलएलबी की अंतिम वर्ष की छात्रा एंजेल तोड़फोड़ के चलते परीक्षा नहीं दे पाईं क्योंकि उनकी किताबें और एडमिट कार्ड मलबे में दब गए।
दुदियुवा जनारा वेदिके नाम के नागरिक संगठन से जुड़ी नंदिनी इस अभियान को “निर्दयी और अमानवीय” बताती हैं। वे कहती हैं, “यह मुद्दे को सांप्रदायिक बनाने की सुनियोजित कोशिश है। यहां रहने वाला कोई भी व्यक्ति न बांग्लादेश से है न ही कोई घुसपैठिया है। ये लोग कड़ाके की ठंड में अस्थायी झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं। बहुत से लोग पुनर्वास शिविरों में जाने से डर रहे हैं। उनका यह डर जायज भी है, क्योंकि उन्हें लगता है कि एक बार अगर वे यह जगह छोड़ देंगे, तो सरकार से कुछ नहीं मिलेगा।” नागरिक संगठनों का कहना है कि तीन बस्तियों में रहने वाले 151 मुस्लिम परिवारों में से 31 हिंदू घर भी तोड़े गए हैं। साथ ही एक ईसाई परिवार भी प्रभावित हुआ है।
अस्थायी ठिकानों में सिमटे इन परिवारों के लिए रोजमर्रा की लड़ाई ठंड से, घर खोने के दर्द से और इस डर से है कि कहीं राजनैतिक खींचतान उन्हें उन आश्वासनों से भी वंचित न कर दे, जो उन्हें दिए गए हैं।

बेंगलूरू में कांग्रेस सरकार योगी सरकार के बुलडोजर मॉडल की नकल कर रही है
पिनराई विजयन, मुख्यमंत्री, केरल