प्रभात अपने तीसरे कविता संग्रह, में ग्राम्य जीवन को कुछ यूं याद करते हैं,
‘‘तिपाए पर पानी का घड़ा रखा होता था, अनाज के ढेर के पास, तूड़े के ढेर के पास मेरी खाट और ऊपर तारों जड़ी रात।’’ वे ऐसे कवि हैं, जो वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा को सही मायने में पहचानते हैं। जीव-जंतुओं, जंगलों, नदियों, पहाड़ों और पेड़ों को इस दुनिया का नागरिक मानते हैं। ‘त्योहार’ कविता में वह हिंदू-मुसलमान के मिलजुल कर रहने की बात करते हैं। साझी संस्कृति का ख्वाब देखते हैं, जो असल में भारत की नींव है। ‘रफूगर’ कविता इसी नींव की बानगी है।
उनकी कविताओं का आम आदमी इस देश का मध्यमवर्गीय और गरीब आदमी है। उसे भरे बाजार में घिसी चप्पलों का तकिया लगाकर नींद आ जाती है। वह उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहता। वह आत्महत्या के विरुद्ध है और निराशा से उबरने के तरीके खोज रहा है। वह तानाशाही का शिकार है, व्यवस्था से दुखी है लेकिन व्यवस्था के नुमाइंदों के भीतर भी मनुष्य की पहचान करना जानता है जैसे, “देखो एक बुढ़िया सिपाही को टमाटर दे रही है, और थाने को गाली। देखो एक बूढ़ा उसे मारने आए सैनिक से खाना खाने के लिए कह रहा है।”
इन कविताओं में राजस्थान प्रदेश की स्त्रियों का संघर्ष और दुख उभरकर सामने आता है। ‘नीलम’, ‘आधी आबादी’ और ‘जीने की जगह’ स्त्री विमर्श की सशक्त कविताएं हैं। लहंगा-लूगड़ी के माध्यम से प्रभात यहां की संस्कृति का चित्र खींच देते हैं। ‘धरोहर’ लंबी कविता है, जो सामान्य कृषक जीवन और मृत्योपरांत संसार की बात करती है। इस कविता में श्मशान वैराग्य की सघन अनुभूति है। प्रभात की कविताओं में श्मशान भी जीवन का उत्सव मनाता है, वहां बारिश होती है, ओले गिरते हैं, वे हवा से उड़ते हैं, फिर धूप निकलती है। चिता पर रखे जा रहे मृतक के लिए प्रभात रंग-बिरंगे वस्त्रों का जिक्र करते हैं, न की फीके वस्त्रों का। रंगों का यह प्रयोग प्रभात की कविता को सकारात्मक और आशावादी बनाता है।
अबके मरेंगे तो बदली बनेंगे
प्रभात
400 रुपये
246 पृष्ठ
समीक्षक
देवेश पथ सारिया