गटर में जीवन: देश के स्वच्छता सेनानी से एक मुलाकात
‘द हिन्दू’ में छपे लेख ‘देथस इन द ड्रेंस’ के अनुसार सीवेज की सफाई करने वाले मजदूरों में हर साल करीब 22,327 (महिला व पुरुष) की मौत होती है। देश में रोज दो से तीन मजदूर की मौत मेनहोल की सफाई के दौरान होती है। हाल ही में सोमवार को मध्य प्रदेश के देवास जिले में हुई एक दर्दनाक घटना ने सबका ध्यान खींचा है। जिला मुख्यालय से करीब 60 किलोमीटर दूर पिपलरावा थाना इलाके के गांव बरदु में सेप्टिक टैंक की सफाई करने के लिए घुसे चार सफाईकर्मियों की मौत हो गई। वहीं पिछले दिनों देश की राजधानी दिल्ली के घिटोरनी इलाके में भी सेप्टिक टैंक की सफाई करने उतरे चार सफाईकर्मियों की मौत हो गई थी।
हालांकि इस तरह सेप्टिक टैंक और सीवर में होने वाली ये मौतें कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी ऐसी घटनाएं होती रही हैं। माना जाता है कि सीवर में जीवन गुजार देने वाले सफाई कर्मचारियों की तरफ समाज और सरकार की बेरुखी की वजह से ऐसी घटनाएं अक्सर घटित होती है।
दिन के आठ घंटे सीवर में गुजारने वाले छोटे की मुस्कुराहट देखकर ऐसा बिल्कुल अनुभव नहीं होता कि वे इस काम को जानलेवा मानते होंगे। दरअसल, राजधानी दिल्ली के कमल सिनेमा के पास सफाई करने के लिए सीवर पर उतरे छोटे कहते हैं कि यह उनकी आजीविका का साधन है। वे 12 सालों से इस तरह सफाई का काम कर रहे हैं। राजस्थान के बैरवा जाति से आने वाले छोटे बताते हैं कि उनके पिता जीवन-यापन के लिए राजस्थान से दिल्ली में आकर बस गए। वे राजमिस्त्री का काम करते थे। अब छोटे दिल्ली के दक्षिणपुरी में रहते हैं।
लोग जिस जगह से नाक सिकोड़कर भाग जाते हैं वहां यह 'छोटे' नगें पांव, घुटने भर दल-दल और बजबजाती नालियों पर फावड़ा चलाकर सारी गंदगी बाहर निकाल देता है।
सुरक्षा और हकीकत
नियम के मुताबिक सीवेज की सफाई करते समय कर्मचारी के पास सूट, मास्क और गैस सिलेंडर होना चाहिए। इनका विशेष सूट होता है जो गंदे पानी से कर्मचारियों की सुरक्षा करता है। लेकिन वास्तविकता इसके उलट है।
सीवर में उतरते वक्त सुरक्षा अपनाने के सवाल पर छोटे का कहना है, “हमें दस्ताने और जूते दिए जाते हैं, लेकिन उसे पहनकर सीवर में उतरना और भी मुश्किल का काम है। इन सबके अंदर पानी भर जाते हैं जिससे काम करने में और असुविधा होती है। इसलिए मैं ऐसे ही सीवर के भीतर उतर जाता हूं।”
स्वास्थ्य और शराब
शहर भर की सारी गंदगी और बीमारी जिस नाले से होकर गुरती है वहां यूं ही नहीं उतरा जा सकता। छोटे बताते हैं, बगैर शराब पिए सीवर में उतरना नामुमकिन है।
“सीवर में बिना सुरक्षा उपाय के उतरने से बीमारियां भी हो सकती है?” इस सवाल पर छोटे आत्मविश्वास से लबरेज होकर बताता है कि वह 4-5 महीनों में डॉक्टर से इंजेक्शन लगवाता है। जिससे उस पर इन बीमारियों का असर नहीं होता।
आठ घंटे का काम, साढ़े चार सौ दिहाड़ी
छोटे रोज आठ घंटे तक काम करता है। इस काम के लिए ठेकेदार उसे साढ़े चार सौ रूपये दिहाड़ी देता है। छोटे का कहना है कि उसे रोज काम मिल जाता है। वह कम से कम आठ घंटे सीवर, नालियों की सफाई करते हुए बिताता है।
मशीन से नहीं हो सकती सफाई
सीवर को साफ करने के लिए खड़ी बड़ी-बड़ी मशीनें ठीक तरह सफाई नहीं कर पाती। यह बात सुनकर भले ही हैरानी हो रही हो लेकिन छोटे का कहना है कई जगह मशीनों की वजह से ज्यादा तोड़-फोड़ करनी पड़ती है। वैसे ही जहां मशीनों का पहुंचना संभव नहीं होता वहां उन्हें खुद उतरकर हाथों से सफाई करनी पड़ती है।
“घिटोरनी की घटना जानता हूं”
दो सप्ताह पहले दक्षिण दिल्ली के घिटोरनी इलाके में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान दम घुटने से 4 सफाई कर्मचारियों की मौत हो गई थी। इस घटना के बारे में जिक्र करने पर छोटे कहता है, “मैं घिटोरनी वाली घटना जानता हूं।” यह बोलकर छोटे फिर अपने काम पर जुट जाता है। काफी देर तक सीवर से बाहर रहने की वजह से उसके शरीर पर सने गाद, मिट्टी, किचड़ थोड़े सूख से गए थे। अब वह फिर सीवर की भीतर सफाई के लिए उतर गया है। वह फावड़े और अपनी हाथों की मदद से अंदर जमी गंदगी को बाहर निकालने में तल्लीनता से लगा हुआ है।