छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत के बाद फैली हिंसा और अशांति की आड़ में कट्टरपंथी ताकतें भारत विरोध को हवा देकर आसन्न चुनावों को बेमानी बनाने और अपना दबदबा कायम करने की कोशिश में
नए साल में 12 फरवरी को चुनावों के ऐलान के साथ बांग्लादेश स्थिरता की ओर बढ़ता दिख रहा था कि छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी की मौत से हिंसा का एक और खतरनाक दौर शुरू हो गया। यह हिंसक दौर नहीं रुका तो यह उन सभी उपलब्धियों और लोकतांत्रिक सिद्धांतों पर पानी फेर सकता है, जो आंदोलन से हासिल हुआ था। हादी खुद ढाका से चुनाव लड़ने वाले थे। हादी पर हमला चुनाव आयोग के आम चुनावों की तारीखों के ऐलान के अगले दिन ही हुआ। हादी छात्र समूह इंकलाब मंच के वरिष्ठ नेता थे। वे भारत के कड़े और बेबाक आलोचक भी थे और अमूमन नई दिल्ली पर बांग्लादेश की राजनीति में दखल देने का आरोप लगाते थे। छात्रों की भारत के प्रति नापसंदगी का बहुत कुछ लेना-देना इस बात से है कि विपक्षी राजनैतिक पार्टियों की तरह वे भी नई दिल्ली को शेख हसीना का ‘‘हमदर्द’’ मानते रहे हैं। पहले, बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) हसीना को भारतीय कठपुतली कहा करती थी। अब कट्टरपंथी तत्व बांग्लादेश पर दबदबा बनाने की फिराक में हैं।

रोष का सबबः हादी की हत्या के बाद ढाका में बीएनपी का प्रदर्शन
कट्टरपंथी तत्वों के प्रदर्शनों में घुसपैठ के मद्देनजर इंकलाब मंच ने खुद को हिंसा से दूर कर लिया है। मंच ने कहा, ‘‘वे (कट्टरपंथी) असल में तोड़फोड़, हिंसा आगजनी के जरिए बांग्लादेश को नाकाम देश बनाना चाहते हैं। वे इस देश की आजादी और संप्रभुता को खतरे में डालना चाहते हैं।’’ एक लोकप्रिय युवा नेता की मौत पर दुख का इजहार स्वाभाविक है। अवामी लीग विरोधी और उससे जुड़ी भारत विरोधी भावनाएं भी आम हैं। सो, हिंसक भीड़ सड़कों पर खुले आम निकल आई, तो मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बेबस और मूक दर्शक बनी हुई है। आलोचक यूनुस पर कट्टरपंथियों के प्रति नरम रुख अपनाने का आरोप लगा रहे है। अवामी लीग का मानना है कि यूनुस उन्हें बढ़ावा दे रहे हैं।
भीड़ ने अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया। एक दीपचंद्र दास नामक शख्स को सरेआम पीट-पीटकर मार डाला गया। भारतीय प्रतिष्ठानों और राजनयिक मिशनों पर भी हमले हुए। खास बात यह है कि मीडिया को भी नहीं बख्शा गया। द डेली स्टार और प्रोथोम आलो अखबार, जो नोबेल पुरस्कार विजेता युनूस के करीबी माने जाते हैं, उन्हें भी निशाना बनाया गया। यूनुस के प्रेस सलाहकार शफीकुल आलम ने मीडिया को सुरक्षा देने में सरकार की नाकामी के लिए माफी मांगी है। उन्होंने कहा, ‘‘काश! मैं जमीन खोदकर शर्म से खुद को उसमें दफन कर पाता।’’
भारत में हिंदू, ईसाई, बौद्घ अल्पसंख्यकों पर हमले में आलोना के स्वर तीखे हुए तो केंद्र सरकार ने बांग्लादेश से आपत्ति दर्ज की और ऐसे हमले फौरन रोकने को कहा। हालांकि बांग्लादेश सरकार ने कहा कि यह "मीडिया का अतिरेक है और घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है।" उधर, ढाका के पुलिस प्रमुख ने कहा है कि हमारी जानकारी के मुताबिक, हादी के दो हमलावर कुछ स्थानीय लोगों की मदद से सीमा पार भारत के पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय में चले गए हैं और वहां सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) या पुलिस की हिरासत में हैं। लेकिन भारत की ओर से इसका खंडन किया गया और बीएसएफ के प्रवक्ता ने कहा कि सीमा पार से कोई इस तरफ नहीं आया है। ये सारे घटनाक्रम तनाव बढ़ने का ही इशारा कर रहे हैं, जो दोनों पड़ाेसी देशों के लिए शुभ नहीं कहे जा सकते।
ऐसे हालात से कई चिंताजनक सवाल उठ रहे हैं। मसलन, इस सब का अंतिम मकसद क्या है और कौन अवामी लीग विरोधी और भारत विरोधी भावनाओं को भड़का रहा है? क्या ये तत्व चुनावी प्रक्रिया के ही खिलाफ हैं और फरवरी में होने वाले चुनावों को पटरी से उतारना चाहते हैं? हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं। चिंता बढ़ती जा रही है कि क्या इस्लामी कट्टरपंथी सत्ता हथियाने की कोशिश कर रहे हैं और क्या वे उसमें कामयाब होंगे? 1971 में पाकिस्तान से आजादी के बाद से बांग्लादेश बहुत ज्यादा बंटा हुआ है। मौजूदा हिंसा ने एक बार फिर देश की गहरी दरारों को उजागर कर दिया है, जो पहले ही पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से सियासी उथल-पुथल से जूझ रहा है।

बांग्लादेश में छात्र नेता हादी की मौत की खबर के बाद भीड़ ने अखबार का दफ्तर फूंका
इस बीच, बीएनपी प्रमुख खालिदा जिया के बेटे तथा पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान 17 साल बाद ब्रिटेन से लौट आए हैं। वे वहां अवामी लीग की सरकार बनने के बाद ही कथित सियासी उत्पीड़न के डर से ब्रिटेन चले गए थे। अब संभावना जताई जा रही है कि बीएनपी के चुनाव जीतने पर अगले प्रधानमंत्री वे ही होंगे। उनकी मां बुजर्ग भी हो चली हैं और उनकी सेहत भी दुरुस्त नहीं बताई जाती है। रहमान की वापसी पर उनके स्वागत में विशाल रैली से भी शायद यही संकेत देने की कोशिश की गई है।
बीएनपी के अलावा, चुनावों में आंदोलनकारी छात्रों की नेशनल सिटिजन पार्टी भी अहम किरदार है। लेकिन उसके सबसे लोकप्रिय नेता हादी की हत्या और दूसरे नेताओं पर हमले से कमजोर दिखने लगी है। अवामी लीग को शायद चुनावों से दूर रखा जाए या धुर विरोधी माहौल में उसके देश में बाकी बचे नेता-कार्यकर्ता शायद ही बाहर निकलने की हिम्मत जुटा पाएं। हालांकि भारत के विदेश विभाग के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा है कि उम्मीद यही है कि चुनाव निष्पक्ष कराए जाएंगे और किसी को हिस्सा लेने से नहीं रोका जाएगा। जाहिर है, उनका इशारा अवामी लीग को चुनाव से दूर न रखने को लेकर है। लेकिन बांग्लादेश में कट्टरपंथी तत्व जिस तरह हावी होते जा रहे हैं और अवामी लीग तथा भारत के खिलाफ भावनाएं लगातार भड़काएं जा रहे हैं, उससे नहीं लगता कि चुनाव समावेशी हो पाएंगे।
वैसे, छात्रों और नौजवानों की नेशनल सिटिजन पार्टी अच्छी संख्या में सीटें लाने में कामयाब हो जाती है तो शायद कट्टरपंथी तत्वों पर कुछ लगाम लगे। यूनुस सरकार और मौजूदा सरकारी अमला तो उनके आगे लाचार लग रहा है। आशंका तो यह भी है कि मौजूदा दौर लंबा खिंचता है तो कहीं चुनाव ही न हो पाएं। ऐसे में उसकी अस्थिरता का दौर भी लंबा चल सकता है।
यही भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है। बांग्लादेश की अस्थिरता से वहां कट्टरपंथी तत्वों का दबदबा खतरनाक ढंग से बढ़ता जा सकता है, और उसकी सीमाएं भारत के संवेदनशील पूर्वोत्तर राज्यों से सटी हुई हैं। 2009 में सत्ता संभालने के बाद शेख हसीना ने शुरू में ही यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा) के उग्रवादियों को भारत को सौंप दिया था। उन्होंने बांग्लादेश में पनाहगाह बनाए पूर्वोत्तर के विभिन्न राज्यों के उग्रवादी और अलगाववादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई भी की। नई दिल्ली पूर्वोत्तर के बागियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए शेख हसीना की आभारी रही है।
अब डर यह है कि इन तत्वों को फिर बांग्लादेश में शरण लेने की इजाजत मिल जाएगी। हसीना के सत्ता में आने के बाद से पूर्वोत्तर में शांति थी। लेकिन अब ऐसा नहीं रह सकता है। यही नहीं, आशंका यह भी है कि बांग्लादेश में पाकिस्ता की जासूसी एजेंसी आइएसआइ को भी शायद भारत के बागी गुटों को बढ़ावा देने के लिए खुली छूट मिल जाए।

छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी, जिनकी हत्या हो गई
हादी को 12 दिसंबर को सिर में गोली मारी गई थी। 18 दिसंबर को उनकी मौत हो गई। हमले का आरोप और शक अवामी लीग के कार्यकर्ताओं और भारत पर था। ऐसी अफवाहें थीं कि साजिश रचने वाले सीमा पार कर भारत चले गए हैं, जिससे गुस्सा और बढ़ गया। अधिकारियों ने फैसल करीम मसूद पर गोली चलाने का आरोप लगाया और आलमगीर शेख को उसका कथित साथी बताया। दोनों पर अवामी लीग के कार्यकर्ता होने का शक है।
बांग्लादेश भारत के पूर्वोत्तर की परेशानी से अच्छी तरह वाकिफ है। यही वजह है कि आंदोलनकारी छात्रों की नेशनल सिटिजन पार्टी के नेता हसनात अब्दुल्ला ने भारत को चेतावनी दी, “अगर बांग्लादेश अस्थिर होता है, तो विरोध की आग सीमाओं के पार फैल जाएगी। आप उन्हें पनाह दे रहे हैं, जो हमें अस्थिर कर रहे हैं इसलिए हम भी सात बहनों के अलगाववादियों को शरण देंगे।” भारत विकास के लिए पड़ोस में स्थिरता चाहता है और बांग्लादेश में अस्थिरता और अराजकता नई दिल्ली के हितों के लिए अच्छा नहीं होगी।
बांग्लादेश में पूर्व भारतीय उच्चायुक्त पिनाक रंजन चक्रवर्ती कहते हैं, “इतना तो तय है कि दोनों देशों के बीच माल-आसबाब की आवाजाही मुश्किल होने से आर्थिक व्यवस्था पर असर पड़ेगा। पाकिस्तान भी अराजकता का फायदा उठाने की कोशिश करेगा और अपने एजेंटों से सीमा पार नकली भारतीय करेंसी भिजवाएगा। हमें अपनी सीमा सुरक्षा कड़ी करनी होगी और आतंकवादियों की घुसपैठ से बचना होगा। चीन भी बांग्लादेश में प्रोजेक्ट हथियाने की कोशिश कर सकता है।”
इन्हीं वजहों से वहां के घटनाक्रमों पर नजर रहेगी और देखना होगा कि स्थितियां क्या शक्ल लेती हैं। भारत के व्यापारिक हित भी जुड़े हैं। कांग्रेस समेत विपक्षी पार्टियों का तो यह भी आरोप है कि अदाणी की बिजली परियोजना के मद्देनजर ही केंद्र सरकार बांग्लादेश को कड़ा संदेश देने से बच रही है। उधर, पश्चिम बंगाल के चुनावों के मद्देनजर बंगाल और दिल्ली में भाजपा और उससे जुड़े संगठन बड़े विरोध मार्च निकाल रहे हैं। जो भी हो, पड़ाेस में अस्थिरता अच्छा संकेत नहीं।