पश्चिम एशिया जंग/ट्रम्प-नेतन्याहूः खटपट या महज झांसा
ईरान के गैस भंडारों को निशाना बनाने के मामले में अमेरिका और इज्राएल के बीच वाकई मतभेद या छलावे की रणनीति? ईरान के खाड़ी देशों में जवाबी हमले से जंग बदली
पश्चिम एशिया जंग चौथे हफ्ते में पहुंची तो क्या अमेरिका और इज्राएल के बीच बड़ी दरार आ गई है? ऐसी अटकलें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक बयान से ही हवा में उठीं। उन्होंने कहा कि वे ईरान के 'साउथ पार्स' गैस भंडारों पर इज्राएली हमले से नावाकिफ थे। उस हमले से जंग खतरनाक स्तर पर पहुंच गई। जवाब में ईरान ने फौरन कतर, बहरीन और सऊदी अरब की तेल और गैस संयंत्रों पर हमला कर दिया। इज्राएल के अखबार 'हारेत्ज़' ने उसे "सार्वजनिक ताजा विवाद" बताया। यह बात प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के उस बयान के कुछ ही घंटे बाद सामने आई कि जंग के लक्ष्यों और तौर-तरीकों पर वे और ट्रम्प एकमत हैं। अखबार ने उनके हवाले से लिखा, "मेरे और ट्रम्प के बीच सुई भर का फर्क नहीं है।"
लेकिन पत्रकारों के सवालों पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा, "मैंने कहा था, ऐसा मत करो। हमारे बीच बहुत अच्छी बनती है, सब कुछ तालमेल से होता है, लेकिन कभी-कभी कुछ ऐसा कर देते हैं जो मुझे पसंद नहीं आता।" राष्ट्रपति ने आगे कहा और दोहराया भी कि उन्हें इस हमले के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उन्होंने 'ट्रुथ सोशल' पर सोशल मीडिया पोस्ट में भी यही लिखा। जंग के दौरान पहली बार अमेरिकी राष्ट्रपति ने इज्राएली कार्रवाई से पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया। इससे दोनों नेताओं के बीच खटपट की चर्चा शुरू हो गई है।
इससे पहले एक मौके पर ट्रम्प प्रशासन ने ऐसे वाकये पर टालमटोल वाला रवैया अपनाया था। इज्राएल ने तेहरान के पास तेल के कुओं पर हवाई बमबारी की थी, जिससे वहां जहरीला धुआं फैला और तेजाबी बारिश हुई। अमेरिकी अधिकारियों ने बाद में कहा कि नेतन्याहू तेहरान के आसपास "अराजकता का माहौल" बनाना चाहते थे, ताकि ईरानियों को यह संदेश दिया जा सके कि उनकी सरकार का स्थिति पर कोई नियंत्रण नहीं है। हारेत्ज़ की रिपोर्ट में कहा गया, "इज्राएली फौज ने उसके असर को कम करके आंका, और उच्च अधिकारियों ने कहा कि अमेरिका की नाराजगी उन्हें (नेतन्याहू को) नहीं बताई गई थी।" ट्रम्प ने कहा था कि उन्होंने इज्राएल से तेल के बुनियादी ढांचे को न छूने के लिए कहा था।
प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भी लंबे समय बाद पत्रकारों के सामने आकर कहा कि इज्राएल ने अकेले ही कार्रवाई की, और "राष्ट्रपति ट्रम्प ने हमसे भविष्य में ऐसे हमले न करने को कहा है। हम उसका सम्मान करते हैं।"
लेकिन उसके बाद जानी-मानी अमेरिकी न्यूज वेबसाइट एक्सिओस की रिपोर्ट में कहा गया कि दो अमेरिकी अधिकारियों ने राष्ट्रपति की बात का खंडन किया और माना कि ट्रम्प को इस हमले के बारे में बताया गया था और उन्होंने उसे मंज़ूरी भी दी थी। इस खबर के बाद अटकलों का रुख मुड़ गया।
कई लोगों का मानना है कि यह अमेरिका और इज्राएल की भरमाने की रणनीति है। अमेरिका सार्वजनिक तौर पर आर्थिक झटकों से बचने के लिए ऊर्जा केंद्रों पर हमला न करने की अपील करता है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए दिखावटी रवैया है, जबकि असली मकसद ईरान को संसाधनों को ठप करना है। इस दिखावे से राजनैतिक सुरक्षा और कूटनीतिक गुंजाइश मिलता है, लेकिन दोनों का लक्ष्य एक ही है।
लंदन में रहने वाली नाइजीरियाई लेखिका चिमाज़ुरु न्नाडी-ओफरगु ने ईरान में अमेरिका-इज्राएल की कार्रवाई पर मक्तूब मीडिया से कहा, "यह पुराना ढर्रा। वही नाइंसाफी और यही रवैया पश्चिम की मनमानी करने की छूट देता है।" दक्षिणी गोलार्द्ध के विकासशील देशों में बहुत कम लोग ही अमेरिका और इज्राएल के बीच कोई फर्क देखते हैं।
यह कतई नामुमकिन लगता है कि इज्राएल वॉशिंगटन से हरी झंडी मिले बिना कुछ करेगा। नेतन्याहू अमेरिका पर इस कदर निर्भर हैं कि वे ट्रम्प को झांसा देने की चालाकी नहीं दिखा सकते हैं। बेशक, नेतन्याहू अमेरिका को ईरान के साथ युद्ध में खींचने में कामयाब रहे हैं। उनकी ऐसी मंशा को इसके पहले तक किसी अमेरिकी राष्ट्रपति ने नहीं माना था। इसलिए नेतन्याहू इस मौके को गंवाने का जोखिम नहीं उठा सकते। उन्हें यह भी पता है कि अमेरिकी राजनीति में इज्राएल की भूमिका पर लगातार सवाल उठ रहे हैं, और शायद भविष्य में व्हाइट हाउस और राजनीति में उसकी पकड़ कमजोर पड़ जाए।
यह बिल्कुल साफ है कि ईरान बहुत ही मजबूत दुश्मन है। बार-बार बमबारी, लगभग समूचे शीर्ष राजनैतिक और सैन्य नेतृत्व को खत्म कर दिए जाने, अमेरिका और इज्राएल जैसे हवाई सुरक्षा तंत्र या आधुनिक हथियारों की कमी के बावजूद ईरान अपनी लड़ाई जारी रखने में कामयाब है।
ट्रम्प के मजबूत सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक समर्थन के बिना इज्राएल के लिए इस युद्ध को जारी रखना मुश्किल होगा। होर्मुज जलडमरूमध्य के कुछ हद तक बंद होने, और उसके साथ ही खाड़ी-अरब देशों (कतर से लेकर सऊदी अरब, यूएई, बहरीन और कुवैत तक) में तेल और गैस के बुनियादी ढांचे पर ईरान के जवाबी हमले से दुनिया के ऊर्जा बाजार में हलचल मची हुई है।
शायद ट्रम्प तेल के बुनियादी ढांचे पर हमलों से खुद को अलग रखना चाहते थे। हालांकि अमेरिका ने ही ईरान के खर्ग द्वीप पर हमला किया था। अमेरिका और इज्राएल दोनों इस मामले में एक साथ हैं, और नरम-गरम रणनीति दोनों ही देशों के फायदे में है।
फायदे में तो पुतिन
अमेरिका और इज्राएल के ईरान पर हमलों से दुनिया पश्चिम एशिया में जारी जंग के व्यापक असर को लेकर फिक्रमंद हुई, तो यूरोप में लंबे समय से जारी यूक्रेन और रूस युद्ध फिलहाल ओझल हो गया, जो कभी पश्चिमी कूटनीति पर हावी अहम भू-राजनैतिक संकट था। पश्चिम एशिया युद्ध से पैदा हुए ऊर्जा संकट ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में हलचल मचा दी है। यूरोपीय नेताओं का ध्यान भी अब यूक्रेन से हटकर ईरान पर चला गया है।
मॉस्को के लिए, इस बदलाव से कुछ अप्रत्याशित फायदे हुए हैं। वैश्विक ऊर्जा बाजारों में उथल-पुथल और खाड़ी देशों से सप्लाई पर खतरे के मद्देनजर रूसी तेल पर प्रतिबंध ढीला हो गया है। अमेरिका ने रूस पर अपने कुछ पिछले प्रतिबंध हटा लिए हैं। भारत को रूसी तेल खरीदने की "इजाजत" दी गई है, जिसे उसने काफी कम कर दिया था। मौजूदा ऊर्जा संकट और तेल की कीमतों को स्थिर करने की उम्मीद में ट्रम्प प्रशासन ने भारत पर 30 दिनों के लिए प्रतिबंध हटा दिए हैं।
लेकिन अमेरिका के ढील देने पर यूरोपीय नेताओं ने जोरदार विरोध किया। यूरोपीय संघ काउंसिल के प्रेसिडेंट एंटोनियो कोस्टा ने कहा कि यह "बहुत चिंताजनक" है। जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने कहा कि यह फैसला "गलत" है, जबकि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रां ने कहा कि इसका "कोई औचित्य नहीं" है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर के एक प्रवक्ता ने कहा, "रूस को रोकने का सबसे अच्छा तरीका है कि हम मिलकर दबाव बनाए रखें और यूक्रेन में युद्ध को समाप्त करें।"
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की भी अपने यूरोपीय समर्थकों की तरह ही नाखुश थे। इमैनुएल मैक्रों के साथ बैठक के बाद पेरिस में जेलेंस्की ने कहा कि अमेरिका के इसी एक फैसले से रूस को जंग के लिए करीब 10 अरब डॉलर मिल जाएंगे। लेकिन ट्रम्प के लिए यूरोप की नाखुशी खास मतलब नहीं रखती। इसके बजाय, अब वे नाटो सहयोगियों से मांग कर रहे हैं कि वे होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने के लिए अपनी सेनाएं भेजें। ट्रम्प ने लंदन के 'फाइनेंशियल टाइम्स' से बातचीत कहा, "हमें यूक्रेन के मामले में उनकी मदद करने की जरूरत नहीं थी... लेकिन हमने उनकी मदद की। अब हम देखेंगे कि क्या वे हमारी मदद करते हैं। अगर कोई जवाब नहीं आता, या इनकार करते हैं, तो मुझे लगता है कि नाटो के भविष्य के लिए बहुत बुरा होगा।"
लेकिन अब तक किसी भी यूरोपीय देश ने ट्रम्प की बात पर ध्यान नहीं दिया है। ऑस्ट्रेलिया ने भी इनकार दिया है। ट्रम्प सिर्फ नाटो से ही नहीं, बल्कि चीन, जापान और दूसरे देशों से भी अपील कर रहे हैं कि वे जलडमरूमध्य से तेल की आवाजाही सामान्य करने में मदद करें। लेकिन किसी ओर से सकारात्मक जवाब नहीं मिला।
इस बीच, वोलोदिमीर जेलेंस्की यूक्रेन के सैन्य अभियान को जारी रखने के नए तरीके खोज रहे हैं, और युद्ध में परखी हुई ड्रोन तकनीक को तेल-समृद्ध खाड़ी देशों को पेशकश कर रहे हैं, इस उम्मीद में कि उन्हें युद्ध जारी रखने के लिए फंड मिल सके। यूक्रेन की टीमें खाड़ी देशों में गई हैं ताकि वे ईरानी ड्रोनों से निपटने में अपनी विशेषज्ञता मुहैया करा सकें। रूस यूक्रेन में ड्रोनों का इस्तेमाल कर रहा है और कीव ने ऐसे हमलों से निपटना सीख लिया है। पश्चिमी मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, रूस और यूक्रेन के बीच त्रिपक्षीय शांति वार्ता का तीसरा दौर शायद टल जाएगा, जिसकी अगुआई अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रम्प के दामाद जेरेड कुशनर कर रहे हैं। इस समय पश्चिम एशिया के संकट को ज्यादा प्राथमिकता दी जा रही है।
“इज्राएल ने (ईरान के साउथ पार्स में) अकेले ही कार्रवाई की। राष्ट्रपति ट्रम्प ने हमसे भविष्य में ऐसे हमले न करने को कहा है। हम उसका सम्मान करते हैं। हमारे बीच सुई भर फर्क नहीं है।