अमेरिकाः ममदानी के मायने तो बड़े
न्यूयॉर्क शहर के सबसे युवा मेयर जोहरान ममदानी ने इतिहास रचा, सामाजिक न्याय, आजीविका और धन के बंटवारे के लिए जमीनी स्तर पर अभियान चलाकर पुराने राजनैतिक मानदंडों को ध्वस्त किया
मतदान का दिन करीब आया, तो जोहरान ममदानी की जीत हैरानी की बात नहीं रह गई। जनमत सर्वेक्षणों में उनकी जीत की भविष्यवाणी की गई थी, फिर भी उनके समर्थक घबराए हुए थे। सर्वेक्षण अक्सर गलत साबित होते रहे हैं। कई लोगों को 2016 का राष्ट्रपति चुनाव याद आ रहा था, जब डेमोक्रेट हिलेरी क्लिंटन रिपब्लिकन डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ जीत की प्रबल दावेदार थीं। क्लिंटन परिवार जश्न की तैयारी कर रहा था, तभी अप्रत्याशित मोड़ आया। आखिरी वोट की गिनती तक कुछ भी निश्चित नहीं होता। इसलिए जब नतीजे का वह पल आया, तो ममदानी के चुनाव दफ्तर में हिप हिप हुर्रे गूंज उठा। यह सिर्फ जीत नहीं, बल्कि लंबी परंपरा का टूटना था। ममदानी ने न्यूयॉर्क की राजनीति के हर रुझान और कायदे को तोड़ दिया, तमाम रुकावटों के बावजूद जीत हासिल की।
महज 34 साल की उम्र में वे 1892 के बाद से सबसे युवा मेयर हैं। उन्होंने युगांडा और भारतीय मूल के आप्रवासी मां-बाप की अपनी जड़ों के बारे में खुलकर बताया और अपनी पहचान पर गर्व किया। दरअसल वे बुनियादी तौर पर भारतीय मूल के ही हैं। उनके पिता का परिवार गुजरात से युगांडा पहुंचा और फिर अमेरिका। उनकी मां मशहूर फिल्मकार मीरा नायर हैं। चुनाव प्रचार की वीडियो में उन्हें हाथ से बिरयानी खाते, हिंदी, अरबी और स्पेनिश के बीच तालमेल बिठाते और अमिताभ बच्चन की फिल्मों के संवाद बड़े चाव से बोलते देखा गया।
उन्होंने ये बातें इज्राएल से बाहर सबसे बड़ी यहूदी आबादी वाले शहर में कही, वह भी ऐसे वक्त में जब ज्यादातर नेता प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मामूली आलोचना से भी बच रहे थे। ममदानी ने उससे उलट किया। वे गजा में कत्लेआम पर खुलकर बोले, इज्राएली फौज पर युद्ध अपराधों का आरोप लगाया, और कहा कि नेतन्याहू न्यूयॉर्क आए, तो गिरफ्तार करवा देंगे। उनके विजय भाषण के बाद लोग धूम मचा ले धूम की धुन पर नाच उठे।

मच गई धूम: ममदानी समर्थकों का जश्न
पेरिस स्थित अमेरिकी विश्वविद्यालय में यहूदी मूल के प्रोफेसर फिलिप गोलब कहते हैं, ‘‘जोहरान ममदानी की जीत बड़ी है। उसमें स्थानीयता, नस्ल, धर्म, स्त्री-पुरुष और वर्ग की सीमाएं टूट गईं। दक्षिण एशियाई, अफ्रीका मूल के अमेरिकी, लैटिनेक्स के साथ-साथ यहूदी युवाओं के एक बड़े वर्ग ने अमीर सुपर पैक्स तबके और कुओमो के क्रूर और घिनौने इस्लामोफोबिया के बावजूद उन्हें वोट दिया।’’ गोलब की दलील है, ‘‘इससे क्या पता चलता है? एक, यह रुख में पीढ़ीगत बदलाव है। बड़े शहरों में युवा खुलकर प्रगतिशील आवाजें उठ रहे हैं। बेशक, न्यूयॉर्क शहर ही अमेरिका नहीं है, लेकिन यह हमेशा से देश का बहुसांस्कृतिक और बहुराष्ट्रीय केंद्र रहा है।’’
ममदानी पिछले जनवरी में चुनाव मैदान में उतरे थे, तो उन्हें कोई दावेदार मान ही नहीं रहा था। शुरुआती सर्वेक्षणों में उन्हें दो प्रतिशत, कभी-कभी उससे भी कम, वोट मिले थे। उनका नाम बहुत कम जाना जाता था। इस दौर में राजनैतिक ध्रुवीकरण सबसे ज्यादा है। कई लोगों का मानना था कि भूरे रंग का, फलस्तीन के पक्ष में बोलने वाला उम्मीदवार हवा हो जाएगा।
लेकिन, जैसे-जैसे महीने बीतते गए उनका प्रचार रफ्तार पकड़ता गया और उनके संदेश की गूंज बढ़ती गई। ममदानी जानते थे कि शहर के लोग जीवनयापन के बढ़ते खर्च से परेशान हैं। इसलिए उन्होंने वादा किया कि शहर में मुफ्त राशन दुकानें, मुफ्त नाई दुकानें, मुफ्त तेज रफ्तार बसें चलेंगी, किराए में कटौती होगी और 2030 तक न्यूनतम मजदूरी को फिलहाल 16.50 डॉलर प्रति घंटे से बढ़ाकर 30 डॉलर प्रति घंटा कर दिया जाएगा। वे अमीरों पर कर लगाकर अपने समाजवादी अभियान को आगे बढ़ाएंगे। पड़ोसी राज्य न्यू जर्सी की तरह कॉर्पोरेट कर की दर बढ़ाकर 11.5 प्रतिशत कर दी जाएगी और प्रति वर्ष 10 लाख डॉलर से ज्यादा कमाने वालों पर 2 प्रतिशत आयकर लगाया जाएगा।
इन वादों से न्यूयॉर्क के अमीर लोग हैरान रह गए। खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ममदानी को कट्टर कम्युनिस्ट करार दिया, जो न्यूयॉर्क से कारोबार को खदेड़ देगा। अमीर चंदा देने वालों ने ममदानी के प्रतिद्वंद्वी, दागदार पूर्व गवर्नर एंड्रयू कुओमो को ज्यादा फंड मुहैया कराया, ताकि ममदानी को हराया जा सके।
पूर्व डेमोक्रेटिक मेयर माइकल ब्लूमबर्ग ने 1.33 करोड़ डॉलर और कॉस्मेटिक क्षेत्र की दिग्गज कंपनियों में एक, एस्टी लॉडर ने 2.59 करोड़ डॉलर का चंदा दिया। एयर बीएनबी के जो गेबिया ने 20 लाख डॉलर, हेज फंड मैनेजर बिल एकरमैन ने 1.75 अरब डॉलर और वॉलमार्ट की उत्तराधिकारी एलिस वाल्टन ने ममदानी को हराने के लिए 2 लाख डॉलर का चंदा दिया। लेकिन धनबल ममदानी को हरा नहीं सका।
न्यूयॉर्क के आम लोगों ने उन पर भरोसा किया, क्योंकि वे उनके जैसे हैं। वे न तो आम नेता जैसे दिखते हैं और न ही उनका आचार-व्यवहार वैसा है। वे न्याय और समानता के हक में खुलकर बोलते हैं। वे धन के पुनर्वितरण, सार्वजनिक निवेश और सामूहिक स्वामित्व की भाषा बोलते हैं, जिसे नेता अतिवादी मुद्दे समझकर नहीं उठाते हैं, लेकिन अब युवाओं को ये मुद्दे पसंद आ रहे हैं।
ममदानी के अभियान ने विविध सामुदायिक, मजदूर वर्ग का गठबंधन बनाया, जिससे शहर की सामाजिक सीमाएं टूट गईं। यह प्रचार टेलीविजन विज्ञापनों या चंदा देने वालों की अमीरी के आसरे नहीं था। यह प्रचार हर दरवाजे, सड़क और फुटपाथों पर दस्तक दे रहा था।
ममदानी अपने कई समर्थकों की तरह फलस्तीन समर्थक हैं। जैसे-जैसे गजा युद्ध आगे बढ़ा, लोगों ने मुख्यधारा की मीडिया के बदले लाइवस्ट्रीम, टिकटॉक वीडियो और इंस्टाग्राम पर लोगों के दुख की दिल दहला देने वाली तस्वीरों पर भरोसा किया। युद्ध की क्रूरता के कारण अमेरिका के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए। माहौल निश्चित रूप से युद्ध-विरोधी और नेतन्याहू-विरोधी था। कई शहरी प्रगतिशील लोगों के लिए नैतिक सवाल खड़ा हो गया, जिनमें बड़ी संख्या में यहूदी न्यूयॉर्कर भी थे।
गजा कत्लेआम पर खुलकर बोलने में आम डेमोक्रेट लाइन के विपरीत वे बर्नी सैंडर्स, एलेक्जेंड्रिया ओकासियो-कोर्टेज और कुछ अन्य लोगों की कतार में खड़े थे। दशकों तक इज्राएल पर मुख्यधारा की डेमोक्रेटिक पार्टी की लाइन फलस्तीन पर इज्राएल की नीति पर सवाल उठाने से बचती रही है। ताकतवर यहूदी लॉबी से दोनों पक्षों के सांसदों को अरबों डॉलर चंदा मिलता है, इसलिए बहुत कम नेता इज्राएल पर सवाल उठाने की हिम्मत दिखाते हैं।
इसका एक उदाहरण जून में हुए प्राइमरी चुनावों में डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थन के लिए होड़ कर रहे नौ उम्मीदवारों की पहली बहस थी। जब उम्मीदवारों से पूछा गया कि चुनाव के बाद वे किस देश की यात्रा करेंगे, तो ज्यादातर ने इज्राएल का नाम लिया। हालांकि, ममदानी ने कहा कि वे न्यूयॉर्क में ही रहेंगे, जिसकी इज्राएल समर्थक समूहों ने आलोचना की। यहूदी लॉबी का अमेरिकी नेताओं पर भारी दबदबा है। आलोचकों ने ममदानी को जिहादी के रूप में पेश किया, और यहां तक कि ट्विन टावर्स और उनकी तस्वीर वाला एक पोस्टर भी निकाला, जिसका इशारा था कि वे आतंकवाद के समर्थक हैं।
लेकिन नैरेटिव बदल रहा है, खासकर युवा मतदाताओं के बीच, जो इज्राएल-फलस्तीन के मामले को मानवाधिकारों, सत्ता और जवाबदेही के चश्मे से देखते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि सभी मतदाता ममदानी से सहमत हैं। नतीजों के बाद, इज्राएल में एक दक्षिणपंथी विपक्षी दल के नेता एविगडोर लिबरमैन ने कहा, ‘‘बिग ऐपल ढह गया,’’ और ‘‘न्यूयॉर्क के यहूदियों से जो जीवित रहना चाहते हैं’’ आग्रह किया कि वे ‘‘अपने मूल स्थान इज्राएल की भूमि’’ पर लौट आएं।
क्या ममदानी की जीत अमेरिकी राजनीति में बड़ा बदलाव है या कट्टर राजनैतिक माहौल, ट्रंप की प्रवासी-विरोधी नीतियों और बढ़ती महंगाई के प्रति गुस्से से उपजी अपवाद घटना? अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी।
आगे की राह कठिन है। अगर ममदानी आवास, परिवहन और सार्वजनिक सेवाओं में सुधार ला पाते हैं, अगर शहर में कामकाजी और मध्यम वर्ग के लोगों का जीवन बेहतर हो जाता है, तो वे बड़े डेमोक्रेट नेता बन सकते हैं।
ममदानी ने अपने विजय भाषण में कहा कि चुनाव प्रचार कविता जैसा है, लेकिन राजकाज आलेख जैसा। उन्हें आगे आने वाली मुश्किलों का एहसास है। न्यूयॉर्क का शासन तंत्र मेयर की ताकत को सीमित करने के लिए बनाया गया है और ट्रम्प ने ठीक यही करने और संघीय वित्त आवंटन में कटौती की धमकी दी है। इसके अलावा, ममदानी को उन रियल एस्टेट लॉबियों का भी सामना करना होगा, जो न्यूयॉर्क शहर के राजस्व स्रोतों से गहराई से जुड़ी हैं। शहर का बजट संपत्ति करों पर निर्भर है, जिससे किफायती आवास बनाना और भी मुश्किल हो जाता है। शहरी नौकरशाही मेयर के हर कदम का विरोध कर सकती है।
चुनाव जीतना एक बात है। 80 लाख लोगों वाले शहर का प्रशासन चलाना दूसरी बात होगी। ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के दस महीने बाद वोटर ने उनके रिपब्लिकन उम्मीदवारों को पूरी तरह से नकार दिया है। न्यूजर्सी में मिकी शेरिल और वर्जीनिया में एबिगेल स्पैनबर्गर जैसे उदारवादी डेमोक्रेट ने ट्रम्प के रिपब्लिकन उम्मीदवारों को हराकर गवर्नर पद की दौड़ जीत ली है। राज्य से और सीटें जोड़ने के लिए गवर्नर गेविन न्यूसम के धन के बंटवारे के उपाय को भी लोगों का समर्थन मिला। यह यकीनन अगले साल होने वाले कांग्रेस चुनावों के लिए निराश डेमोक्रेटिक को मजबूती प्रदान करेगा। क्या डेमोक्रेटिक पार्टी न्यूयॉर्क में ममदानी की जीत से सीख लेगी? या इस जीत को ट्रम्प की कार्यशैली की स्वाभाविक प्रतिक्रिया के रूप में लिया जाएगा? क्या पार्टी अपने पुराने तौर-तरीकों को त्यागकर अमेरिकी राजनीति के बदलते स्वरूप को अपनाएगी, क्योंकि बुजुर्गों और युवाओं के बीच, और राजनीति की शैली के बीच, एक बढ़ती हुई खाई है? कोई नहीं जानता।