"समानो मन्त्र: समिति: समानी" — ऋग्वेद की यह कालजयी उक्ति आज भारत और यूरोपीय संघ (EU) के संबंधों पर बिल्कुल सटीक बैठती है, जिसका अर्थ है: हमारे विचार समान हों और हमारी समितियाँ (संगठन) एक हों। जब 26 जनवरी 2026 की सुबह दिल्ली के कर्तव्य पथ पर भारत का तिरंगा और यूरोपीय संघ का नीला ध्वज एक साथ लहरा रहे थे, तो यह केवल एक समारोह नहीं, बल्कि इसी प्राचीन विचार का आधुनिक अवतार था।
नई दिल्ली में भारत-ईयू शिखर सम्मेलन के ठीक बाद यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने ट्वीट किया: "आज दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों ने सुरक्षा और रक्षा साझेदारी का शुभारंभ किया। यह रक्षा उद्योग से लेकर समुद्री सुरक्षा तक—उन सामरिक मुद्दों पर मजबूत सहयोग का मंच है जो सबसे अधिक मायने रखते हैं। विश्वसनीय भागीदार यही करते हैं।" इस ट्वीट की दहाड़ वाशिंगटन और बीजिंग तक साफ सुनी गई। यह महज औपचारिक घोषणा नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति का एक नया मोड़ है। गणतंत्र दिवस के मुख्य अतिथि के रूप में उर्सुला की मौजूदगी के कुछ ही घंटों बाद इन समझौतों पर हस्ताक्षर होना यह दर्शाता है कि दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र अब एक-दूसरे के अभेद्य सामरिक दुर्ग बन रहे हैं।
एक 'स्वाभाविक रिश्ता' और मानवीय जुड़ाव
भारत और यूरोपीय देशों के बीच यह एक 'नैचुरल रिलेशनशिप' है। यूरोप की उच्च और संवेदनशील तकनीक जब भारत के विशाल बाजार और मेधा के साथ मिलती है, तो दोनों की ताकत कई गुना बढ़ जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि ये दोनों शक्तियां ऐतिहासिक रूप से कभी एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं रही हैं। विभिन्न यूरोपीय देशों में मौजूद लाखों भारतवंशी वहाँ के समुदायों में मिठास और सहभागिता का संचार कर रहे हैं, जो इस रिश्ते को केवल सरकारी फाइलों तक सीमित न रखकर 'पीपुल-टू-पीपुल' कनेक्ट प्रदान करता है।
भारत और यूरोपीय मुल्कों के समूह के बीच बाजार और व्यापार के साथ, रक्षा से लेकर विज्ञान और तमाम क्षेत्रों में सहयोग सहमति और समझौते विश्व भर में सुर्खियां बन गये हैं। इसकी व्यापकता की गूंज आगे दिखाई देगी। फिलहाल तो यह कि यह केवल एक औपचारिक घोषणा नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति में एक नई 'दहाड़' है।
लैटिन भाषा में एक शब्द है ‘उर्सा’, जिसका अर्थ होता है—एक छोटी शेरनी। एक ऐसी रक्षक जो अपनी ज़मीन पर अडिग खड़ी रहती है, जिसकी दहाड़ में साहस है और जिसकी उपस्थिति में सुरक्षा का भाव। इसी पृष्ठभूमि में, 26 जनवरी 2026 की सुनहरी सुबह, लहराते हुए इन्हीं दो ध्वजों के सामने यह उपमा बिल्कुल सटीक जान पड़ रही थी। भारत के 77वें गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुख्य अतिथि के रूप में बैठीं यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन केवल एक राजनयिक नहीं, बल्कि एक नए युग की वास्तुकार नजर आ रही थीं।
यह केवल एक प्रोटोकॉल वाली यात्रा नहीं थी; यह विश्व के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के मिलन का वह क्षण था, जहाँ 'वीमेन लेड डेवलपमेंट' (महिला नेतृत्व वाला विकास) का विचार धरातल पर उतर रहा था। एक तरफ भारत की पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और दूसरी तरफ यूरोप की सबसे शक्तिशाली महिला उर्सुला—यह दृश्य पूरी दुनिया को संदेश दे रहा था कि भविष्य की वैश्विक व्यवस्था अब केवल शक्ति के संतुलन से नहीं, बल्कि समावेशी और दृढ़ महिला नेतृत्व से संचालित होगी।
चिकित्सक से राजनेता तक का युद्ध-परीक्षित सफर
उर्सुला वॉन डेर लेयेन का व्यक्तित्व उनके करियर की तरह ही बहुआयामी है। एक चिकित्सक के रूप में करियर शुरू करने वाली उर्सुला ने स्टेथोस्कोप छोड़कर जब राजनीति की गलियों में कदम रखा, तो उन्होंने समाज की व्याधियों का इलाज करना शुरू किया। एंजेला मर्केल की कैबिनेट में जर्मनी की पहली महिला रक्षा मंत्री बनने से लेकर यूरोपीय आयोग की पहली महिला अध्यक्ष बनने तक, उनका सफर "शी-बियर" वाली दृढ़ता का प्रमाण है। उन्होंने तब सेना में सुधारों का नेतृत्व किया जब यूरोप पर भू-राजनीतिक दबाव बढ़ रहे थे।
उन्होंने तब यूरोप की कमान संभाली जब वह ऊर्जा संकट, यूक्रेन युद्ध और संरक्षणवाद के झटकों से जूझ रहा था। आज दिल्ली में उनकी उपस्थिति इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने यूरोप को न केवल संकटों से उबारा, बल्कि उसे सामरिक रूप से स्वायत्त (Strategic Autonomy) भी बनाया है। डोनाल्ड ट्रंप की आलोचनाओं और नाटो पर उठते सवालों के बीच उन्होंने हमेशा यूरोपीय संप्रभुता का झंडा बुलंद रखा। उनके साथ गोवा-वंशज एंटोनियो कोस्टा की उपस्थिति इस कूटनीतिक यात्रा में एक भावनात्मक और सांस्कृतिक मिठास घोल रही थी।
2005 से 2026: यूरोप की वह यात्रा और आज
मेरे लिए तो यह क्षण एक बीस साल पुराने चक्र के पूरा होने जैसा है। मुझे याद है 30-31 मई 2005 के वे दिन, जब मैंने ब्रुसेल्स में 'यूरोपीय नीति केंद्र' (EPC) द्वारा आयोजित 'क्रॉसिंग बाउंड्रीज़' सम्मेलन में भाग लिया था। वह दौर भारत और यूरोपीय संघ की रणनीतिक साझेदारी का शैशव काल था।
एक रोचक किस्सा:
2005 के ब्रुसेल्स सम्मेलन के दौरान एक अनौपचारिक चर्चा में एक वरिष्ठ यूरोपीय राजनयिक ने कहा था, "यूरोप और भारत दो ऐसे विशाल जहाज हैं जो शायद धीमी गति से चलते हैं, लेकिन जब वे एक ही दिशा में मुड़ते हैं, तो पूरी दुनिया के समुद्र की लहरें अपना रुख बदल लेती हैं।" आज 2026 में 'मदर ऑफ ऑल डील्स' (FTA) और रक्षा समझौते के साथ उन जहाजों ने न केवल दिशा बदली है, बल्कि वैश्विक राजनीति का ज्वार भी बदल दिया है।
उस सम्मेलन में फ्रेज़र कैमरन, एक्सेल बर्कोफ़्स्की और गुस्तावो मार्टिन प्रादा जैसे दिग्गजों के साथ हमने जिस 'गैलीलियो सैटेलाइट सिस्टम' पर चर्चा की थी, विचार आज धरातल पर साकार हो रहे हैं। 2005 में जो नीतियां हमने कागजों पर उकेरी थीं, आज वे कर्तव्य पथ पर भारत की स्वदेशी मिसाइलों और यूरोपीय रक्षा सहयोग के रूप में कूच कर रही हैं। यह देखना संतोषजनक है कि भारत, गैलीलियो प्रणाली का पहला प्रमुख गैर-ईयू भागीदार बना और आज अंतरिक्ष से लेकर समुद्र तक हमारी साझेदारी अटूट है।
'सौदों की माँ': 2026 का ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता (FTA)
इस यात्रा का सबसे बड़ा आकर्षण 16वां भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन है, जहाँ उस समझौते पर मुहर लग रही है जिसे 'सौदों की माँ' कहा जा रहा है—भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता (FTA)। 2007 से लटका यह समझौता 2021 के बाद वैश्विक संकटों के दबाव में तेजी से आगे बढ़ा। हालांकि भारत को घरेलू उत्पादकों के अंतिम हितों को ध्यान में रखना होगा।
इस समझौते के प्रभाव दूरगामी हैं:
ऑटोमोबाइल: यूरोपीय कारों पर आयात शुल्क 110% से घटकर 40% रह जाएगा, जिससे बीएमडब्ल्यू और वोक्सवैगन जैसी कंपनियाँ भारत में क्लीन-टेक और विनिर्माण के बड़े केंद्र खोलेंगी
डिजिटल और आईटी: भारतीय पेशेवरों के लिए यूरोपीय संघ के देशों में वीज़ा नियमों का सरलीकरण होगा, जिससे हमारे युवाओं के लिए अवसरों के नए द्वार खुलेंगे।
रक्षा और सुरक्षा: जापान और कोरिया के बाद भारत तीसरा ऐसा देश बन गया है जिसके साथ ईयू ने रक्षा साझेदारी की है। 'एटालांटा' और 'एस्पाइड्स' जैसे समुद्री अभियानों के जरिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते दबदबे को रोकने के लिए भारत और यूरोप अब एक ही नाव पर सवार हैं।
भू-राजनीतिक भूकंप और भारत का कूट कौशल
आज की दुनिया खंडित है। एक तरफ ट्रंप प्रशासन की 'अमेरिका फर्स्ट' नीति है, जिसने रूसी तेल आयात के मुद्दे पर भारत पर 50% टैरिफ लगाने की धमकी दी है। दूसरी तरफ रूस, चीन और ईरान का बढ़ता हुआ अक्ष है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी ने उर्सुला वॉन डेर लेयेन को बुलाकर एक मास्टरस्ट्रोक खेला है।
संदेश स्पष्ट है:
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता अटल है। यदि अमेरिका दबाव बनाएगा, तो भारत के पास यूरोप जैसा एक विश्वसनीय और लोकतांत्रिक विकल्प मौजूद है। आज जब ट्रंप प्रशासन रूसी तेल के मुद्दे पर भारत पर 50% टैरिफ लगाने की धमकी दे रहा है, तब उर्सुला का यह कहना—"एक सफल भारत विश्व को अधिक स्थिर और सुरक्षित बनाता है"—दिल्ली के लिए एक बड़ा कूटनीतिक कवच है। उर्सुला ने साफ़ कर दिया है कि दुनिया को खंडित होने से बचाने का एकमात्र तरीका लोकतंत्रों के बीच 'खुलापन और संवाद' है। उर्सुला ने दावोस में स्पष्ट कहा था कि व्यापारिक शुल्कों का सहारा लेना एक "ऐतिहासिक गलती" है। वे भारत के साथ मिलकर एक ऐसी वैश्विक व्यवस्था गढ़ना चाहती हैं जो "धौंस" पर नहीं, बल्कि "लोकतांत्रिक मूल्यों" पर आधारित हो।
मध्य एशिया और ग्लोबल साउथ में भारत का नया कद
रूस-चीन-ईरान के बढ़ते वर्चस्व के बीच भारत अब एक 'लोकतांत्रिक पुल' की भूमिका निभा रहा है। जहाँ चीन अपने बीआरआई (BRI) के कर्ज जाल से मध्य एशिया को जकड़ रहा है, वहीं भारत और यूरोपीय संघ मिलकर बुनियादी ढाँचे और ऊर्जा के नए विकल्प दे रहे हैं। उर्सुला का मानना है कि एक सफल और विकसित भारत ही विश्व को स्थिर कर सकता है। ईरान के साथ भारत के संबंध और चाबहार बंदरगाह के जरिए ग्लोबल साउथ तक पहुँचने की दिल्ली की कोशिशों को यूरोप अब शक की नजर से नहीं, बल्कि सामरिक आवश्यकता के रूप में देख रहा है। यह उर्सुला की ही दूरदर्शिता है कि उन्होंने सुरक्षा और विकास को एक-दूसरे का पूरक बनाया है।
कूटनीतिक लचीलापन और बहु-संरेखण (Multi-alignment)
दिलचस्प बात यह है कि भारत और यूरोपीय आर्थिक समुदाय (EEC) के रिश्ते 1962 से हैं। 1962 के युद्ध से ठीक पहले भारत ने ब्रुसेल्स में अपना मिशन स्थापित किया था। जवाहरलाल नेहरू के दौर से शुरू हुई यह 'गुटनिरपेक्षता' आज मोदी के दौर में 'बहु-संरेखण' (Multi-alignment) बन चुकी है।
*बनारसी ज़री में यूरोपीय जैकेट*
कर्तव्य पथ पर जब उर्सुला वॉन डेर लेयेन अपनी विशेष बनारसी ज़री वाली जैकेट पहनकर उतरीं, तो वह केवल एक फैशन स्टेटमेंट नहीं था। वह 'इंडो-यूरोपीय संलयन' का प्रतीक था। उन्होंने कीव में ज़ेलेंस्की के साथ खड़े होकर जो साहस दिखाया था, वही दृढ़ता आज वे नई दिल्ली के साथ साझेदारी में दिखा रही हैं।
2047 तक भारत को एक 'विकसित राष्ट्र' बनाने के संकल्प में यूरोपीय संघ अब सबसे बड़ा भागीदार है। €100 अरब का निवेश, हरित ऊर्जा और रक्षा अनुसंधान में सहयोग—यह सब उस "इस्पात के पुल" की नींव है जो ब्रुसेल्स और दिल्ली को जोड़ता है।
2005 के ब्रुसेल्स सम्मेलन के उन मसौदों से लेकर 2026 के इस भव्य समारोह तक का सफर लंबा रहा है, लेकिन आज यह स्पष्ट है: जब दुनिया की दो सबसे बड़ी लोकतांत्रिक शक्तियाँ और महिला नेतृत्व एक साथ आते हैं, तो वे केवल सीमाएं पार नहीं करते, बल्कि भविष्य की नई सीमाओं को परिभाषित करते हैं। उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने साबित कर दिया है कि तूफानों के बीच वही बचता है जिसके पास "शेरनी" जैसा जिगर और "इस्पात" जैसी कूटनीति हो।
"स्नेहपूर्ण स्वागत के लिए धन्यवाद"
उर्सुला की यात्रा केवल फाइलों तक सीमित नहीं थी। उनके द्वारा हिंदी में किया गया ट्वीट—"स्नेहपूर्ण स्वागत के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद"—भारतीयों के दिलों को छू गया। कर्तव्य पथ पर बनारसी ज़री वाली जैकेट पहनकर उन्होंने जो 'इंडो-यूरोपीय संलयन' का प्रतीकात्मक दृश्य प्रस्तुत किया, वह भारतीयों के दिलों को छू गया।
मोदी ने सही कहा कि उनकी उपस्थिति साझा मूल्यों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाती है। उर्सुला ने साबित कर दिया है कि एक 'शेरनी' की तरह वे न केवल अपने क्षेत्र की रक्षा करती हैं, बल्कि उन लोकतंत्रों के साथ मजबूत पुल भी बनाती हैं जो किसी भी वैश्विक धौंस के आगे झुकने से इनकार करते हैं।
2005 के ब्रुसेल्स सम्मेलन के उन मसौदों से लेकर 2026 के इस भव्य समापन तक, यह यात्रा धैर्य और विश्वास की जीत है। भारतीय तिरंगा और ईयू का झंडा आज एक साथ लहराकर यह कह रहे हैं कि एक खंडित दुनिया में भी 'साझा लचीलापन' (Mutual Resilience) संभव है।
(ओंकारेश्वर पांडेय एक द्विभाषी पत्रकार, लेखक और विचारक हैं।)