बीता बरस/आवरण कथा: दहलते हुए बदली दुनिया
सदी का पच्चीसवां बरस दुनिया को ऐसे बदल गया कि पुराने राजनैतिक-आर्थिक समीकरण बेमानी हो गए, अलबत्ता, कुछ नई बयारें बहीं, अर्थव्यवस्था से लेकर खेल के मैदान तक में कुछ उम्मीद के बिरवे फूटे, जो 2026 में आशा लेकर पहुंचेंगे
इक्कीसवीं सदी के चौथाई साल का आगाज ही आशंकाओं की घनघोर घटाओं के तले हुआ था। लेकिन देश, काल और दुनिया ऐसे मोड़ लेगी, ऐसी भविष्यवाणी तो कल-जिह्वे भी नहीं कर रहे थे। क्या कुछ नहीं हुआ इस साल। ट्रम्प टैरिफ वार से दुनिया की धुरियां टूटकर बिखरती-सिमटती और नई दोस्तियां बनती गईं, पहले से जारी जंगों का विस्तार हुआ और तबाही-कत्लेआम की ऊंचाइयां छूने में कोई नैतिक बाधा आड़े नहीं आई, लोकतंत्र का दायरा घटता गया, तंत्र की ताकत विकराल हो गई, विरोध और प्रतिरोध की जगह इस तरह सिकुड़ गई कि संभावनाएं नखलिस्तान की तरह लगने लगीं, तमाम अर्थव्यवस्थाएं गर्त की ढलान पर लुढ़कने से थमने की कोशिश में ही जुटी रहीं, प्रकृति और जलवायु परिवर्तन भी नई गरमी पैदा करता रहा, भूकंप भी दहलाते गए और प्रदूषण तो जान पर बन आया। लेकिन व्यवस्था में सवार लोग बेफिक्र होते गए। वे जीवन, जीविका पर वार तेज करते रहे। दुराचार, भ्रष्टाचार की नई फाइलें खुलीं। अलबत्ता हल्की-फुल्की खुशी के लम्हे, खासकर खेल के मैदान से आए, तो लोग उम्मीद की तलाश में झूमने लगे। फिर, हर वर्ष की तरह आखिर में कुछ आर्थिक लकीरें ऐसी भी उभरीं, जिससे नाउम्मीदी में उम्मीद बंधी। और दुनिया 2026 में बढ़ चली।
ट्रम्प दरार
महा विध्वंस की चेतावनी देते डोनाल्ड ट्रम्प अमेरिका की गद्दी पर दोबारा ‘मागा’ या ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ और दुनिया को सबक सिखाने की सनक लिए आए। वे कमोबेश इसी उन्मादी वादे पर जीते थे कि दुनिया वाले, दोस्त और दुश्मन, सभी अमेरिका को खंगाल रहे हैं और उसकी दरियादिली का फायदा उठाकर उसे ही कमजोर कर रहे हैं। सो, उन्होंने सबक सिखाने के साथ दुनिया का नक्शा ही बदल डालने की ठान ली। जाहिर है, उसके असर से दुनिया की सिर्फ धुरियां ही नहीं बदलीं, युद्धों का विस्तार भी हुआ और संयुक्त राष्ट्र, डब्ल्यूटीओ, जी-7, जी-20, क्वाड, यहां तक कि ब्रिक्स जैसे पश्चिम विरोधी मंच भी ऊष्मा खो बैठे। भारत जैसे देश मुड़कर रूस और चीन के पाले की ओर मुड़े, जो ट्रम्प वार से सख्त शर्तों पर राहत देने का वादा कर रहे थे। तो, 2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवन घाटी में खूनी झड़प भुलाकर भारतीय प्रतिनिधिमंडल शंघाई शिखर सम्मेलन में भी मन से पहुंचा और रूसी राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन भी दशकों बाद दिल्ली आए।
रूस से सस्ते तेल की खरीद ही भारत पर ट्रम्प के 25 फीसदी टैरिफ जुर्माना का बहाना बना। लिहाजा, भारत पर सबसे ज्यादा 50 फीसद टैरिफ है, जैसा ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के मामले में है। उससे कम टैरिफ चीन, रूस वगैरह पर है, जो दुनिया की नई धुरी बन रहे हैं। वैसे, भारत पर ट्रम्प नजला शायद इसलिए गिरा, ताकि नकेल कसी जा सके और उसे दूसरे पाले में जाने से रोका जा सके। दूसरे, अमेरिका भारत को खासकर कृषि उपज और डेयरी उत्पादों का बाजार खोलने पर मजबूर भी करना चाहता है, जिसके लिए भारत का तैयार होना घरेलू राजनैतिक मजबूरियों के चलते मुश्किल लग रहा है। मुश्किल दूसरी है। अमेरिका जानता है कि भारत के लिए नब्बे के दशक में उदारीकरण के साथ थोड़े-बहुत व्यतिक्रम के साथ शुरू हुई अमेरिकापरस्ती की राह से हटना शायद आसान नहीं है। मोटी वजह यह है कि भारत की मौजूदा जीडीपी में कॉर्पोरेट की हिस्सेदारी आधे से ज्यादा हो चली है, जिसके हित अमेरिकी या पश्चिमी अर्थव्यवस्था से ज्यादा जुड़े हैं। उसका दायरा भी सिमट आया है और कुछेक मुट्ठी भर घरानों का दबदबा बढ़ा है।
भारत के निर्यात में भी अमेरिका की हिस्सेदारी 40 फीसद से अधिक है, इसलिए उस पर असर पड़ना लाजिमी है। न्यूजीलैंड सरीखे कुछ छोटे-मोटे देशों से व्यापार समझौते हुए हैं, मगर अमेरिका से समझौते की कोशिशें जारी हैं। हालांकि संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान बीमा क्षेत्र में सौ फीसदी विदेशी निवेश, एटमी उत्पादन में निजी क्षेत्र को शह और विदेशी विश्वविद्यालयों को कैंपस खोलने की कानूनी व्यवस्था की गई, जिसे कई हलकों में अमेरिका के अनुकूल पहल माना जा रहा है।
देशी आर्थिकी
खैर, अच्छी बात यह है कि हमारे लिए आर्थिक मोर्चे पर वर्ष 2025 जितनी आशंकाओं के साथ शुरू हुआ था, कृषि और उत्पादन क्षेत्र के अपेक्षाकृत अच्छे नतीजों के साथ समाप्त हुआ है। सिर्फ आर्थिक विकास की दर ही नहीं, अर्थव्यवस्था के कई मोर्चों पर प्रदर्शन ठीक रहा है। कई जाने-माने अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, इसके लिए तारीफ के हकदार किसान और उद्यमी हैं, न कि सरकार। कई मामलों में कमजोरियां जाहिर हो रही हैं, जिसे दुरुस्त करने की कोशिशें नहीं हुई तो अभी दिख रही गुलाबी तस्वीर के फीका पड़ने में देर नहीं लगेगी। हालांकि, इस साल कई वजहों से विदेशी संस्थागत पूंजी पलायन में तेजी दिखी और काफी पूंजी बाजार से निकाली गई। बाजार को गिरने से रोकने के लिए देशी संस्थागत निवेशकों सार्वजनिक बैंकों और एलआइसी वगैरह का पैसा लगा, जिसके असर क्या होते हैं, उसे देखना होगा।
डॉलर और दूसरी बड़ी मुद्राओं का मूल्य बढ़ना हमारे मौद्रिक प्रबंधन की कमजोरी जाहिर करता है। उससे कई तरह के नुकसान हैं। चालीस रुपये के डॉलर की बात करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में डॉलर नब्बे रुपये के पार चला गया तो यह चिंता की बात है। महंगा सोना भी हुआ है और आशंका है कि विदेशी मुद्रा भंडार को दुरुस्त रखने के लिए की जाने वाली पहल एक वजह है। दूसरे, दुनिया भर के बैंक अस्थिरता के आलम में सोने की खरीद बढ़ा रहे हैं। अर्थव्यवस्था में अच्छे प्रदर्शन का क्षेत्र कृषि और पशुपालन है जबकि खाद की कमी किसानों के लिए लगातार सिरदर्दी बनी हुई है। औद्योगिक उत्पादन में गिरावट दर्ज हो रही है। असेंबलिंग का काम जरूर बढ़ा है लेकिन उससे विदेशी मोबाइल कंपनियों और पुर्जे सप्लाई में एकाधिकार रखने वाले चीन का ही फायदा ज्यादा बढ़ने का अनुमान है। चीन से भारत का व्यापार घाटा एक खरब डॉलर का हो चुका है।
इस साल जीडीपी गणना का आधार वर्ष 2011-12 के बदले 2023-24 करने की पहल हुई तो एक नया तमाशा खुला। अभी तक सरकारी आंकड़ों पर देश के अर्थशास्त्रियों और सांख्यिकी के जानकारों का एक समूह शक जाहिर करता रहा है। अब जीडीपी की गणना का आधार बदला गया तो कई जानकार एक फीसदी तक गलत आंकड़े की बात कर रहे हैं। फिर, इस साल तीसरी तिमाही में जीडीपी के 8.2 फीसदी बढ़ने का आंकड़ा सामने आया तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष समेत कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने इन आंकड़ों को संदिग्ध बताया। पहले ऐसे बयानों पर सरकार खंडन-मंडन करती थी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। बाजार में भी 8.2 फीसदी की खबर से जो जोश आना चाहिए था, वह नदारद है। लेकिन विकास दर अगर 7 फीसदी से ऊपर है तो 2025 की सारी आशंकाओं को झुठलाकर अर्थव्यवस्था ने बढ़िया तरक्की की है।
ट्रम्प ख्याली पुलाव का खामियाजा
उससे भी अच्छा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के कमजोर होने के साथ उनके मनमौजी एकतरफा फैसलों का बेअसर हो जाना है। ट्रम्प के कमजोर पड़ने का अंदेशा इस वर्ष की पहली तिमाही के बीतने के साथ ही शुरू हो गया था। जब उनके अपने देश में भी हालात उनके काबू से बाहर होने लगे थे और करों तथा सरकारी खर्च पर जाहिरा मतभेद की वजह से टेस्ला और एक्स के मालिक एलॉन मस्क की राहें जुदा हो गईं। मस्क को अमेरिकी राष्ट्रपति का “लंगोटिया यार” कहा जाने लगा था और उन्होंने ट्रम्प की व्हाइट हाउस में वापसी में बड़े पैसे से मदद की थी। यह भी दावा किया था कि वे ट्रंप से उतना ही प्यार करते हैं “जैसे कोई खांटी मर्द दूसरे मर्द से कर सकता है।” खटास हुई तो बकौल न्यूयार्क टाइम्स, “दोनों तरफ से अर्मादित, घटिया, बदले की भावना वाले, क्षुद्र, बचकाने बोल निकले।” बाद में मस्क ने ट्रम्प को चुनौती देने के लिए अपनी पार्टी बनाने का भी ऐलान किया।
ट्रम्प की शांति दूत कहलाने और नोबेल शांति पुरस्कार हासिल करने की एक और सनक उल्टी पड़ी। यूक्रेन-रूस और गजा में हमास-इज्राएल की जंग चुटकियों में सुलझा देने का दावा धरा रह गया और इज्राएल के नेतन्याहू काबू में नहीं आ सके तो वे खाड़ी देशों से सुलह करने निकल पड़े। सऊदी अरब, यूएई, बहरीन वगैरह में कई ऐलान किए। नतीजा यह हुआ कि नेतन्याहू अपनी गोटी बिगड़ती देख ईरान पर हमला कर बैठे, तेहरान जैसे कई शहर तबाह कर दिए। बहाना एटमी हथियार ही थे। आखिर ईरान के जवाबी हमले से इज्राएल में भी तबाही बेपनाह होने लगी तो अमेरिका को ईरान के एटमी प्रयोग के ठिकानों पर बम बरसाना पड़ा। फिर, अगले दिन ईरान ने भी कतर में अमेरिकी सैन्य अड्डे पर कुछ बम बरसाकर जवाब की औपचारिकता पूरी की और फिर जाकर जंग थमी।
उधर, गजा में नेतन्याहू की फौज की घेराबंदी और तबाही की वजह से खाने के सामान और दवाइयों की भारी कमी से लोगों, खासकर बुजुर्गों, औरतों और बच्चों की मौत सुर्खियां बनने लगीं। संयुक्त राष्ट्र और दूसरे देशों से भेजी गईं राहत सामग्रियों को इज्राएली फौज ने पहुंचने से रोक दिया या तरह-तरह की परेशानियां पैदा कीं। इसे कत्लेआम माना गया और संयुक्त राष्ट्र तथा यूरोपीय देशों समेत दुनिया भर से निंदा प्रस्ताव पारित किए गए। खास बात यह कि संयुक्त राष्ट्र में निंदा प्रस्ताव पर भारत ने गैर-मौजूद रहना पसंद किया। नेतन्याहू पर कोई फर्क नहीं पड़ा। आखिरकार, वर्ष के आखिरी महीनों में अमेरिका के हस्तक्षेप से हमास और इज्राएल के बीच समझौता हुआ और बंधकों की अदला-बदली हुई।
देशी सियासत
ट्रम्प से जुड़ी एक और अहम घटना ने भारत की सियासत को गरमाए रखा। कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को आतंकियों ने 25 लोगों को गोलियों से भून डाला तो मोदी सरकार ने ऐलान किया कि हर आतंकी घटना को पाकिस्तान से युद्घ की कार्रवाई माना जाएगा। जवाब में सेना ने ऑपरेशन सिंदूर 7-8 मई की दरम्यानी रात शुरू की और पाकिस्तान के भीतर नौ आतंकी ठिकानों पर बम बरसाए। पाकिस्तान फौज ने भी हमला किया। आखिर 10 मई को युद्घविराम का ऐलान हुआ। बवाल इसलिए उठा कि भारत और पाकिस्तान के संघर्ष विराम के ऐलान के कुछ मिनटों पहले ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल पर पोस्ट किया कि उन्होंने दोनों देशों को एटमी बर्बादी से रोक लिया। उसके बाद, ये खबरें भी पाकिस्तान और फिर अमेरिका से आईं कि भारत के कम से कम पांच विमान मार गिराए गए। भारत की ओर से खंडन हुआ।
इसके अलावा, देश में सबसे बड़ा मसला चुनावों में चुनाव आयोग की भूमिका को लेकर उठा। हालांकि 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के 240 सीटों पर सिमटने से बना सियासी माहौल उसी वर्ष के अंत में हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों में भाजपा की भारी जीत से बदल गया था। उस पर दिल्ली में आम आदमी पार्टी की हार ने जैसे भाजपा की अपराजेय स्थिति काफी हद तक बहाल कर दी। इन सभी चुनावों में आयोग की भूमिका को लेकर सवाल उठे और विपक्ष ने वोट चोरी का इल्जाम लगाया। राहुल गांधी ने कहा, ये चुनाव विपक्ष जीता था, मगर उसे हराने के लिए वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर धांधली की गई। राहुल गांधी ने लगभग तीन प्रेस कॉन्फ्रेंस में करीने से वोटर लिस्ट में हेराफेरी और उसमें चुनाव आयोग की हिस्सेदारी का सवाल उठाया। आयोग इन आरोपों को बेबुनियाद बताता रहा।
लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव के तीन-चार महीने पहले 24 जून को अचानक चुनाव आयोग के वोटर लिस्ट के विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआइआर) के फैसले से हंगामा खड़ा हो गया। पहली बार आयोग ने लोगों से गणना-प्रपत्र भरने और प्रमाण के तौर 11 दस्तावेज जमा करने को कहा, जिसमें अमूमन सबके पास पाए जाने वाले आधार कार्ड, राशन कार्ड, मनरेगा जॉब कार्ड को शामिल नहीं किया। उसके खिलाफ विपक्ष ने संसद से लेकर सड़क तक आंदोलन किया। बिहार में कांग्रेस के राहुल गांधी और राजद के तेजस्वी यादव की अगुआई में 13 दिनों तक वोटर अधिकार रैली निकाली। लेकिन आयोग ने जब अंतिम सूची जाहिर की तो 69 लाख लोगों के नाम कट चुके थे और करीब 22 लाख नए नाम जुड़ चुके थे। खैर, नवंबर में चुनाव हुए तो जदयू-भाजपा की अगुआई में एनडीए को कुल 243 में 200 से ज्यादा सीटें मिलीं और विपक्ष बस बाकी सीटें ही पा सका। इस तरह भाजपा का विजय अभियान आगे बढ़ता रहा।
इससे शायद चुनाव आयोग को भी बल मिला और उसने पूरे देश में एसआइआर कराने ऐलान कर दिया, जबकि उस पर सुप्रीम कोर्ट में मामला जुलाई से चलता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट की दखल से सिर्फ इतना हुआ कि प्रमाण-पत्रों की सूची में 12वें नंबर पर आधार कार्ड शामिल हो गया। फिलहाल बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, केरल, असम, पुदुच्चेरी जैसे 9 राज्यों में एसआइआर जारी है और आयोग की सूचना के हिसाब से ही 4 करोड़ से ज्यादा लोगों के नाम वोटर लिस्ट से कटने की गुंजाइश है। विपक्ष इसे आयोग के जरिए भाजपा की मदद बता रहा है।
खैर, बिहार में जीत का असर नीतियों पर भी पड़ा। नतीजों के फौरन बाद दशक भर से ज्यादा से लटके श्रम कानूनों के बदले चार श्रम संहिताएं लागू करने की अधिसूचना हो गई। मनरेगा को बदलकर जी राम जी कानून लाया गया, जिसमें उसमें काम के अधिकार के बदले उपलब्ध कार्य-योजना के तहत काम कर दिया गया। हालांकि उसमें साल में 100 दिन के बदले 125 दिन काम की बात तो है मगर वह मांगने पर नहीं, केंद्र की योजना के हिसाब से मिलेगा। इसके अलावा उसका 40 फीसदी भुगतान राज्यों पर डाल दिया गया, जो पहले 10 फीसदी था।
पड़ोस का मामला
पड़ोस में भी उबाल खूब रहा। नेपाल में तो जेन जी या नौजवानों ने तो पूरी संवैधानिक दलगत व्यवस्था पर ही हमला बोल दिया। उनका आरोप था कि सभी मुख्यधारा की पार्टियां भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद में लिप्त हैं। संसद तक जला दी गई और तत्कालीन प्रधानमंत्री कृष्ण प्रसाद ओली सहित तमाम मुख्य पार्टियों के नेताओं को सुरक्षित पनाह तलाशनी पड़ी। अब वहां पूर्व प्रधान न्यायाधीश सुशीला कार्की की अंतरिम व्यवस्था है और आने वाले वर्ष में चुनाव होने हैं। यह घटना ऐसे उछली कि अपने देश में जेन जी से विद्रोह का आह्वान होने लगा।

जानदार जीतः पुरुष टीम ने एशिया कप अपने नाम किया
फिर, पिछले साल ऐसे ही छात्र-युवा बगावत से बांग्लादेश में प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्तापलट हुआ था और वे देश छोड़कर भारत में शरण लेने पर मजबूर हुई थीं। इस साल के आखिर में वहां छात्र नेता हादी की हत्या से माहौल गरमा गया और दंगे भड़क उठे। कट्टरपंथियों को इससे मौका मिल गया। आरोप था कि हादी की हत्या में अवामी लीग और भारत का हाथ है। वहां अल्पसंख्यकों और भारतीय मिशन पर हमले हुए। भारत ने आपत्ति दर्ज की लेकिन बांग्लादेश ने उसे तवज्जो नहीं दी। इन पड़ोसी देशों में भारत विरोधी भावनाएं और अस्थिरता भारत के लिए शुभ नहीं हो सकते हैं।
बहरहाल, इन घटनाओं के अलावा भी देश में विमानन क्षेत्र में इंडिगो संकट, प्रयाग में कुंभ के दौरान भगदड़ भी अहम हैं। इनसे सरकारी नीतियों, निगरानी और प्रबंधन पर गहरे सवाल उठते हैं। लेकिन इन दिल तोड़ने वाली घटनाओं पर उम्मीद को हावी करने वाले खिताब भी मिले, जो आशा का संचार करते हैं। पहली बार भारत की महिला क्रिकेट टीम का विश्व कप जीतना जैसे ‘83 की क्रिकेट जीत का दोहराव था। वही नहीं, दृष्टिबाधित लड़कियों ने भी क्रिकेट में ऐसा ही खिताब लाकर खेल जगत को रोशन कर दिया। खेल में निजी स्पर्धाओं में भी कई उपलब्धियां युवाओं में जोश भरती हैं।
शायद इसीलिए गूगल सर्च में सर्वाधिक खिलाड़ियों और फिल्म, संगीत जैसी दिलकश चीजें ही तलाशी गईं, जो बताती है कि लोगों में क्या चीजें आशा का संचार कर रही हैं। अगले पन्नों पर सर्च इंजनों की तलाश की विस्तृत रिपोर्ट है। ये लोगों की 2026 से आस का भी प्रतीक हैं। 2026 वाकई उम्मीदों की खबर लेकर आए, यही कामना है।