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25 March 2026

प्रथम दृष्टिः विरासत का बोझ

प्रथम दृष्टिः विरासत का बोझ

राजनीति सिर्फ परिवार की विरासत के बूते नहीं की जा सकती। उससे शुरुआती पहचान तो मिल जाती है, लेकिन आखिरकार हर किसी को अपनी काबिलियत साबित करनी पड़ती है। नीतीश कुमार के बेटे निशांत के लिए भी यही चुनौती होगी

इतिहास साक्षी है कि सियासत में दारा शिकोह की तुलना में औरंगजेब ज्यादा सफल होते हैं। एक ही विरासत के प्रतिनिधि होने के बावजूद राजनीति में अलग-अगल वारिसों की तकदीर एक जैसी नहीं होती। एक ही खानदान के होने के बावजूद दो उत्तराधिकारियों की राजनैतिक समझ और सूझबूझ एक दूसरे के विपरीत हो सकती है। कोई अपने परिवार की विरासत को अगली पीढ़ी तक ले जाने को अपना उत्तरदायित्व समझता है, तो किसी को ऐसी जिम्मेदारी मिलना बोझ से कम नहीं होती। प्राचीन काल से लेकर आज तक ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं। दरअसल राजनीति सिर्फ परिवार की विरासत के बूते नहीं की जा सकती। उससे शुरुआती पहचान तो आसानी से मिल जाती है, लेकिन आखिरकार हर किसी को अपनी काबिलियत साबित करनी पड़ती है। कुछ में ऐसी काबिलियत शुरुआती दिनों में ही दिखने लगती है, तो कुछ बरसो-बरस के अनुभव के बाद भी हासिल नहीं कर पाते। जाहिर है, पारिवारिक विरासत के साथ राजनीति में प्रवेश करना तो आसान है लेकिन अपने दम पर अपनी पहचान बनाना मुश्किल होता है।

बिहार की राजनीति में इसका सबसे बड़ा उदाहरण लालू प्रसाद यादव के परिवार में देखा जा सकता है। एक ही विरासत होने के बावजूद लालू के दोनों बेटों - तेजस्वी प्रसाद यादव और तेज प्रताप यादव – की सियासी तकदीर जुदा रही है। छोटे बेटे तेजस्वी पिता द्वारा स्थापित राष्ट्रीय जनता दल की कमान हाथ में लेकर उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन बड़े बेटे तेज प्रताप हाशिए पर हैं। तेजस्वी पिता के उत्तराधिकारी के रूप में उभरे और उनकी उम्मीदों पर खरे उतरे। पिछले दो विधानसभा चुनावों में हार के बावजूद तेजस्वी बिहार में प्रतिपक्ष के सबसे मजबूत चेहरे के रूप में सामने आए हैं। निश्चित रूप से सिर्फ पारिवारिक विरासत ही राजनीति में सफलता का पैमाना होती तो तेजस्वी और तेज प्रताप की हैसियत एक जैसी होती। दोनों ने एक ही साथ सियासी जीवन में कदम रखा, एक ही साथ विधायक और मंत्री बने, लेकिन तेजस्वी की राजनैतिक परिपक्वता अपने भाई से बेहतर दिखी, जिसे महज पारिवारिक विरासत से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

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फिलहाल बिहार में सबकी नजर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इकलौते बेटे निशांत कुमार पर है, जिन्होंने पिछले दिनों अपने पिता की पार्टी जनता दल-यूनाइटेड की सदस्यता ग्रहण की है। चर्चा है कि उन्हें अगली सरकार में उप-मुख्यमंत्री का पद दिया जा सकता है। पार्टी के कुछ नेता तो उन्हें मुख्यमंत्री बनाने की भी मांग कर रहे हैं। यह सर्वविदित है कि निशांत वर्षों से राजनीति में पैर रखने में अनिच्छुक रहे हैं। इसका एकमात्र कारण यह नहीं रहा है कि उनके लोहियावादी पिता राजनीति में परिवारवाद को बढ़ावा देने के धुर विरोधी रहे हैं। इससे बड़ा कारण यह है कि निशांत ने अपने पिता के प्रदेश की सत्ता के शीर्ष पर दो दशकों से अधिक समय तक रहने के बावजूद राजनीति से खुद को कोसों दूर रखा। ऐसी खबरें आती थीं कि उन्हें राजनीति से अधिक आध्यात्म में दिलचस्पी है। लेकिन अचानक एक दिन बदले परिदृश्य ने उन्हें बिहार के राजनैतिक मंच के केंद्र में ला खड़ा किया, जहां उनसे उम्मीद की जा रही है कि वे अपने पिता की विरासत को आगे ले जाएं। निस्संदेह यह उनके लिए बड़ी जिम्मेदारी ही नहीं, बड़ी चुनौती भी है।

मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश ने अपने बीस वर्ष के कार्यकाल में बिहार जैसे पिछड़े प्रदेश के समावेशी विकास के लिए उल्लेखनीय कार्य किया, जिसकी बदौलत उन्हें “सुशासन बाबू” और “विकास पुरुष” की उपाधि मिली। व्यक्तिगत तौर पर इस दौर में उनकी एक बड़ी उपलब्धि यह भी रही कि उन्होंने अपने पुत्र सहित परिवार के किसी अन्य सदस्य को राजनीति में प्रवेश नहीं करने दिया। वे वंशवाद के खिलाफ मुखर होकर आवाज उठाते रहे। बीते दो दशकों में वे ही अपनी पार्टी के एकमात्र सर्वमान्य नेता बने रहे। उनकी पूरी पार्टी उनके इर्दगिर्द घूमती रही। लेकिन, जैसी कि हर ‘वन-मैन पार्टी’ की विडंबना रही है, दूसरी पीढ़ी का नेतृत्व जदयू में नहीं उभर पाया। पार्टी के कार्यकर्ताओं के समक्ष आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि नीतीश के बाद पार्टी का नेतृत्व कौन संभालेगा। सियासी जानकारों का आम तौर पर यह मानना रहा है कि नीतीश के बाद उनकी पार्टी बिखर जाएगी क्योंकि उनके दल में कोई ऐसा नेता मौजूद नहीं है जो पूरी पार्टी को मजबूती से एकजुट रख सके। शायद यही कारण है कि मुख्यमंत्री की इच्छा या अनिच्छा से निशांत को राजनीति में लाया गया है। पार्टी नेताओं को उम्मीद है कि निशांत के राजनीति में आने से पार्टी में वैसी ही एकजुटता बनी रहेगी, जैसी नीतीश के पूरे कार्यकाल में बनी रही। निशांत के लिए ऐसी उम्मीदों पर खरा उतरना आसान नहीं होगा, लेकिन अच्छी बात यह है कि वे राजनीति में बिलकुल नई शुरुआत कर रहे हैं। बस यह याद रखना होगा कि उन्हें नीतीश के पुत्र के रूप में भले ही बड़ी विरासत संभालने की जिम्मेदारी मिली है, लेकिन आखिरकार उन्हें जनता के बीच अपनी काबिलियत अपने दम पर ही साबित करनी पड़ेगी।

TAGS: Nitish Kumar, cm bihar, nishant kumar, burden of legacy
OUTLOOK 25 March, 2026
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