आवरण कथा/नजरियाः दादागीरी के दुनियावी नतीजे
वेनेजुएला में अमेरिका की कार्रवाई चीन की ताइवान को हड़पने की महत्वाकांक्षाओं को दे सकती है शह
अमेरिका ने वेनेजुएला पर बिना किसी उकसावे हमला कर उसकी संप्रभुता का उल्लंघन किया। सबसे बड़ी बात यह है कि उसने राष्ट्रपति मदुरो को अमेरिका में मुकदमा चलाने के लिए अपहरण करके संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून का घोर उल्लंघन किया है।
अमेरिका कुछ महीनों से वेनेजुएला के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहा था। मैक्सिको की खाड़ी में बड़े नौसैनिक बेड़े तैनात कर रहा था। कैरेबियाई द्वीप-समूहों के अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में चलने वाले कई जहाजों-नावों को नष्ट कर रहा था और इस अनुमानित आरोप पर लोगों को मार रहा था कि वे अमेरिका में ड्रग्स ले जा रहे थे।
इन चेतावनी भरे संकेतों के बावजूद किसी ने यह अंदाज नहीं लगाया था कि अमेरिका सीधे वेनेजुएला पर हमला कर देगा और राष्ट्रपति मदुरो का अपहरण कर लेगा। यह अंदाजा तो लगाया गया था कि अमेरिका सैन्य दबाव के जरिए वेनेजुएला के नेतृत्व को डराना चाहेगा और शायद देश में सत्ता परिवर्तन को बढ़ावा देगा। लेकिन, अमेरिका ने करीने से फौजी ऑपरेशन की तैयारी की और अपने सैन्य ठिकाने से मदुरो को अपहरण करने में कामयाब रहा।
वेनेजुएला ऑपरेशन का वैचारिक आधार अमेरिका नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रेटेजी 2025 डॉक्यूमेंट में बताया गया था, जिसमें 19वीं सदी के मोनरो डॉक्ट्रिन को फिर से जिंदा किया गया। अमेरिका का रुख यह है कि पश्चिमी गोलार्ध अमेरिका का रणनीतिक पिछवाड़ा है, जिससे विदेशी शक्तियों खासकर चीन और रूस को बाहर रखा जाएगा। यह अतीत की साम्राज्यवादी सोच और दुनिया को ध्रुवों में बांटने की याद दिलाता है। असल में, यह संयुक्त राष्ट्र चार्टर और दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्थापित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को नकारने जैसा है।
ट्रम्प ने घोषणा की है कि अमेरिका अब वेनेजुएला का शासन चलाएगा और मदुरो की जगह लेने वाली पूर्व उपराष्ट्रपति डेलसी रोड्रिगेज अगर सहयोग नहीं करती हैं तो बड़ी सैन्य कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने वेनेज़ुएला के तेल पर दावा करने में जरा भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई है। उन्होंने कहा कि वह अमेरिका का है क्योंकि अमेरिकी कंपनियों ने तेल क्षेत्रों को विकसित किया था, जिसका बाद में वेनेजुएला ने राष्ट्रीयकरण कर दिया था। ट्रम्प ने स्वीकार किया है कि वेनेजुएला पर हमला करने से पहले और बाद में वे अमेरिकी तेल कंपनियों के संपर्क में थे, जिनके बारे में उनका दावा है कि वे देश के खराब हो चुके तेल इंफ्रास्ट्रक्चर को बहाल करेंगी।
वेनेजुएला के तेल भंडार दुनिया में सबसे बड़े हैं। अगर उन्हें अमेरिकी भंडार में जोड़ दिया जाए, तो अमेरिका वैश्विक तेल बाजार में सबसे प्रभावशाली खिलाड़ी बन जाएगा। इससे अमेरिकी तेल कंपनियों को भारी फायदा होगा, जो ट्रम्प और रिपब्लिकन पार्टी के सबसे बड़े चंदा देने वाले माने जाते हैं। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है कि ट्रम्प ने अपने उद्घाटन भाषण में ‘‘ड्रिल बेबी ड्रिल’’ का नारा दिया था।
ट्रम्प ने कोलंबिया के राष्ट्रपति के खिलाफ भी बहुत ही आक्रामक बयान दिए हैं, जिन पर वे अमेरिका में ड्रग तस्करी का आरोप लगाते हैं। अब वे कोलंबिया को भी सैन्य कार्रवाई की धमकी दे रहे हैं। मोनरो सिद्धांत पर नए सिरे से चर्चा पूरे लैटिन अमेरिका के लिए एक चुनौती है। अमेरिका पहले भी कई बार वहां की सरकारों को कंट्रोल करने या बदलने के लिए दखल दे चुका है। आज, लैटिन अमेरिका में सियासी और आर्थिक माहौल बदल गया है। चीन लगभग सभी लैटिन अमेरिकी देशों का एक बड़ा आर्थिक पार्टनर बन गया है, और उसने इस महाद्वीप के खनीज संसाधनों में काफी निवेश किया है।
अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की दलील है कि चीन, रूस और ईरान को अमेरिकी महाद्वीप में क्यों घुसना चाहिए, चीन और ईरान को वेनेजुएला का तेल क्यों खरीदना चाहिए। इस दलील से तो यह सवाल भी उठता है कि अमेरिका को एशिया में दखल क्यों देना चाहिए या रूस की सीमा से लगे देशों में क्यों मौजूद रहना चाहिए, और पश्चिमी गोलार्ध के देश जिसे चाहें उसे सामान क्यों नहीं बेच सकते। उन देशों की अपनी विकास आकांक्षाएं हैं; उन्हें निवेश की जरूरत है; वे संसाधनों से भरपूर हैं, जिन्हें वे विकसित करके दुनिया को बेचना चाहते हैं। ये देश अमेरिका, चीन और रूस के साथ डब्लूटीओ के सदस्य हैं। उनमें कुछ अमेरिका, चीन और रूस के साथ एपीईसी या एपेक के भी सदस्य हैं। क्या अब अमेरिका एपेक का विरोध करेगा और उन देशों को डब्लूटीओ के फायदे लेने से मना करेगा?
स्पेन ने ब्राजील, चिली, मैक्सिको, कोलंबिया और उरुग्वे के साथ मिलकर एक संयुक्त बयान जारी किया है, जिसमें अमेरिकी सैन्य कार्रवाई को ‘‘अंतरराष्ट्रीय कानून के बुनियादी सिद्धांतों, खासकर संयुक्त राष्ट्र चार्टर में बल के इस्तेमाल पर रोक और क्षेत्रीय संप्रभुता के सम्मान’’ का उल्लंघन बताया गया है। कहा गया है कि ‘‘यह अमेरिकी कार्रवाई शांति, क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए खतरनाक मिसाल कायम करती हैं और आम लोगों के लिए खतरा पैदा करती हैं।’’ हालांकि, अर्जेंटीना ने अमेरिकी कार्रवाई का स्वागत किया है।
जैसा कि उम्मीद थी, रूस और चीन ने इसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठाया और अमेरिकी कार्रवाई की कड़ी निंदा की। अफ्रीकी देशों के संघ, सिंगापुर, मलेशिया, घाना ने कड़े बयान जारी किए हैं। कतर ने भी आलोचना की है। भारत की प्रतिक्रिया धीमी रही है, उसने यूक्रेन में रूस के सैन्य दखल पर अपनी स्थिति के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए अमेरिकी कार्रवाई की सीधी आलोचना करने से परहेज किया है। उसने खुद को घटनाओं पर ‘‘गहरी चिंता’’ व्यक्त करने तक सीमित रखा है और संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन का जिक्र नहीं करने का फैसला किया है। वह ऐसा कर सकता था और खासकर दक्षिणी गोलार्ध की आवाज के तौर पर अपनी पहचान बनाने के लिए उसे करना भी चाहिए था।
यूरोप के देश बतौर नाटो सहयोगी बड़ी दुविधा में हैं, क्योंकि अमेरिकी कार्रवाई यूक्रेन में रूस के दखल पर यूरोपीय नजरिए को पूरी तरह से कमजोर करती है। इसके अलावा, ट्रम्प ग्रीनलैंड पर अपने क्षेत्रीय दावे को दोहरा रहे हैं। जर्मनी और ब्रिटेन ने ट्रम्प की कार्रवाई पर अपने रुख के बारे में सवालों को टाल दिया, जबकि फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने उसका समर्थन किया है। यूरोपीय संघ का रुख अस्पष्ट रहा है।
यह सवाल बिल्कुल जायज है कि अगर अमेरिका बिना किसी उकसावे के और संयुक्त राष्ट्र चार्टर और अंतरराष्ट्रीय कानून को धता बताकर वेनेजुएला पर हमला कर सकता है और उसके राष्ट्राध्यक्ष को उठा ले जा सकता है, तो क्या इससे चीन के लिए ताइवान में बल प्रयोग करके अपना मकसद हासिल करने का रास्ता नहीं खुल जाता है?
ताइवान पर चीन का दावा वेनेजुएला पर अमेरिका के दावों से काफी अलग है। अमेरिका वेनेजुएला को अपना हिस्सा नहीं मानता। उसकी कोई क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा नहीं है। वह वेनेजुएला का तेल और देश के दूसरे संसाधन हथियाना चाहता है। भू-राजनैतिक रूप से वेनेजुएला अमेरिका के लिए बड़े क्षेत्र में अपनी शक्ति बढ़ाने का कोई महत्वपूर्ण रास्ता नहीं है। ताइवान में सभी पक्षों के लिए भू-राजनैतिक दांव बहुत अलग हैं।
चीन पहले ही आक्रामक सैन्य अभ्यास करके ताइवान को डरा रहा है। उसने बार-बार यह साफ कर दिया है कि वह ताइवान को सुलह-शांति से या जरूरत पड़ने पर ताकत के बल पर वापस ले लेगा। ताकत का इस्तेमाल करने पर चीन को उस इलाके में अमेरिका की बड़ी सैन्य मौजूदगी, ताइवान के प्रति अमेरिका की रक्षा प्रतिबद्धताओं, उसके खुद की सैन्य क्षमताओं, जापान की प्रतिक्रिया आदि का सामना करना पड़ेगा। चीन को उस इलाके में ताकत के संतुलन, वैश्विक प्रतिक्रिया और पश्चिमी प्रतिबंधों के असर वगैरह का बहुत सावधानी से हिसाब लगाना होगा। वेनेजुएला के मामले में अमेरिका को ऐसी कोई समस्या नहीं हुई। चीन यह दावा करके अमेरिका की नकल नहीं कर सकता कि पूर्वी एशिया उसका है। उसके पास द्वीप पर अपनी मर्जी थोपने के लिए ताइवान के राष्ट्रपति को अगवा करने का विकल्प नहीं है।
ऐसे में, चीन सही समय का इंतजार करेगा। वेनेजुएला में उसकी गैर-कानूनी कार्रवाई वैश्विक स्तर पर और खासकर दक्षिण और पूर्वी चीन सागर में नियमों पर आधारित व्यवस्था पर अमेरिका की बात को गंभीर रूप से कमजोर करती है, लेकिन चीन के लिए मुद्दा नैतिक बहस जीतना नहीं है, बल्कि यह आकलन करना है कि क्या वह ताइवान के खिलाफ गैर-कानूनी तरीके से ताकत का इस्तेमाल करके बच सकता है।
(लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं। विचार निजी हैं)