ट्रम्प दादागीरी: दुनिया दोफाड़
गजा के कथित पुनर्निर्माण के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति के शांति बोर्ड के जरिए संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाओं को बेमानी बनाने की कोशिश, ग्रीनलैंड पर दावे से दुनिया भर में बेचैनी
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ‘शांति बोर्ड’ का मूल मकसद गजा के पुनर्निर्माण की देखरेख करना था, जिसकी घोषणा पिछले सितंबर में 20-सूत्री शांति योजना के हिस्से के रूप में की गई थी। उसमें पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, ट्रम्प के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और राष्ट्रपति के दामाद जेरेड कुशनर संस्थापक कार्यकारी बोर्ड के सदस्य थे। लेकिन तबसे उसका दायरा बढ़ गया है और अब ट्रम्प कह रहे हैं कि इस मॉडल का इस्तेमाल भविष्य में संघर्ष सुलझाने के लिए किया जा सकता है। इससे पूरी दुनिया में बेचैनी है, क्योंकि इस बोर्ड को संयुक्त राष्ट्र की पारंपरिक भूमिका में दखल देने वाला माना जा रहा है।
चार्टर के एक ड्राफ्ट में कहा गया है, ‘‘अमेरिकी राष्ट्रपति बोर्ड के पहले चेयरमैन होंगे और उन्हें दुनिया भर में शांति को बढ़ावा देने और संघर्षों को सुलझाने का काम सौंपा जाएगा।’’ उसमें यह भी कहा गया है कि बोर्ड ‘‘अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार शांति-निर्माण कार्य’’ करेगा, जिससे पूरी दुनिया में खतरे की घंटी बज गई है।
संयुक्त राष्ट्र और दूसरे बहुपक्षीय संगठनों के प्रति ट्रम्प की नफरत जगजाहिर है। इस महीने की शुरुआत में डोनाल्ड ट्रम्प ने एक मेमोरेंडम पर दस्तखत किए, जिसमें अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकलने की बात है। उसमें 31 संयुक्त राष्ट्र संस्थाएं और प्रधानमंत्री मोदी के अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन जैसे 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र संधियां है, जो बहुपक्षीय जुड़ाव से पीछे हटने की निशानी है। इसके पीछे वजह यह बताई गई कि ये संगठन बेकार और फिजूलखर्च थे।
नवंबर में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने शांति बोर्ड को मंजूरी दी, लेकिन सिर्फ 2027 तक। साथ ही यह भी कि इसका फोकस सिर्फ गजा पर होगा। रूस और चीन ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया। उनका कहना है कि अमेरिका के प्रस्ताव में संयुक्त राष्ट्र को गजा में किसी साफ भूमिका का जिक्र नहीं है।
ट्रम्प ने 50 देशों को शामिल होने के लिए न्यौते भेजे, लेकिन गुरुवार को दावोस में दस्तखत कार्यक्रम में सिर्फ 19 देशों के प्रतिनिधि ही पहुंचे। सीएनएन ने एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी के हवाले से बताया था कि लगभग 35 देशों ने इसमें शामिल होने की सहमति दी थी। रूस और चीन को भी न्यौता भेजा गया था। भारत और पाकिस्तान भी इस सूची में थे। इस्लामाबाद ने हिस्सा लेने पर सहमति जताई, जबकि भारत ने अभी तक कोई फैसला नहीं किया है और वह कार्यक्रम से दूर रहा।
इसकी स्थायी सदस्यता की कीमत 1 अरब डॉलर है, जबकि तीन साल की सदस्यता मुफ्त है। रूस के व्लादिमीर पुतिन शामिल होना चाहते थे, लेकिन उन्होंने कहा कि एक अरब डॉलर की फीस मॉस्को के उन फंड से आनी चाहिए, जिन्हें यूक्रेन में फौजी कार्रवाई के बाद से जो बाइडन सरकार ने फ्रीज कर दिया है।
पुतिन ने कहा, ‘‘इससे पहले कि हम शांति बोर्ड में औपचारिक रूप से हिस्सा लेने का फैसला करें, फलस्तीनी लोगों के साथ रूस के खास रिश्तों के मद्देनजर मेरा मानना है कि हम परिषद को एक अरब अमेरिकी डॉलर भेज सकते हैं। इसके लिए उन रूसी संपत्तियों का इस्तेमाल किया जाए, जिन्हें पिछली अमेरिकी सरकार के तहत फ्रीज किया गया था।’’
चार यूरोपीय देशों फ्रांस, स्वीडन, नॉर्वे और स्लोवानिया ने बोर्ड का हिस्सा बनने से मना कर दिया है। स्लोवानिया के प्रधानमंत्री रॉबर्ट गोलोब ने कहा कि ‘‘न्यौता स्वीकार करने का समय अभी नहीं आया है।’’ ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की ट्रम्प की पिछली धमकी के बाद फ्रांस और अमेरिका के रिश्तों में खटास आ गई है। राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां की सरकार ने ट्रम्प की संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश के मद्देनजर उससे दूर रहने का फैसला किया है। फ्रांस, अमेरिका, ब्रिटेन, रूस और चीन के साथ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है।
फ्रांस के विदेश मंत्री ज्यां नोएल बैरो ने कहा, ‘‘अमेरिका के राष्ट्रपति की शांति योजना के लिए हां है, जिसका हम पूरे दिल से समर्थन करते हैं, लेकिन वैसा संगठन बनाने के लिए नहीं, जो संयुक्त राष्ट्र की जगह ले ले।’’ ट्रम्प और नॉर्वे के बीच नोबेल शांति पुरस्कार को लेकर विवाद हुआ है और ओस्लो अमेरिकी नेता को खुश करने के मूड में नहीं है।
ट्रम्प के लिए अच्छी खबर यह है कि बड़े मुस्लिम देश और जिन लोगों ने शांति समझौते को आगे बढ़ाने के लिए काम किया, वे शांति बोर्ड में शामिल हो रहे हैं। सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, जॉर्डन, कतर और मिस्र के साथ-साथ तुर्की भी अमेरिका की इस कोशिश का हिस्सा बन गए हैं। मोरक्को, पाकिस्तान, इंडोनेशिया, कोसोवो, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान और पैराग्वे और वियतनाम जैसे देश भी शामिल हैं। आर्मेनिया और अजरबैजान भी उसमें हैं। इज्राएल और बेंजामिन नेतन्याहू, जो ट्रम्प के करीबी दोस्त और सहयोगी हैं, बोर्ड का हिस्सा होंगे। लेकिन नेतन्याहू की मौजूदगी से फलस्तीनी लोग खुश नहीं हैं, जो उन्हें गजा में कत्लेआम का दोषी मानते हैं।
कनाडा ने कहा है कि वह ‘‘सैद्धांतिक रूप से’’ शामिल होने पर सहमत हो गया है, लेकिन बारीकियों पर विचार कर रहा है। हालांकि, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान जैसे प्रमुख पश्चिमी सहयोगी अभी तक इसमें शामिल नहीं हुए हैं और बोर्ड के लिए दस्तखत समारोह में मौजूद नहीं हुए। ट्रम्प विश्व आर्थिक फोरम में शामिल होने के लिए दावोस में हैं। इटली की जियोर्जिया मेलोनी कुछ दिनों में शामिल हो सकती हैं। वे भी अमेरिकी राष्ट्रपति की दोस्त हैं। पोप लियो को भी न्यौता दिया गया, लेकिन वे नहीं आए।
बहरहाल, किसी को पक्का नहीं पता कि बोर्ड आखिर कैसे काम करेगा। सबसे जरूरी बात यह है कि गजा के तबाह लोगों के लिए नागरिक सुविधाओं को फिर से बनाया जाए और उन्हें साफ पानी, खाना और मेडिकल मदद दी जाए। खैर, इस कूटनीतिक खींचतान के बीच गजा में जमीनी हकीकत तबाही, विस्थापन और दयनीय बनी हुई है। शांति बोर्ड नया मोड़ लाएगा या सिर्फ एक प्रयोग भर बनकर रह जाएगा, इसका फैसला बैठकों में नहीं, बल्कि गजा की जमीन पर होगा।
जुड़ें या छोड़ दें
अभी तक भारत की तरफ से इस बात पर कुछ खास नहीं कहा गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार हमास को बेहथियार करने, टेक्नोक्रेटिक शासन और इज्राएली बमबारी से तबाह गजा के पुनर्निर्माण के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ‘शांति बोर्ड’ में शामिल होना चाहिए या नहीं। इसलिए भारत दावोस के हस्ताक्षर समारोह से अलग रहा।
यह 20-सूत्रीय अमेरिकी शांति योजना का दूसरा चरण है, जो पिछले साल 10 अक्टूबर से शुरू हुआ था। इस योजना से युद्धविराम हुआ और इज्राएली बंधकों को रिहा किया गया। लेकिन पहला चरण काफी धीमा रहा, जिसमें इज्राएली फौज आइडीएफ ने सहमत प्रस्तावों पर अमल नहीं किया है।
यह प्रस्ताव भारत को मुश्किल में डालता है, क्योंकि अमेरिका के नेतृत्व वाली यह पहल संयुक्त राष्ट्र को दरकिनार करती है और युद्ध के बाद की राजनैतिक व्यवस्था में वाशिंगटन को पूरी तरह से ड्राइवर सीट पर बिठाती है। हालांकि भारत अमेरिका के साथ अपने संबंधों को सुधारने की उम्मीद कर रहा है, जो पिछले साल ट्रम्प के टैरिफ और पाकिस्तान की तरफ झुकाव से खराब हो गए थे। अब द्विपक्षीय व्यापार समझौते के लिए बातचीत चल रही है। ऐसे में वाशिंगटन को और नाराज करना भारत के हित में नहीं हो सकता है। बोर्ड से भारत की दूरी ट्रम्प को शायद ही पसंद आए।
हालांकि, बोर्ड का विचार भारत की संयुक्त राष्ट्र जैसे बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार और उन्हें मजबूत करने के लंबे समय के नजरिए के खिलाफ है। संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा स्वरूप से निराशा के बावजूद भारत का मानना है कि युद्धों और टकरावों का समाधान बड़ी शक्तियों के हितों के इर्दगिर्द अल्पकालिक गठजोड़ों से नहीं हो सकता। शांति प्रस्ताव में अमेरिका के व्यावसायिक प्राथमिकताओं और इज्राएल के सुरक्षा हितों के हावी रहने की उम्मीद है, इसलिए पहले ही यह सवाल उठ रहे हैं कि गजा के लोगों के हितों को कितनी जगह मिलेगी। असल में, पुनर्निर्माण और राजकाज के मुद्दों पर बात करने से पहले वहां लोगों के लिए फौरी जरूरत रहने की अस्थायी व्यवस्था और कड़ाके की ठंड से बचाव की है।
फलस्तीन के भारत में राजदूत अब्दुल्ला एम. अबू शावेश कहते हैं, ‘‘बेशक, भारत को इसमें शामिल होना चाहिए। बाहर रहने के बजाय अंदर रहना हमेशा फायदेमंद होता है। हम बस यह पक्का करना चाहते हैं कि ये सभी कदम अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव के मुताबिक हों।’’ उन्हें उम्मीद है कि नई दिल्ली इस पर कड़ी नजर रखेगी और यह आश्वस्त करेगी कि शांति योजना में संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का उल्लंघन न हो।
हालांकि, भारत में इस पर राय बंटी हुई है। सत्ता-प्रतिष्ठान के एक तबके का मानना है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र और उसकी संस्थाओं को दरकिनार करने की किसी भी कोशिश से दूर रहना चाहिए और इस प्रस्ताव को विनम्रता से ठुकरा देना चाहिए।
रिटायर राजदूत के.पी. फेबियन कहते हैं, ‘‘भारत को इससे नहीं जुड़ना चाहिए। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि ट्रम्प ने अपनी अकड़ और नासमझी में नए अंतरराष्ट्रीय संगठन के लिए एक चार्टर तैयार किया है। अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक, ऐसा चार्टर राजनयिक सम्मेलन में, बल्कि ऐसे कई सम्मेलनों की शृंखला में तैयार किया जाना चाहिए।’’
लेकिन सरकार में मौजूद व्यावहारिक नजरिए वाले लोग जानते हैं कि इस मौके पर वॉशिंगटन को नाराज करने के क्या खतरे हैं। मोदी मिस्र के शर्म अल-शेख में युद्धविराम समझौते में शामिल नहीं हुए थे, जिसमें ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के साथ-साथ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ समेत 20 से ज्यादा विश्व नेता शामिल हुए थे। पिछले साल अक्टूबर में भारत-अमेरिका संबंध गर्त में पहुंच गए थे। अमेरिका के नए राजदूत सर्जियो गोर के आने के बाद से हालात बेहतर हुए हैं। असल में उन्होंने ही ट्रम्प का मोदी को दिया गया न्योता एक्स पर पोस्ट किया था।
रिटायर राजनयिकों सहित कई विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल भारत तीन साल के लिए मुफ्त सदस्यता ले सकता है और कार्यकाल खत्म होने पर जारी रखने या छोड़ने का विकल्प चुन सकता है। इससे एक तीर से दो निशाने लगेंगे, इससे ट्रम्प नाराज नहीं होंगे और तीन साल बाद अगर नई दिल्ली को लगता है कि बिना आवाज के बोर्ड में बैठना फायदेमंद नहीं है, तो उसके पास छोड़ने का विकल्प होगा। तब तक ट्रम्प का कार्यकाल भी खत्म हो जाएगा।
शांति बोर्ड में शामिल: अर्जेंटीना, आर्मेनिया, अजरबैजान, बहरीन, बेलारूस, मिस्र, हंगरी, इंडोनेशिया, इज्राएल, जॉर्डन, कजाकिस्तान, कोसोवो, मोरक्को, पाकिस्तान, कतर, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, उज़्बेकिस्तान और वियतनाम
जो शामिल नहीं: फ्रांस, नॉर्वे, स्वीडन और स्लोवानिया
जो दुविधा में: ब्रिटेन, चीन, क्रोएशिया, जर्मनी, भारत, यूरोपीय संघ की कार्यकारी शाखा, पैराग्वे, रूस, सिंगापुर और यूक्रेन