यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ संघर्ष कर रहे गुटों के बीच आंतरिक मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। हूती-विरोधी ताकतों का नेतृत्व करने वाली राष्ट्रपति नेतृत्व परिषद ने एक बड़ा कदम उठाते हुए अलगाववादी आंदोलन से जुड़े एक वरिष्ठ नेता को परिषद से निष्कासित कर दिया है। परिषद ने उस नेता पर देशद्रोह जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।
हूती विरोधी गुटों के नियंत्रण वाली ‘सबा’ समाचार एजेंसी द्वारा जारी आधिकारिक बयान में कहा गया कि यह फैसला राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा के हित में लिया गया है। बयान के अनुसार, निष्कासित नेता ने परिषद के निर्णयों की अवहेलना की और ऐसे कदम उठाए, जिन्हें देश की संप्रभुता और स्थिरता के लिए खतरा माना गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह घटनाक्रम सऊदी अरब समर्थित बलों और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) समर्थित सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (एसटीसी) के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाता है। एसटीसी दक्षिण यमन के अलगाव की मांग करता रहा है और हूती विरोधी गठबंधन का हिस्सा होते हुए भी उसके रुख को लेकर लंबे समय से मतभेद बने हुए हैं।
इस बीच, सऊदी अरब ने बुधवार को कहा कि एसटीसी के प्रमुख नेता ऐदारौस अल-जुबैदी के सऊदी अरब आने की उम्मीद थी, लेकिन वह निर्धारित विमान में सवार नहीं हुए। सऊदी अधिकारियों का आरोप है कि इसके बजाय अल-जुबैदी ने हथियार और सशस्त्र लड़ाकों को इकट्ठा किया और वहां से फरार हो गए। इस बयान ने यमन संकट में नई अटकलों और आशंकाओं को जन्म दे दिया है।
हालांकि, सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल ने राष्ट्रपति नेतृत्व परिषद के इस फैसले या सऊदी अरब के आरोपों पर अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। एसटीसी की चुप्पी से क्षेत्रीय राजनीति में अनिश्चितता और बढ़ गई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हूती विद्रोहियों के खिलाफ बने गठबंधन में इस तरह की अंदरूनी खींचतान संघर्ष को और जटिल बना सकती है। यमन पहले ही वर्षों से गृहयुद्ध, मानवीय संकट और विदेशी हस्तक्षेप से जूझ रहा है। ऐसे में हूती-विरोधी गुटों के बीच बढ़ता अविश्वास शांति प्रयासों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
यह घटनाक्रम साफ संकेत देता है कि यमन संकट अब केवल हूती विद्रोह तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सत्ता, क्षेत्रीय प्रभाव और अलगाववादी मांगों की लड़ाई ने हालात को और अधिक पेचीदा बना दिया है।