Advertisement

कहानी - हज़रत नचनिया

हजरत, यही नाम था उसका। पहले किसी नाच पार्टी में था या नहीं, सो नहीं मालूम पर वह नचनिया अपने ही ढंग का...
कहानी - हज़रत नचनिया

हजरत, यही नाम था उसका। पहले किसी नाच पार्टी में था या नहीं, सो नहीं मालूम पर वह नचनिया अपने ही ढंग का था।जिस उम्र में नचनिए बटईया या बनिहारी कमाने लगते हैं। उस उम्र में वह अभी भी नाच पर अपना भरोसा कायम किये हुए था। हालांकि वह अन्य नचनियों की तरह न तो पाउटी काटता था, न ही बुनिया झारता था, न ही चौकी तोड़ उछाल मार पाता था पर उसके नाचने में एक बात थी। मेरे पापा हर दुपहरिया या ढलते दिन में बड़े इत्मीनान से चौकी पर बैठकर हजरत का नाच देखते थे और साथ ही उससे चुहल भी करते रहते। हजरत लंबा कुर्ता और सलवार पहनता था और अपने टोंटीदार लोटे को जमीन पर रखकर, एक घेरे में नाचते हुए गीत गाता था । उसे आप मंगता नहीं कह सकते थे। 

वह मन का ढीठ था। उसे अपनी गायकी और नाच पर उतना ही गुमान था, जितना किसी बड़े कलाकार को अपनी कला पर होता होगा। अपने टोंटीदार लोटे को सामने रखकर वह थोड़ा नाचता और कभी बैठकर सारंगा सदाबृज सुनाता तो कभी कबीर के पद, मैंने लोरिक गायन भी उसके मुँह से सुना है और यकीन जानिए जब वह “हफ्ता में दु बार पूजालू, सुके अउर सोमार, हो मइया थावे वाली, हो मइया रहसु वाली” डूबकर गाता तो किसी बड़े देवी भक्त से तनिक भी कम न लगता। जिस तरह उसके लिए जुमे की नमाज़ का वक़्त मुकर्रर था, ठीक उसी तरह वह थावे वाली माई का यह नाच का गीत केवल शुक्र और सोमवार को ही गाता। बाकी समय उसके लिए राम, रहीम, कृष्ण, कबीर और उनके गीतों में कोई फर्क न था। 

एक बार रिक्शे वाले रमजान ने बताया था कि 'उ का करी नाच गान छोड़ के मेहनत होइ ओकरा से जी? सुकुंवार मनई ह, मेहनत के काम ना कर सकेला।'- रमजान खुद रेघा रेघा के लंबी जुदाई गाकर तारीफ बटोरने में उस्ताद था।

हजरत को आये देख वह भी रिक्शा कुँए के पास खड़ा करके खैनी ठोंकता बैठ जाता और मुँह में खैनी फँसा, चौकी पर बैठकर हज़रत के गानों पर ठेका देने लगता।

मेरे लिए हजरत के छिदे नाक-कान, ढली हुई उम्र और पिपिहरी सी बजती आवाज़ और बेलोच वाला नाच एक अलग ही अनुभव था। मैं ठीक-ठीक नहीं कह सकता कि मैं उसे पसंद करता था कि नहीं ओर इतना जरूर है कि उसको सड़क से घर की ओर उतरते देखकर बगीचे में थाड़ी-चिक्का खेलना छोड़ घर भाग आता था। लंबा मुँह, पतला झुर्रीदार शरीर और जैसा मैंने जिक्र किया पिपिहरी आवाज़ , ऐसी आवाज़, जिस पर मुझे इतना यकीन है कि अंडमान के किसी टापू पर सुन लूँ तो हुलस के कह दूंगा - 'अरे ई तो हजरतवा की आवाज़ है।'

मुझे आज भी उसके कई गीत याद है । वह राम की सवारी भी गाता - की आही मोरे रामा, गरदा उड़वले आसमान नु हो।'- बाद में कुछ पढ़ गया तो जाना इधर के रसूल मियाँ भी तो थे, जो राम का सेहरा गाते थे। गाने और नाच के बाद वह अपने टोंटी वाले लोटे में ही भर लोटा अनाज लेता था और फिर भर पेट सतुआ खाता। 

इन सब लेन देन के बाद मौसमी सब्ज़ियाँ, फल आदि वह अधिकार पूर्वक सच कहूं तो डांट डपट के माँग लेता और ऐसा करते वह घुटनों से बैठकर हथेली से जमीन पीटकर कहने लगता 'इहे बड़का बनल बाड़s लोग, एगो पेट नईखे जियावल जात? का जी बाबा इहे होइ ? कटहरवा के कोआ बा त दी।”- बईर, बड़हर, आम, पपीता उसको जो मिल जाए, दिख जाए, नेनुआ, झिंगनी, कोंहड़ा, जो मिल जाए, सब ले जाता। पापा उसकी हरकतों पर हंसते-गरियाते, उसकी बोली से शर्माते सब देते - “बड़ा अनेरिया ह ई। साफ लगाम ना ह एकरा बोले में।”- हालांकि यह भी सच है कि हजरत आने में कुछ दिनों की देर करता तो हम सब उसके ना आने को महसूस करते। उसके गायकी से लेकर, उसके खाने तक में वह हमें याद था। उसके खाने का ढंग भी निराला था। डेढ़ सेर सतुआ में चार टुक्का प्याज़ और टिकोरे की चटनी के बाद मुठ्ठी भर मिर्च का घोरुआ पी जाना, दर्जन भर रोटी, भर छिप्पा भात केले के पत्ते पर वह आराम से खाता और कहता - 'जानsतारs बाबा! एहिजा हक से खा लेनी । राउर बाबा बड़ा मानत रहनी हमरा के, उहाँ के गइला के बादो ए दुअरिया से मोह ना छुटेला हमार। तहरा बाप के पैदाइश हमरे सोझा के ह। खूब सोहर गा के नचले रहनी हम। - मैंने एक रोज पूछा तो हेतना खालs तब पातरे बाड़ s मर्दे? कईसे? - हजरत लोटा थैले में डालकर जाते हुए बोला - 'हमार देह डोरा बा बाकी पेट बोरा ह। हमनी के अनाज ना नु जुरेला हो, जब जुरेला त देहिया सोखा गईल रहेला। ओइसे जब नट्टी परले चाँपेनी त अनाज देहिये के चर जाला ।' - उसकी बात मुझे तब समझ नहीं आयी थी। 

स्कूल में ऊपर को बढ़ते-पढ़ते थोड़ी समझ होनी शुरू हुई ही थी कि एक कठुआई सुबह देखा कि रमजान पापाजी से कुछ घबराहट में बात कर रहा है। मैं नाद के पास गया तो पता चला कि बीती रात हजरत अपने चांपाकल के पास काई पर फिसल के गिर गया था और सुबह पता चला हजरत वही मरा हुआ पाया गया था। उस रोज़ रमजान के रिक्शे पर बैठकर पापा के साथ मैं लगभग पौने दो कोस दूर उसके गाँव गया। रोने के नाम पर कोई नहीं, एक मौलाना थे, जिन्हें आखिरी रस्म पूरी करनी थी और चंद पड़ोसी थे, जिन्हें मिट्टी देने भर की नेमत ही अता करनी थी। नीचे कब्र में हजरत लेटा दिया गया था। रमजान रुंआसा होकर बोला “देखतानी बाबा! बादुर नियन मुँहवा सुख गईल बा एकर। आहि रे!”- मैं उसके बादुर नियन मुँह को देख रहा था। नचनिया सो गया था बड़ी अजीब मौत पाकर। - मौलाना साहब से एक औरत बोली “हई लोटवा आ झोरवा का होइ मौलबी साहेब? - मौलवी ने क्षण भर सोचकर कहा -“एकरे साथे राख द, जब केहू हइये नईखे। “- हजरत नचनिया हमेशा के लिए सो गए थे।

रमजान हमे लेकर नहर के किनारे-किनारे लौट रहा था। पापा कुछ बोल नहीं रहे थे लेकिन रमजान बोल रहा था -“केहू न रहल बाबा ओकर! एहीसे सब जगहा से गइला के बाद अपने दुअरवा पर आवत रहे। ओकर आत्मा ओहिजा बसल रहे। अपने किहाँ!” - रमजान भी तो अकेला था फिर! मैं यह सोच सिहर गया कि कहीं रमजान ने अपना कल तो नहीं देख लिया?- लेकिन रमजान ने सायफन के ढलान पर उतरते हजरत का एक गीत गुनगुनाकर माहौल बदल दिया - 'की आही मोरे रामा, गरदा उड़वले आसमान नु हो - नचनिया चला गया था, उसके गीत और उसका नाच ही रह गए थे। हजरत मेरे देखे सबसे पुरनिया नचनियों में से था। उसकी पिपिहरी-सी आवाज़ बड़े दिनों तक रमजान को चिढ़ाती 'ऐ बाबा जानतानी, रमजनवा के बियाह भईल रहे मेहरारू पहिलके रतिया भाग गईल, जानतानी काहें! सरऊ सुहागरात के राते नाच के पाट खेल दिहलस - आयी मिलन की रात सइयाँ मारा ऐसा लात की भुभुन फुट गया कि कंगन टूट गया'- पापा ने एक उदास दी हँसी हँस दी। 

समय की दीवार पर हजरत की वह आवाज़ और नाच की तस्वीर वैसे ही टंगी हुई है। बस मरते वक्त किसी नचनिये का मुँह न देखिएगा। सच! भूख, अकेलापन, उपेक्षा या के कुछ और ही था वह और सच में मरे वक्त उसका मुँह बादुर नियन हो गया था। बादुर भी गाते-नाचते हैं क्या? नहीं! रमजान गलत था, हज़रत बादुर नहीं था, नचनिया था। वहीं नचनिया जो हमारे जीवन के परछाइयों से भी दूर खड़े नाचते हैं । 

(कहानी के लेखक डॉ. एम. के. पांडेय सत्यवती कॉलेज दिल्ली विश्वविद्यालय में एसोसियेट प्रोफ़ेसर हैं)

 

अब आप हिंदी आउटलुक अपने मोबाइल पर भी पढ़ सकते हैं। डाउनलोड करें आउटलुक हिंदी एप गूगल प्ले स्टोर या एपल स्टोर से
Advertisement
Advertisement
Advertisement
  Close Ad