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साहित्य की सियासत ने शिवानी को मान्यता नहीं दी: नासिरा शर्मा

हिंदी की वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया ने कहा है कि यशस्वी लेखिका शिवानी ने अपनी कृतियों से असंख्य पाठक...
साहित्य की सियासत ने शिवानी को मान्यता नहीं दी: नासिरा शर्मा

हिंदी की वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया ने कहा है कि यशस्वी लेखिका शिवानी ने अपनी कृतियों से असंख्य पाठक बनाये जबकि आज साहित्य में इतने फेस्टिवल होने के बाद भी पाठक के लाले पड़े हुए है।

श्रीमती कालिया ने 10 फरवरी को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में शिवानी जन्मशती समारोह की अध्यक्षता करते हुए कहा कि शिवानी की रचनाओं के छपने से धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान के पाठकों की संख्या बढ़ जाती थी।धर्मवीर भारती और मनोहर श्याम जोशी जब अपनी पत्रिका की प्रसार संख्या को कम होते देखते तो वे शिवानी का उपन्यास छाप देते थे फिर उनकी पत्रिकाओं की प्रसार संख्या बढ़ जाती है।

 

मेरे घर में धर्मयुग में शिवानी का साहित्य पहले पढ़ने के लिए लड़ाई होती थी। सच पूछा जाए तो वह स्त्री लेखन की "मां" थी।

समारोह में नासिरा शर्मा, शिवानी की पुत्री और अंग्रेजी की प्रसिद्ध लेखिका इरा पांडे, दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी की प्रोफेसर डॉ सुधा सिंह और सुदीप्ति ने भी शिवानी के बारे में विस्तार से अपने विचार व्यक्त किये। समारोह का उद्घाटन इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के निदेशक केंद्र के.एन. श्रीवास्तव ने किया।

समारोह में पहले सविता देवी की शिष्या मीनाक्षी प्रसाद का गायन हुआ और उसके बाद संगोष्ठी की शुरुआत हुई। श्रीमती मीनाक्षी प्रसाद ने अपने गायन से श्रोताओं का दिल जीत लिया। कार्यक्रम के दूसरे चरण में नासिरा शर्मा ने उद्घाटन वक्तव्य दिया और अपने संस्मरण सुनाए।

उन्होंने बताया कि किस तरह जब वे नई लेखिका थीं तो उन्होंने शिवानी का आकाशवाणी के लिए इंटरव्यू लिया था। उस इंटरव्यू को स्त्री दर्पण ने भी अपने पेज पर लगाया है।

उन्होंने इलाहाबाद में अपने छात्र दिनों का जिक्र करते हुए बताया कि वह बचपन से शिवानी की रचनाओं से जानती थी। उनकी पुत्री मृणाल पांडे इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में एमए में पढ़ाती थी और मैं बीए में पढ़ती थी।उन्होंने शिवानी के रति विलाप जैसी यादगार रचनाओं का भी जिक्र और उनके उपन्यास और कहानियों के पात्र उनके भीतर घर कर गये थे।

उन्होंने कहा कि साहित्य की सियासत ने शिवानी को जगह नहीं दी और सियासत आज भी है पर पाठकों के दिल में वे आज भी बसती हैं। उन्होंने उनकी रति विलाप जैसी किताब का जिक्र करते कहा कि उसे पढ़कर वे बहुत प्रभावित हुई थी।


प्रोफेसर सुधा सिंह ने शिवानी के साहित्य की चर्चा करते हुए कहा कि शिवानी से तो वे मिली नहीं लेकिन उन्होंने उस शांतिनिकेतन में पढ़ाया जहां शिवानी कभी पढ़ती थी। इस नाते वे शिवानी के उन रास्तों और ठिकानों तथा आश्रमों से बखूबी परिचित थीं जहां शिवानी ने शांतिनिकेतन में अपने दिन गुजारे। उन्होंने कहा कि शिवानी को लोकप्रिय लेखिका कहकर खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि तुलसी, प्रेमचन्द आदि भी अपने समय के लोकप्रिय लेखक थे। लोकप्रिय और श्रेष्ठता में एक सम्बंध भी है।

शिवानी ने महत्वपूर्ण साहित्य रचा और वे महत्वपूर्ण लेखिका थीं। रामविलास शर्मा और नामवर सिंह जैसे आलोचकों ने कभी पितृसत्त्ता को समझा ही नहीं और उन लोगों ने भी मर्दवादी दृष्टि से साहित्य को देखा इसलिए उनका किसी ने मूल्यांकन नहीं किया। उनके उपन्यासों, कहानियों की सुंदर महिला पात्रों का जिक्र सबने किया लेकिन उनके साहित्य में इस तरह बात नहीं की जा सकती।

श्रीमती इरा पांडेय ने अपनी मां को शिद्दत से याद करते हुए कहा कि हमलोग उन्हें ' दिद्दु ' कहकर पुकारते थे।उन्होंने अपनी माँ के कई रोचक किससे भी सुनाए।और बताया कि कितनी भाषाएं वे जानती थीं। उनके हंसोड़ और क्रोधी स्वभाव के साथ सबके प्रति दया और करुणा के भाव का भी जिक्र किया। वे अंततः एक माँ थीं। उन्होंने समाज की उन स्त्रियों की कथा लिखी जो समाज की मुख्यधारा से बहिष्कृत थीं। वे पता नहीं कैसे अपने पात्र खोज लेती थीं, गढ़ लेती थीं।उस ज़माने में पहाड़ी इलाके से शान्तिनिकेतन जाना आसान काम नहीं था पर क्योंकि उस समय कहीं जाने के लिए ट्रेन-बस की सुविधा नहीं थी।

सुदीप्ति ने संगोष्ठी का सुंदर संचालन किया और विस्तार से उनके पात्रों का जिक्र किया। समारोह में स्त्री लेखा के नए अंक का लोकार्पण भी हुआ और पारुल बंसल के नए कविता संग्रह का भी विमोचन हुआ। मंच का संचालन बारी-बारी से सुधा तिवारी और अनुराधा ओस ने किया और सोमा बनर्जी ने मीनाक्षी प्रसाद का स्वागत किया और परिचय दिया।

समारोह में मृदुला गर्ग, नीता गुप्ता, कल्पना मनोरमा, नलिनी कमलिनी, रवींद्र मिश्र, मंजरी चतुर्वेदी, मनोज मोहन, सुरेश नौटियाल, वीरेन नंदा, मेधा समेत अनेक लोग मौजूद थे।

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