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03 January 2023

सावित्री बाई फुले और समकालीन भारत

सावित्री बाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को नया गाँव (बॉम्बे प्रेसीडेंसी) में हुआ था | जो पुणे शहर से 50 किलोमीटर की दुरी पर है | सावित्री बाई फुले विषमता भरे समाज की खामियों को दूर करने में जीवनपर्यंत संघर्षशील और प्रयत्नशील रहीं | शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान मील का पत्थर है जो नवजागरण के उद्देश्यों को पूरा करता हैं | 

 

 

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नवजागरण का मूल्य समाज में फैली हुई रुढिवादिता को ख़त्म करता है और एक नये समाज के स्थापना करती है, जैसा कि हमें 18वीं-19वीं शताब्दी में सामाजिक और राजनीतिक क्रांति से नया समाज बनते दिखाई पड़ता है | 19वीं शताब्दी की पहचान नये आविष्कार , प्रगतिशील और प्रजातान्त्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने के रूप में जाना जाता हैं | 19वीं शताब्दी के नये अविष्कारक और सामाजिक बदलाव के रहनुमा पूरी तरह से आस्वस्त थे कि आने वाला युग मानवता के लिए अच्छे सन्देश लेकर आयेगा | फ़्रांस की क्रांति कि जो मूल्य धाराएँ थी पूरी दुनिया को प्रभावित कर चूका था इससे भारत भी अछूता नहीं था | भारत में भी संघर्ष और बदलाव देखा जा रहा था और मानवीय उर्जा और प्रतिभा भारत में भी मानवता को प्रतिष्ठित करने की ओर अग्रसर था | इस कार्य के लिए जो सबसे महत्वपूर्ण कदम सावित्री बाई फुले के द्वारा उठाया गया | सावित्री बाई फुले का मानना था कि तर्क करने की शक्ति ही भारत में प्रगतिशील समाज का निर्माण करेगा तभी भारत जैसा देश जो अंधविश्वास और आस्थाओं से जकड़ा हुआ है वह आजाद होगा | सावित्री बाई फुले की लेखनी और कार्यशैली वर्गीकृत संरचना पर भारी चोट पहुँचाया और सांस्कृतिक वर्चस्व को ख़त्म करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई | इनका संघर्ष बेहतर मानवतावाद को बढ़ावा देने में एक निवेश है जो कि भारत को मध्यकालीन व्यवस्था से हटाया और नया आधुनिक समाज बनायेगा|   

 

इनका संघर्ष आने वाले पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्त्रोत है | इन्होने पहली महिला स्कूल की स्थापना की जो कि महिलाओं की अस्मिता और उनके अधिकार के लिए प्रेरित किया | समानता, आजादी, भाईचारा और मानवता उनके लिए हमेशा प्रेरणास्त्रोत बना रहा | उस समय जब महिलाओं को एक वास्तु के रूप में देखा जाता था ऐसे समय में सावित्री बाई फुले का इन मूल्यों को आगे बढ़ाना अपने आप में ही आने वाले पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्त्रोत है | सावित्री बाई फुले समाज के हाशिये के लोगों की आवाज बनी और महिलाओं के प्रति पितृसत्तात्मक समाज में जो दुहरा शोषण होता था उसको ख़त्म करने की एक प्रखर आवाज बनीं | सावित्री बाई फुले हमेशा धर्म-निरपेक्ष शिक्षा की पुरोधा रही और उनका मानना था कि समाज में जो विकृतियाँ हैं उसे हटाने में शिक्षा का स्थान महत्वपूर्ण है | उनका संघर्ष और जूनून धर्म-निरपेक्ष शिक्षा को भारत में स्थापित करने में अहम भूमिका रही है जो कि बाद में जाकर लार्ड मैकाले (1854) ने इसको भारत की शिक्षा प्रणाली का अहम पहलू माना है |

 

 

सावित्री बाई फुले एक क्रांतिकारी सामाजिक शिक्षा जो कि शुद्र और अतिशूद्र महिलाओं के हक़ के लिए आरंभ किया | इसके साथ-साथ उन्होंने महार और मंग्गा जाति के लिए भी विधालय खोली | आज के समय में सावित्री बाई फुले की प्रासंगिकता इससे पता चलता है कि जब उन्होंने व्यवसायिक प्रशिक्षण और व्यवहारिक शिक्षा को बढ़ावा दिया ताकि एक स्वतंत्र मनुष्य की परिकल्पना साकार हो सके | उनका क्रन्तिकारी सोच का यह भी मानना था कि स्कूलों को औद्दोगिक इकाई और स्कूली शिक्षा में तारतम्य होना चाहिए ताकि बच्चे नए आयाम सीखें और स्वालंबी बने | सावित्री बाई फुले का मानना था कि शिक्षा मनुष्य की रचनाशीलता को बढ़ावा देती है जिसके कारन मनुष्य नये-नये आयाम की खोज करता है | 

 

उन्होंने सामाजिक आन्दोलन को बढ़ावा दिया ताकि जाति व्यवस्था की खामियों को ख़त्म किया जाए और साथ ही सावित्री बाई फुले गर्भवती महिलाओं की सुरक्षा के लिए और शोषित विधवाओं की सुरक्षा के लिए संघर्ष किया जो उन्हें एक संत के श्रेणी में लाकर खड़ा करता है | 1863 ई. में सावित्री बाई फुले ने भ्रूण हत्या से बचाने के लिए मात्रिशिशु गृह खोला | उन्होंने सत्य शोधक समाज का भी गठन किया जो कि दहेज़ प्रथा को ख़त्म करने में अहम भूमिका निभाई | उनका आन्दोलन विधवा पुनर्विवाह और बाल विवाह के खात्में के लिए प्रयत्नशील रही | उनका जीवन और संघर्ष प्रेरणा का स्त्रोत है उन्होंने खुद ब्राह्मण विधवा के बच्चे को गोद लिया, पालन पोषण किया और अंतरजातीय विवाह कराया | सावित्री बाई फुले और ज्योतिराव फुले ने पूरा जीवन महिलायें, किसान और पिछड़े वर्ग के अधिकार के लिए समर्पित कर दिया | लिंगीय असमानता और जातीय असमानता को ख़त्म करने के प्रक्रिया में उन्हें रुढ़िवादी समाज के कारन अनेक पड़ताड़ना झेलना पड़ा, इससे उनका दृढ संकल्प और मजबूत हुआ | सावित्री बाई फुले का कार्य और गाथा प्रेरणादायक है जो आधुनिक भारतीय महिला के सार्वजनिक जीवन के लिए प्रारंभिक बिंदु हैं | 

 

 

सावित्री बाई फुले और महात्मा फुले ने अपने संघर्ष को आन्दोलन का रूप दिया जो समानता और भाईचारे को बढ़ावा देने में मिल का पत्थर साबित हुआ | उनका पूरा जीवन हाशियें पे रहे लोगों के लिए समर्पित रहा | वे समाज में शिक्षा और ज्ञान को आधार बनाकर समाज की कुरीतियों को हटाना चाहते थे | अपने जीवन में अनेक कठिनाइयों के बावजूद अपने संघर्ष में अग्रसर होते गये | रुढ़िवादी समाज के कुछ लोग सावित्री बाई फुले के कार्यशैली पर टिका-टिपण्णी करते थे, कुछ लोग तो उनपर पत्थर और गोबर फेंकते थे | जब वे स्कूल जाती थीं इस कारणवश सावित्री बाई फुले दो साड़ियाँ लेकर जाया करती थी ताकि स्कूल जाकर साड़ी बदल सकें | परमानंद जो उनके शुभचिंतक थे बड़ोदा के महाराज (सांभाजी राव गायकवाड) को ख़त लिखा और सावित्री बाई फुले और महात्मा फुले के कार्य के बारे में अवगत कराया | उन्होंने लिखा की सावित्री बाई ज्योतिराव से ज्यादा प्रेरणा के पात्र हैं | ज्योतिराव का देहांत के उपरान्त उनकी धर्म पत्नी सावित्री बाई फुले ने मुखाग्नि दी, यह कार्य भारत के इतिहास में पहली बार हुआ जब किसी महिला ने अपने पति को मुखाग्नि दी | सावित्री बाई फुले का भी देहांत 10 मार्च 1897 को प्लेग पीड़ित लोगों के बचाव करने के दौरान पुणे में हो गया | 

 

ये दोनों दम्पति बहुत साहसी तरीके से कठिनाइयों का सामना करते हुए मानवता की लड़ाई को कदम दर कदम आगे ले जाते रहे | सावित्री बाई फुले की लड़ाई जातीय व्यवस्था में जो सर्व सत्तावाद और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ रही | इनका योगदान आज भी प्रेरणादायक है और समकालीन भारत में प्रासंगिक है | 

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापक हैं)

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OUTLOOK 03 January, 2023
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