आवरण कथा/व्यापक नेटवर्क: फाइलों में तूफान
एपस्टीन खुलासों ने दुनिया के चर्चित अमीर, नेताओं और मशहूर हस्तियों की सडांध भरी झलक दिखाई, यूरोप में कई लोग पद से हटे लेकिन अमेरिका में कोई कार्रवाई नहीं
एपस्टीन फाइलों की गूंज दुनिया की सबसे शक्तिशाली राजधानियों तक महसूस की गई। इन फाइलों के जारी होने से राजनैतिक और सामाजिक तूफान खड़ा हो गया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की इन फाइलों को जारी करने का कोई इरादा नहीं था। बाद में एक रायशुमारी के जरिये ट्रम्प पर दबाव डाला गया, तब कहीं जाकर ट्रम्प प्रशासन ने अंततः एपस्टीन फाइलों का पहला हिस्सा जारी किया। जेफरी एपस्टीन की घिनौनी कहानी पहले से ही जानी-पहचानी थी। कुछ नाम भी लोगों के सामने थे। लेकिन अमेरिकी न्याय विभाग ने जब तीस लाख दस्तावेज अपलोड किए, तो अमीरों और मशहूर लोगों की जिंदगी में झांकने की जैसे एक खिड़की खुल गई। इन दस्तावेजों ने तमाम सीमाएं लांघते हुए, उस वैश्विक अनैतिक अभिजात वर्ग के घिनौने सच को उजागर किया, जो खुद को परोपकार और बौद्धिक चमक-दमक की आड़ में छिपाए हुए था। ये फाइलें महज इस बात की सूची नहीं हैं कि कौन किससे मिला। ये साजिशों के गहरे जाल को सामने लाती हैं, जहां सत्ता का रसूख ही सबसे बड़ी ताकत है और जवाबदेही का कोई डर नहीं।
कौन है, जो इस सूची में नहीं है। राष्ट्रपति, राजकुमार, अरबपति, नोबेल पुरस्कार विजेता, हेज फंड के दिग्गज, विश्वविद्यालयों के कुलपति, राजघराने के लोग, टेक कंपनियों के संस्थापक, वामपंथ और दक्षिणपंथ दोनों खेमों की हस्तियां, सबके नाम उस द्वीप पर उड़ान भरने वाली सूची में जगह बनाए हुए हैं। पता दर्ज करने वाली पुस्तिकाओं, अतिथि सूचियों और चंदा देने वालों की सूचियों में ये नाम चमक रहे हैं।
इस सूची में दुनिया को चलाने-हिलाने वालों की बाकायदा फेहरिस्त है, जिसमें राष्ट्रपति ट्रम्प और बिल क्लिंटन से लेकर अमेरिका के वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक, महारानी एलिजाबेथ का बदनाम बेटा, (जिससे शाही उपाधि छीन ली गई और जो अब केवल एंड्रयू माउंटबेटन-विंडसर के नाम से जाना जाएगा), उसकी पूर्व पत्नी सारा फर्ग्यूसन, अमेरिका में ब्रिटेन के राजदूत लॉर्ड मैंडेलसन, नॉर्वे की क्राउन प्रिंसेस मेटे-मारिट, इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री एहुद बराक के साथ दुबई के सबसे ताकतवर और रसूखदार लोगों में एक सुल्तान अहमद बिन सुलेयम भी शामिल है, जो लॉजिस्टिक्स दिग्गज डीपी वर्ल्ड के पूर्व प्रमुख भी रहे हैं। इसके अलावा टेक जगत के अरबपति और परोपकारी बिल गेट्स, दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति एलॉन मस्क, ट्रम्प के कभी करीबी सलाहकार और ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (मागा) आंदोलन के प्रभावशाली चेहरे स्टीव बैनन भी इसमें नजर आते हैं। सूची इतनी लंबी है कि खत्म होने का नाम ही नहीं लेती।
एपस्टीन की अलग-अलग संपत्तियों में, उसके द्वीप सहित, लगाए गए निगरानी कैमरे गंभीर सवाल खड़ा करते हैं। क्या वह अपने मेहमानों पर नजर रख रहा था और उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए उनकी रिकॉर्डिंग कर रहा था? क्या वह किसी खुफिया एजेंसी के लिए काम कर रहा था? वह पक्का यहूदी था, इसलिए अटकलें लगती हैं कि उसका संबंध इजरायल के ‘डीप स्टेट’ से था। लेकिन कोई भी बात निश्चित रूप से नहीं कही जा सकती। जो बात निर्विवाद रूप से सामने है, वह यह कि वह एक बाल यौन अपराधी और सेक्स तस्कर था। यूरोप और रूस भर में उसके एजेंट फैले हुए थे, जो कम उम्र की लड़कियों को फुसलाकर उन्हें अमेरिका भेजने की व्यवस्था करते थे। फाइलों में जिन लोगों के नाम सामने आए हैं, उनमें कितनों को इस भयावह सच्चाई की जानकारी थी, यह अब भी साफ नहीं है।
यह विडंबना ही है कि इन फाइलों को सार्वजनिक करने की मांग की शुरुआत ट्रम्प के मागा समर्थकों ने ही की। यह अब भी स्पष्ट नहीं है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के चार साल के कार्यकाल के दौरान ये फाइलें जारी क्यों नहीं की गईं। लेकिन बाइडन के पूरे राष्ट्रपति कार्यकाल में, मार्जोरी टेलर ग्रीन जैसी मागा प्रभावशाली हस्तियां लगातार इन फाइलों को सार्वजनिक करने की मांग करती रहीं।

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इसमें पीड़ितों के प्रति चिंता से ज्यादा, यह धारणा हावी थी कि डेमोक्रेटिक पार्टी की शीर्ष हस्तियां एपस्टीन से जुड़ी हुई थीं और मागा खेमे ने ठान लिया था कि वाम-उदारवादियों की कथित दुराचार को बेनकाब किया जाए। ट्रम्प ने भी चुनावी अभियान के दौरान वादा किया था कि सत्ता में आते ही वे, ये फाइलें आम जनता के लिए जारी करेंगे।
लेकिन पद संभालने के बाद ट्रम्प का रवैया बदल गया। शुरुआत में उनकी अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी ने कहा था कि ‘‘एपस्टीन की ‘क्लाइंट लिस्ट’ मेरी मेज पर पड़ी है” और वह जल्द ही इसे सार्वजनिक करेंगी। उनकी इस बात से मागा खेमे में उम्मीदें काफी बढ़ गईं। हालांकि बाद में अमेरिकी न्याय विभाग ने बॉन्डी के इस वादे पर पलटी मार दी और कहा कि एपस्टीन के पास न तो कोई ‘क्लाइंट लिस्ट’ थी और न ही तस्करी की गई नाबालिग लड़कियों के नामों की कोई सूची। न्याय विभाग ने फाइलों को बारीकी से खंगालते हुए उन नामों को हटाने का काम किया, जो ट्रम्प और उनके करीबी अरबपति मित्रों को नुकसान पहुंचा सकते थे। बाद में मार्जोरी टेलर ग्रीन ने हाल ही में कहा कि एपस्टीन मामले को लेकर ट्रम्प का रवैया उनके राजनैतिक जीवन की “सबसे बड़ी रणनीतिक भूल” है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि दस्तावेजों को जारी होने से रोकने के लिए ट्रम्प ने सबसे ज्यादा और सबसे सख्त विरोध किया। अंततः राष्ट्रपति को तब मजबूर होना पड़ा, जब कुछ रिपब्लिकन सांसद पार्टी लाइन तोड़कर डेमोक्रेट सांसदों के साथ खड़े हो गए और फाइलों को जारी करने के पक्ष में मतदान किया गया। इसके बाद ‘एपस्टीन फाइल्स ट्रांसपेरेंसी एक्ट’ कानून बन गया।
एपस्टीन के पीड़ितों और उनके परिवारों ने फाइलें जारी कराने के लिए कड़ा संघर्ष किया। लेकिन अब वे इस बात से निराश हैं कि प्रकाशित दस्तावेजों में यौन तस्करी के गिरोहों का पर्दाफाश करने के बजाय केवल पीड़ितों के चेहरे उजागर कर दिए गए और दोषियों की पहचान छुपा दी गई है। बची हुई फाइलें जारी कराने की उनकी लड़ाई अभी भी जारी है। अब वयस्क हो चुकीं पीड़ित लड़कियां अपने साथ दुराचार करने वालों को किसी भी सूरत में बख्शने के मूड में नहीं हैं। यह अलग बात है कि अमेरिका में अभी तक इस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। ऐसा नहीं है कि हर नाम गलत काम में शामिल है। लेकिन ट्रम्प का और खुलासे न करने वाला रवैया इसमें बड़ी बाधा बना हुआ है। शुरुआत में लटनिक ने कहा था कि वे एपस्टीन को सिर्फ पड़ोसी के तौर पर जानते थे। उनका झूठ तब पकड़ा गया, जब फाइलों से पता चला है कि 2012 में वे परिवार के साथ एपस्टीन के निजी द्वीप पर दोपहर का भोजन कर चुके हैं। फिर भी जांच पूरी होने तक लटनिक को पद छोड़ने के लिए नहीं कहा गया। अमेरिकी उप अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लैंच ने भी, ‘‘एपस्टीन के साथ पार्टी करना कोई अपराध नहीं हैं’’ कहते हुए आगे की कार्रवाई की सारी संभावना खारिज कर दी।
राष्ट्रपति ट्रम्प का नाम एपस्टीन मामले में हर जगह छाया हुआ है। लेकिन कोई उन पर सवाल नहीं उठा रहा। शायद इसलिए कि पूर्व अपराधी से उनके संबंध खराब हो गए थे। लेकिन खुलासे होने के बावजूद, अभी जवाबदेही समान स्तर पर नहीं है। कुछ इस्तीफे हो चुके हैं, जैसे क्लिंटन के वित्त सचिव लैरी एच. समर्स ने हार्वर्ड से अपना इस्तीफा दे दिया है। ब्रैड कार्प ने प्रतिष्ठित लॉ फर्म पॉल, वीस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है। गोल्डमैन साक्स की शीर्ष वकील कैथरीन रुएमलर ने भी पद छोड़ दिया है। एपस्टीन की सहयोगी गिसलेन मैक्सवेल अभी भी जेल में है। इन सबके बाद भी नतीजे सीमित ही दिखाई दे रहे हैं।
इस पूरे मामले का बड़ा रिश्ता पूंजीवाद के संकट से भी है। एपस्टीन फाइलें जिसे उजागर करती हैं, वह पैसे और सत्ता की पूजा है, जिसमें भरी सड़ांध हद तक पहुंच चुकी है। पेरिस स्थित अमेरिकन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर फिलिप गोलुब कहते हैं, “मेरे हिसाब से इसका गहरा असर देर-पूंजीवाद के दौर में अमेरिकी अभिजात वर्ग के भीतर नैतिकता और मूल्यों के क्षरण की हद सामने आना है।”
उनका कहना है कि बीते दो दशकों ने अमेरिका में पूंजीवाद की अतिरेक प्रवृत्तियों को बेनकाब किया है। गोलुब के मुताबिक, “एपस्टीन असाधारण रूप से प्रतिभाशाली शिकारी था और उसका उभार वॉल स्ट्रीट के घमंड, कदाचार और कई बार खुली अवैधता की उस व्यापक लहर के बीच हुआ, जो पूरी तरह बाजार उदारीकरण और ‘रचनात्मक’ वित्तीय इंजीनियरिंग के संदर्भ में पनपी। इसने अंततः पहले राष्ट्रीय, फिर 2008 में वैश्विक वित्तीय संकट को जन्म दिया।” वे आगे कहते हैं, “निवेश बैंकरों और शैडो बैंकरों ने बेहिसाब दौलत इकट्ठा करनी शुरू कर दी और वे आत्ममुग्धता के साथ-साथ वित्तीय मीडिया की चापलूसी का केंद्र बन गए। याद कीजिए वित्त के ‘टाइटन’, ‘मास्टर्स ऑफ द यूनिवर्स’, कोकीन से सजी यौन पार्टियां, जो इस देर-पूंजीवादी सामाजिक विकृति का अभिन्न हिस्सा थीं, जिसे मार्टिन स्कॉर्सेज की फिल्म द वुल्फ ऑफ वॉल स्ट्रीट ने बेहद प्रभावी ढंग से चित्रित किया है।’’
शुरुआत राजघराने से हुई। पूर्व प्रिंस एंड्रयू से न सिर्फ उनकी शाही उपाधि छीनी गई, बल्कि उन्हें रॉयल लॉज से निकालकर छोटे घर में भेज दिया गया। उनकी निजी सुरक्षा के लिए मिलने वाली सरकारी फंडिंग भी बंद कर दी गई। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर को भी गंभीर राजनैतिक संकट का सामना करना पड़ा। पीटर मैंडेलसन लेबर पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं, उन्हें गिरफ्तार किया गया लेकिन उन्हें जमानत भी मिल गई। टोनी ब्लेयर तथा गॉर्डन ब्राउन, दोनों सरकारों में मंत्री रह चुके हैं। मैंडेलसन की अमेरिका में दूत के रूप में नियुक्ति स्टारमर की कुर्सी ले ही डूबता क्योंकि कई बार एपस्टीन फाइलों में पीटर का नाम आया है। दूसरे कई लोगों की तरह, मैंडेलसन ने भी 2008 में 14 साल की लड़की से देह-व्यापार के लिए दोषी ठहराए जाने के बावजूद एपस्टीन से दोस्ती नहीं तोड़ी थी। ब्राउन सरकार में बिजनेस सेक्रेटरी रहते हुए उन्होंने अपने पद का इस्तेमाल करते हुए बाजार से जुड़ी संवेदनशील वित्तीय जानकारियां अपने मित्र एपस्टीन तक पहुंचाईं। 2002 से 2004 के बीच एपस्टीन से 75,000 डॉलर की रकम लेने के मामले में उनकी जांच चल रही है। स्टारमर के लंबे समय से करीबी सहयोगी और प्रधानमंत्री के चीफ ऑफ स्टाफ मॉर्गन मैकस्वीनी ने इस्तीफा दे दिया और वॉशिंगटन के लिए दूत के तौर पर मैंडेलसन की नियुक्ति की सलाह देने की “पूरी जिम्मेदारी” अपने ऊपर ले ली। अपने सिर दोष लेकर मैकस्वीनी ने अपने बॉस को बचाने की कोशिश की। स्टारमर के इस्तीफे की मांग तेज होने के बाद उनके शीर्ष सहयोगी को पद छोड़ना पड़ा। अब लेबर पार्टी के सांसद भी स्टारमर के फैसले पर सवाल उठा रहे हैं।
नॉर्वे के पूर्व प्रधानमंत्री थॉर्ब्योर्न यागलैंड, वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम का फिलहाल नेतृत्व कर रहे पूर्व विदेश मंत्री बोर्गे ब्रेंडे, नॉर्वे की पूर्व वरिष्ठ राजनयिक मोना यूल और क्राउन प्रिंसेस के नाम भी एपस्टीन फाइलों में सामने आए हैं। इस संबंध में जांच के लिए नॉर्वे की संसद ने एक स्वतंत्र आयोग गठित किया है, हालांकि संभावना यही है कि क्राउन प्रिंसेस से पूछताछ नहीं की जाएगी।
यूरोप भर में एपस्टीन के घेरे से जुड़े लोगों के इस्तीफें जारी हैं। फ्रांस की सांस्कृतिक दुनिया के प्रतिष्ठित चेहरे और राष्ट्रपति फ्रांस्वा मित्तरां के कार्यकाल में मंत्री रह चुके, 86 वर्षीय जैक लैंग ने पेरिस के प्रतिष्ठित अरब वर्ल्ड इंस्टीट्यूट के प्रमुख पद से इस्तीफा दे दिया है। यह फैसला उनके परिवार के वित्तीय कारोबारी से जुड़े आर्थिक संबंधों के सामने आने के बाद लिया गया।
स्लोवाकिया के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और पूर्व विदेश मंत्री मिरोस्लाव लायचाक, एपस्टीन के साथ “हसीन लड़कियों” पर बातचीत करने के कारण पद से बाहर हो गए। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ पूर्व राजनयिक और वर्तमान मंत्री हरदीप पुरी का भी नाम इन फाइलों में आया है। एपस्टीन की ये टिप्पणियां मोदी की 2017 की इजरायल यात्रा के संदर्भ में थीं। इस पर विदेश मंत्रालय ने तीखी प्रतिक्रिया दी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने एपस्टीन के आरोपों को “दोषी ठहराए जा चुके अपराधी की घटिया और बेसिर-पैर की बकवास” बताते हुए कहा कि उन्हें “पूरी तरह तिरस्कार के साथ खारिज किया जाना चाहिए।”
अमेरिका की जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाली ब्रिटिश नागरिक जोआना स्पीयर कहती हैं, “मेरा खयाल है कि एपस्टीन के साथ अपने संबंधों को लेकर ब्रिटेन में अहम लोगों ने झूठ बोला और अपनी भूमिका कम कर दिखाने की कोशिश की (एंड्रयू माउंटबेटन-विंडसर, पीटर मैंडेलसन), लेकिन वे पकड़े गए। शायद यूरोप में जनता से झूठ बोलने के प्रति सहनशीलता कम है। ट्रम्प तो बड़ी-छोटी हर बात पर लगातार ऐसा करते हैं, इसलिए अमेरिका अब उसका आदी हो चुका है।’’ वह आगे जोड़ती हैं, “अमेरिका की स्थिति काफी दिलचस्प है। इससे कई लोग यह अटकल लगाने लगे हैं कि ट्रम्प किसी को सजा नहीं देना चाहते, क्योंकि उनकी अपनी अलमारी में भी एपस्टीन से जुड़े और कंकाल छिपे हो सकते हैं। हालांकि यह महज अटकल भर है।’’
इन खुलासों से अमेरिका की प्रतिष्ठा पर दाग लगे, जहां से एपस्टीन अपना नेटवर्क चलाता था। लेकिन इसके अलावा वहां कुछ नहीं हुआ। पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए यह दस्तावेजी खुलासा धूप-छांव की तरह है। कोई नहीं जानता कि सीलबंद पड़ी बाकी फाइलें सामने आने पर समीकरण बदलेंगे भी या नहीं। पूरी तरह पारदर्शिता की लड़ाई अभी भी जारी है। जो महिलाएं कभी असहाय लड़कियां थीं, उन्होंने साफ कर दिया है कि वे पीछे हटने वाली नहीं हैं। लेकिन सवाल अब भी बना हुआ है, क्या सचमुच कभी जवाबदेही तय हो पाएगी?