लौह पुरुष सरदार पटेल पर नाटक के मंचन और अंटार्कटिका पर रंगमंच का परचम लहराने के साथ भारंगम 2026 समाप्त हो गया। इस तरह भारंगम ने अपने 25 वर्ष का सफर पूरा किया। भारतीय रंगमंच के इतिहास में 25 वर्ष कम नहीं होते और इनमें 11 वर्ष तो मोदी के शासन काल के हैं जहां सरकारी संस्थानों की स्वायत्तता भी खतरे में पड़ गयी हैं। यूं तो भारंगम में देश-विदेश के करीब 5000 कलाकारों द्वारा नाटकों के 280 प्रदर्शन ने भारत की सांस्कृतिक विविधता को पेश किया और देश को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया।

इस भारंगम का नारा ही 'संवाद संस्कृतियों का' रहा। पिछले 25 साल से हो रहा है यह भारंगम अब भारतीय रंगमंच का एक अनूठा उपक्रम बन गया है, हालांकि इस आयोजन को लेकर भी कई तरह के सवाल भी उठे। कुछ रंगकर्मियों ने यहां तक कहा कि अब इस पर "भगवा रंग" की छाया दिखने लगी है और यही कारण है कि वीर सावरकर पर नाटक का प्रदर्शन किया गया और दक्षिणपंथी रुझान के रंगकर्मियों और लेखकों की कृतियों पर चर्चा की गई और उनके नाटक भी खेले गए। अगर इन अप्रिय और विवादास्पद प्रसंगों को छोड़ दिया जाए तो भारंगम ने कई नई चीजें भी दी जो एनएसडी में पहले नहीं हुआ और कुछ नए कदम भी उठाये गए। मसलन इस बार "आकाश रेडियो" ऐप और "नाट्यम" ओटीटी प्लेटफॉर्म भी लांच किया गया, जहां राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की गतिविधियों और नाटकों को देखा व सुना जा सके। इंटरनेट और सोशल मीडिया के जमाने में यह जरूरी कदम है।
इसके साथ ही टीआईई के "जश्ने बचपन को" जो वर्षों से बन्द था, फिर से वापस लाया गया और ट्रांस जेंडर की आत्मकथा पर नाटक भी खेले गए। इस तरह रंगमचं को समावेशी बनाने की कोशिशें की गईं।
भारंगम की समाप्ति पर एनएसजी के डायरेक्टर चंद्र चितरंजन त्रिपाठी ने बाकायदा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी उपलब्धियों का लेखा-जोखा पेश किया और इस बात पर लगातार जोर दिया कि भारत ने विश्व रंगमंच के इतिहास में इतना बड़ा आयोजन कर एक नया कीर्तिमान बनाया है और भारत दुनिया का पहला ऐसा देश बन गया है जिसने अंटार्कटिका पर भी रंगमंच का परचम फहराया। वैसे अंटार्कटिका पर कोई नाट्यमण्डली गयी नहीं थी बल्कि वहां भारतीय मिशन के वैज्ञानिकों ने खुद एक नाटक किया और गीता का संदेश दिया।यह सब वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में किया गया। गौरतलब है कि मोदी सरकार ने जन गण मन के प्रोटोकाल को बदल कर उसकी जगह वंदे मातरम को पहले गवाने का फैसला किया है।
27 जनवरी से 20 फरवरी 2026 तक होने वाले इस फेस्टिवल में 136 भारतीय और 12 विदेशी नाटक प्रस्तुत किए गए, जिसमें हर महाद्वीप से कम से कम एक परफॉर्मेंस शामिल था। इस साल 33 महिला निर्देशको के नाटक भी हुए और श्रुति कार्यक्रम में 19 किताबों का विमोचन भी हुआ।
इनमे वीरेंद्र नारायण मोहन महर्षि सोनल मान सिंह, इला अरुण, सचिदानंद जोशी देवेंद्र राज अंकुर सुरेश शर्मा, मालिनी अवस्थी, रवींद्र त्रिपाठी आदि की किताबों पर विचारोत्तेजक चर्चाएं हुईं। श्रुति कार्यक्रम में रंगप्रसंग के 59 वें अंक का विमोचन भी हुआ जिसका सम्पादन शशि प्रभा तिवारी ने किया।
रंगमंच के युगपुरुष इब्राहम अल्का जी पर भी महत्वपूर्ण चर्चा हुई जिसमें रामगोपाल बजाज देवेंद्र राज अंकुर,अमिताभ श्रीवास्तव वाणी त्रिपाठी और श्री त्रिपाठी ने भाग लिया। नाटककार दयप्रकाश सिन्हा को भी याद किया गया।
भारंगम में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, बिरसा मुंडा और लोकमाता अहिल्या बाई जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धांजलि देने वाले विशेष नाट्य प्रदर्शन भी हुए। इन आयोजनों से अब सवाल यह उठा कि ज्योतिबा फुले, नेहरू, अंबेडकर, मौलाना आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खान, भगत सिंह पर नाटक क्यों नहीं? क्या मोदीं सरकार की नजर में ये देशभक्त नहीं या मोदी सरकार अपने नायकों और राष्ट्रवादियों को अधिक तरजीह देने लगी है।
प्रधानमंत्री इस नाटक की तारीफ कर चुके हैं। इस नाटक का निर्देशन चितरंजन त्रिपाठी ने किया है।गत वर्ष गुजरात के केवडिया में प्रधानमंत्री के सामने ही इसका मंचन हो चुका है।
भारंगम का उद्घटान मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम नाटक से हुआ था। इस तरह एनएसडी लगातार वही सन्देश दे रहा जो सरकार देना चाहती है। यह सच है कि सरकार के अनुदान से यह होता है पर क्या सरकार एनएसडी के जरिये अपना कोई एजेंडा भी लागू करना चाहती है।
भारंगम को सफल बनाने में दास हज़ार मजदूरों और सौ से अधिक तकनीशियन का भी बड़ा योगदान है जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर काम किया। वामन केंद्रे के जमाने मे शुरू आदि-रंग महोत्सव में 400 से अधिक जनजातीय कलाकारों ने भारंगम में अपनी संस्कृति का परिचय दिया। यह महोत्सव देशभर में 54 स्थलों पर आयोजित किया गया। इसे न्यूज़ीलैंड, कनाडा और क़तर जैसे देशों में भी प्रस्तुत किया गया है, जहाँ भारतीय प्रवासी समुदाय ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।
श्री त्रिपाठी का कहना है कि: “रंगमंच की शायद ही कोई विधा या शैली होगी जिसे इस 25वें संस्करण में स्थान न मिला हो। आदि-रंग के माध्यम से जनजातीय समुदायों का उत्सव मनाते हुए हम समाज के हर तबके के थिएटर को मंच प्रदान कर रहे हैं। आज वाणिज्यिक यौनकर्मियों द्वारा प्रस्तुत एक विशेष नाट्य प्रस्तुति भी आयोजित की गई। थिएटर को विविधतापूर्ण बनाना हमारा संस्थागत सामाजिक दायित्व है।”
इसके अतिरिक्त ओडिशा, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश समेत विभिन्न राज्यों से धप नृत्य, मयूरभंज छाऊ, ककसर, धीमसा, सिद्धी धमाल, कर्मा सैला तथा बी डांस जैसे जनजातीय लोक-नृत्यों का प्रदर्शन भी किया गया और कई क्षेत्रीय भाषाओं और बोलियों में नाटक हुए।
भारंगम में 228 भारतीय और अंतरराष्ट्रीय भाषाओं एवं संवाद शैलियों में नाटक हुए। देश के हर राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश से आए रंगकर्मियों तथा 9 देशों की भागीदारी ने इसे सच्चे अर्थों में वैश्विक रंगमंच उत्सव बनाया। एनएसडी छात्र संघ द्वारा आयोजित ‘अद्वितीय’ कार्यक्रम के अंतर्गत मीता बशिष्ठ पंकज त्रिपाठी आदि की सुंदर बातचीत हुई।
प्रसिद्ध फिल्मकार सुजीत सरकार और चित्तरंजन त्रिपाठी के बीच हुई विचारोत्तेजक बातचीत हुई। नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन हुए और छात्रों को जोड़ा गया। एनएसडी ने चुनिंदा नाट्यमण्डलियों को अपने रिहर्सल करने की सुविधा देने का भी एलान किया जो स्वागत योग्य कदम है। लेकिन सरकार जब करोड़ो रुपए भारंगम पर खर्च करती है तो उसका सोशल ऑडिट भी किया जाना चाहिए। इन 25 वर्षों में भारंगम ने रंगमंच की संस्कृति को फैलाने में कितना योगदान दिया और दर्शकों की दृष्टि में कितना सार्थक आयोजन हुआ तथा समाज पर क्या असर हुआ।