आवरण कथा/जेफरी एपस्टीन: अंधेरी दुनिया का आईना
बाल यौन अपराधी, रसूखदारों, अमीरों वगैरह के लिए ऐशगाह चलाने वाला, दुनिया भर के कई सत्तावानों को जाल में फांसने वाला, नीतियों में हेरफेर कराने वाला या क्या था एपस्टीन और कैसा, कितना विशाल था उसका नेटवर्क, कैसे बनाया उसने यह तंत्र
भारतीय मूल के अमेरिकी, वैकल्पिक चिकित्सा-पद्धति की पैरोकारी के लिए चर्चित दीपक चोपड़ा के साथ 8 मार्च, 2017 की अमेरिकी फाइनांसर तथा यौन शोषण के एक मामले में सजा पाए अपराधी जेफरी एपस्टीन के साथ ई-मेल पर रूप-अरूप (मूर्त-अमूर्त) पर संवाद शुरू हुआ। एक मेल में एपस्टीन पूछता है, “क्या सेल (कोशिका) का कोई रूप होता है? क्या सेल में चेतना होती है? क्या उसमें कोई भावना होती है? क्या वह कुछ करती है?” इन गहरे वैज्ञानिक और दार्शनिक सवालों के साथ एक छिछोरी जिज्ञासा भी छलक आती है “क्या मेरे लिए कोई इज्राएली हसीन ढूंढी? :)”
चोपड़ा का जवाब दिलचस्प था, “सेल इंसानी दिमाग की उपज है। ऐसी कोई चीज नहीं! यूनिवर्स (ब्रम्हांड) इंसानी दिमाग की कल्पना है। ऐसा कुछ नहीं।” मतलब था कि न सेल और न ही यूनिवर्स असली हैं; वे इंसानी कल्पना में हैं। फिर, शायद उस सवाल के जवाब में कि क्या सेल में चेतना होती है, चोपड़ा लिखते हैं, “हसीन लड़कियां तब चैतन्य होती हैं जब उनकी चीख निकल आती है।”

न्याय विभाग ने एपस्टीन के कागज सार्वजनिक किए
“ईश्वर का शुक्र है,” एपस्टीन ने जवाब दिया। चोपड़ा कुछ और खुले: “ईश्वर कल्पना है, हसीन लड़कियां असली।” बातचीत ठीक वहीं जा रही थी जहां दोनों ले जाना चाहते थे। “तो, जब लड़की चीखती है, ‘ओह माय गॉड’?” एपस्टीन ने पूछा। चोपड़ा का जवाब था, “वह दैवीय चेतना है।” एपस्टीन फौरन बोला, “ओह, मुझे लगा कि वह मुझे कह रही है।” चोपड़ा ने लिखा, “क्योंकि तुम अपने दायरे में भगवान जो हो।” लबोलुआब यह कि सेक्स, खासकर हसीन लड़कियों के साथ, ही असली है।
यह बातचीत तब की है, जब एपस्टीन यौन अपराधों के नए अदालती मामलों की वजह से फिर सुर्खियों में उछला था। खासकर एपस्टीन के खिलाफ मोर्चा खोलने वालों में एक वर्जीनिया गिफ्रे ने 2015 में नाबालिगों के यौन शोषण के आरोप फिर अदालत में ले आई थीं।

एक पीड़ित की डायरी
एपस्टीन को 2008-09 के दौरान 13 महीने जेल की सजा हुई थी। तब उसने अधिकारियों की मिलीभगत से एक नाबालिग लड़की को वेश्यावृत्ति के लिए दबाव डालने के मामले को थोड़ा हल्का करवा लिया था। हालांकि, हर कोई जानता था कि नाबालिगों के साथ सेक्स की उसकी वासना तीव्र थी। अब दोबारा राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रम्प ही 2002 में कह चुके थे, “उसे भी हसीन औरतें पसंद हैं और मुझे भी, कुछ कम उम्र की।” लेकिन एपस्टीन के जेल से बाहर आने के बाद ये चर्चाएं मंद पड़ गई थीं। फिर 2015 में गिफ्रे की कोशिशों से सुर्खियां बनीं। उसके बाद जनवरी 2017 में सारा रैनसम ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और आरोपियों में ब्रिटेन के प्रिंस एंड्रयू जैसों के भी नाम थे।
ये सब मीडिया की सुर्खियों में छाई हुई थीं। लेकिन इससे चोपड़ा को कई फर्क नहीं पड़ा। उनकी एपस्टीन से “लड़कियों” को लेकर बातचीत जारी रही। 2018 के आखिर में मीडिया में नई खोजी रिपोर्टों के बाद फेडरल जांच फिर से शुरू हुई। एपस्टीन के िखलाफ कार्रवाई की आवाजें भी तेज हुईं। 23 फरवरी, 2019 को एपस्टीन ने उससे वित्तीय सलाह ले रहे मशहूर भाषाविद नोम चॉम्स्की से ईमेल में “सड़ियल प्रेस” से निपटने की सलाह मांगी।

साहसः खोजी पत्रकार कैरल कैडवॉल्डर
एपस्टीन ने लिखा कि मीडिया कवरेज “बेकाबू हो रहा है” और चॉम्स्की से पूछा कि क्या उसे अपने बचाव में किसी से किसी अखबार में ऑप-एड लिखवाना चाहिए, क्योंकि “भीड़ का रवैया हिंसक होता है!” चॉम्स्की उसके प्रति थोड़ी हमदर्दी जताते हुए लगे। चॉम्स्की ने उसे सब कुछ अनदेखा करने की सलाह दी। उन्होंने लिखा, “कई सिर्फ पब्लिसिटी चाहने वाले या सनकी लोग होते हैं, जिनका जवाब देना नामुमकिन है। आखिर, कैसे साबित करोगे कि तुम नियो-नाजी नहीं हो, जो यहूदियों को मारना चाहता है, या रेपिस्ट नहीं हो, या जो भी इल्जाम लगे?” उस वक्त #मी टू मुहिम भी तेज थी। चॉम्स्की ने लिखा कि महिलाओं के साथ दुराचार को लेकर “हिस्टीरिया पैदा हो गया है” और “इस हद तक कि किसी आरोप पर सवाल उठाना भी हत्या जैसा जुर्म बन गया है।”

एपस्टीन से जुड़े लोग
एपस्टीन का यही महाजाल था, जिससे वह नेताओं, धन्नासेठों या सांस्कृतिक-बौद्घिक शख्सियतों को फांस लेता था और उन्हें कई तरह के नैतिक-अनैतिक फंसान से निकलने में मदद करता था।
एपस्टीन 10 अगस्त, 2019 को न्यूयॉर्क की एक जेल की कोठरी में छत से लटका हुआ मिला, जिससे उसकी मौत भी रहस्यमय हो गई। सरकार ने उसे खुदकशी बताया। उसके भाई समेत कई लोगों ने उसे हत्या कहा। तब वह 66 साल का था।
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करोड़पति सीरियल बलात्कारी एपस्टीन की पैदाइश अमीर घर में नहीं हुई थी। वह न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन में कोनी आइलैंड के एक वर्किंग क्लास मोहल्ले में पला-बढ़ा। उसके यहूदी आप्रवासी पिता न्यूयॉर्क सिटी डिपार्टमेंट ऑफ पार्क्स ऐंड रिक्रिएशन में दरबान हुआ करते थे। एपस्टीन ने कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी, फिर भी वह 1973-74 में न्यूयॉर्क शहर के एलीट प्राइवेट स्कूल, डाल्टन स्कूल में विज्ञान और गणित पढ़ाने की नौकरी पा गया।
फिर, 1976 में एक छात्र के पिता से अचानक मुलाकात से उसके लिए वॉल स्ट्रीट का दरवाजा खुल गया। वहां उसने तब की जानी-मानी निवेश फर्म बेयर स्टर्न्स में अकाउंट अधिकारी की नौकरी जुगाड़ ली। कुछ समय बाद वह दो कॉलेजों से फर्जी डिग्री जमा करते पकड़ा गया, लेकिन उसे कोई सजा नहीं हुई, क्योंकि उसने अपने सुपरवाइजर की बेटी से नाता जोड़ लिया था। 1980 में एक दोस्त को शेयर खरीदने के लिए लोन दिलाने के मामले में उसका झगड़ा हुआ तो उसे बेयर स्टर्न्स से इस्तीफा देना पड़ा। तब तक उसके पास अपने होमटाउन में एक घर और मैनहट्टन में दूसरा घर था। वह एक अपार्टमेंट खरीदने के इरादे से फ्लोरिडा के पाम बीच जाने लगा था।
बेयर स्टर्न्स से हटने के बाद उसने कभी कोई पूर्णकालिक नौकरी नहीं की। वह शेयर बाजार में दलाली करने लगा। उसने अमेरिकी सरकार के लिए “फाइनेंशियल बाउंटी हंटर” के तौर पर भी काम किया। उस दौरान वह मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मामलों की रिपोर्ट अधिकारियों को करता था और बदले में इनाम पाता था। 1990 के दशक की शुरुआत तक उसका नाम कई विवादों में जुड़ने लगा था। उस समय अमेरिका में सबसे बड़ी पोंजी स्कीम कंपनी टावर्स फाइनेंशियल कॉर्पोरेशन के बंद होने के बाद उसके प्रमोटर ने एपस्टीन को स्कीम का “टेक्निकल फरेबी” कहा था। एपस्टीन 1987 और 1989 के बीच कंपनी से कंसल्टेंट के तौर पर जुड़ा था।
उस समय तक एपस्टीन को गिसलेन मैक्सवेल के रूप में हमकदम मिल गई थी, जो उससे आठ साल छोटी थी। ब्रिटिश सोशलाइट मैक्सवेल की लंदन और न्यूयॉर्क के बड़े-बड़े लोगों तक पहुंच थी। उसके पिता, बदनाम लेकिन ताकतवर ब्रिटिश मीडिया मुगल रॉबर्ट मैक्सवेल की महारानी से दोस्ती थी, और ब्रिटेन में उसका बहुत असर था। मैक्सवेल पहली बार 1991 में न्यूयॉर्क आई थी, और उसी साल बाद में अपने पिता की रहस्यमयी मौत के बाद न्यूयॉर्क में बस गई।
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मैक्सवेल एपस्टीन से मिली, तो 30 साल की थी। वह एपस्टीन को पसंद आने वाली लड़कियों की उम्र से बड़ी थी। फिर भी, उनकी आपस में अच्छी बॉन्डिंग हो गई। वह एपस्टीन के लिए रसूखदार बिरादरी में पैठ की सीढ़ी बनी। यानी एपस्टीन को लकदक बॉलरूम और प्राइवेट सैलून के लिए एंट्री पास बन गई, जहां राजनयिकों, नेताओं और शाही परिवारों का आना-जाना रहता था। 1996 की शुरुआत में ही, एपस्टीन के पास ‘लोलिता एक्सप्रेस’ नाम का प्राइवेट प्लेन था (उसने यह नाम व्लादिमीर नाबोकोव के मशहूर उपन्यास से उधार लिया था), जिससे नाबालिगों को वाइल्ड पार्टियों के लिए कैरिबियन द्वीप ले जाया जाता था। 2002 तक, वह इतना अमीर और ताकतवर हो गया था कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, एक्टर केविन स्पेसी और क्रिस टकर को अपने खास बोइंग 727 से अफ्रीका ले जा सकता था। इस तरह दुनिया का ध्यान इस रहस्यमयी फाइनांसर की ओर गया।
उसके शिकार हुए लोगों और साथियों ने उसकी ताकत के बारे में जो सबसे खास बात बताई, वह थी उसकी झांसा देने और ब्लैकमेल करने की काबिलियत। वह किसी भी हालात से पार पाने में माहिर था। 2000 के दशक के मध्य में उसके खिलाफ आरोप लगने शुरू हुए तो एपस्टीन को “फरेबी उस्ताद” कहा जाने लगा।
उसने 27 जुलाई, 2013 में किसी को जन्मदिन की बधाई दी, तो उसने जवाब में उसे “झूठा, कुकर्मी, मैनिपुलेटर, बूढ़ा” कहा और उससे दूर रहने की हिदायत दी। 1 मार्च, 2016 को एक और औरत ने उसे लिखा: “मैं मैनिपुलेटर नहीं हूं, मैं सच बोलने वाली हूं।” एपस्टीन उससे चाह रहा था कि वह पैसों के बदले उसकी “मसाज” करे और “लड़कियां” सप्लाई करे। एक वकील कुछ साल पहले एपस्टीन के साथ “नाबोकोव-लोलिता एक्सपीरियंस” यानी नाबालिगों के साथ सेक्स का मजा ले चुका था। उसने 2014 में एपस्टीन की तारीफ में “गजब का मनोविज्ञानी और खतरनाक मैनिपुलेटर” बताया। वह एपस्टीन को लड़कियां भी सप्लाई कर चुका था।
एपस्टीन और प्रिंस एंड्रयू की हवस की शिकार बनीं दिवंगत वर्जीनिया गिफ्रे के मुताबिक, एपस्टीन के न्यूयॉर्क वाले घर के टॉयलेट में भी कैमरे लगे थे। पार्टियों के दौरान, एपस्टीन हमेशा सबूत इकट्ठा करता रहता था। वह ब्लैकमेल करने के लिए तैयार रहता था ताकि उसके अपने जुर्म कभी सामने न आएं या यह पक्का करने के लिए कि सत्ता दलाली के तौर पर उसका काम बिना किसी गलती के चलता रहे।
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एपस्टीन अपनी साख बनाने के लिए, खासकर पहली जेल की सजा के बाद, शैक्षणिक, वैज्ञानिक रिसर्च और कला संस्थानों और आयोजनों को फंड किया करता था। एक डॉक्यूमेंट्री में उसके एक पुराने साथी का कहना है कि वह अकादमिक आयोजनों में बड़े चेक लेकर आता था। यह फंडिंग कम उम्र लड़कियों को फंसाने का एक तरीका था। मसलन, एनी फार्मर को मैक्सवेल ने यह वादा करके फुसलाया था कि एपस्टीन उसकी विदेश में पढ़ाई के लिए पैसे देगा। उसने उन लड़कियों पर सैकड़ों डॉलर लुटाए, जिन्हें मैक्सवेल ने मसाज के लिए ‘खरीदा’ था।
2021 से जेल की सजा काट रही मैक्सवेल ने न सिर्फ उसके लिए लड़कियां जुटाईं, बल्कि उसके कुछ सेक्सुअल कामों में भी हिस्सा लिया।
लिटिल सेंट जेम्स आइलैंड जिसे, ‘ऑर्जी आइलैंड’ भी कहा जाता है के एक पुराने कर्मचारी ने कहा, “एपस्टीन सोशियोपैथ था जो अपनी गलत आदतों का इंतजाम करीने से करता था।”
वह ऐसा इसलिए कर सका क्योंकि उसके साथ ताकतवर लोग थे, जिन्हें उसने अपने खेल में शामिल किया था। इस तरह उसका दायरा लगातार बढ़ता गया। 17 जून, 2013 को फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी के सलाहकार ओलिवियर कोलॉम को भेजे एक ईमेल में एपस्टीन ने कहा कि कुछ लड़कियां “झींगे जैसी होती हैं, आप सिर फेंक देते हैं और शरीर रखते हैं।” कोलोम ने एपस्टीन की तारीफ की।
एपस्टीन ने एक बार कहा था, “मैं अपने आप में बहुत सहज हूं। मैं असल में सब कुछ करने के लिए आजाद हूं।” और उसकी आजादी का मतलब था दूसरों की गुलामी।
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आउटलुक ने एपस्टीन के कुछ उपलब्ध वीडियो क्लिप्स विश्लेषण के लिए दिल्ली में रहने वाली क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट मेघा कालरा को भेजे। वे बताती हैं कि अपने कामों के बारे में बात करने का उसका तरीका अपने अपराधों को सामान्य बताने का है। इससे उसकी झांसा देने की ताकत का अंदाजा लगता है।
कालरा कहती हैं, “उसकी पर्सनैलिटी ऐसी है कि अपने काम से उसे थ्रिल मिलता है और वह उसका मजा लेता है। कभी भी कुछ गलत करने का ख्याल उसे नहीं आता।” कहा जाता है कि एपस्टीन ने न्यू मेक्सिको के अपने रैंच का इस्तेमाल करके महिलाओं को अपने स्पर्म से प्रेग्नेंट करने की योजना बनाई थी, इस उम्मीद में कि एक बार में 20 महिलाएं उसके बच्चों को जन्म दें। जोरो रैंच “बेबी फार्म” के आरोप 2019 से सामने आ रहे हैं। यह प्लान उसके न्यूयॉर्क मेंशन में एक वैज्ञानिक के साथ तैयार किया गया था।
नई दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में भाषाविद् आयशा किदवई ने एपस्टीन के कुछ ईमेल की भाषा की समीक्षा की। किदवई कहती हैं, “उसे सिर्फ बच्चियां और नाबालिग लड़कियां चाहिए थीं क्योंकि उसे यही चाहिए था। उसे सिर्फ सेक्स नहीं, बल्कि पावर और कंट्रोल और रुतबे की जरूरत थी।” वे बताती हैं कि मीडिया और नेता उसके पीड़ितों को “कम उम्र की औरतें” कह रहे हैं, जबकि वे नाबालिग थीं। उसे बच्चों की जरूरत थी क्योंकि वे किसी भी तरह से झटका नहीं दे सकते, हमला नहीं कर सकते, तमाशा नहीं बना सकते या उसके पावर स्टेटस को ठेस नहीं पहुंचा सकते।”
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कुछ लोगों ने उसकी मौत को उसके चंगुल से बचने का आखिरी तरीका माना। ट्रायल खत्म होने तक उसे जमानत नहीं मिली। सबूत बढ़ते गए। उसे पकड़ लिया गया, उसकी आजादी छीन ली गई। एपस्टीन के कई पीड़ितों के वकील सिग्रिड मैककॉले ने कहा, “वह जिस तरह से जिया, उसी तरह मरा। उसने अपनी जिंदगी बिना किसी जवाबदेही के जी और उसकी मौत उसके पीड़ितों के लिए बस आखिर में ‘भाड़ में जाओ’ कहने जैसा था।” हालांकि, ‘धोखेबाजी’ का उसका आखिरी दिखावा ज्यादातर विफल हो गया। कथित आत्महत्या से दो दिन पहले, उसने अपनी सारी दौलत एक ट्रस्ट में ट्रांसफर कर दी, ताकि उसका पैसा मुआवजे के तौर पर पीड़ितों को न मिले। जैसा कि पता चला, उसने अपनी वसीयत में जिन लाभार्थियों का नाम लिया था, उनमें से किसी को भी कोई पैसा नहीं मिलेगा।