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पुराना घर और पुरानी बस्ती

वरिष्ठ कथाकार ‘दूसरा कदम’, ‘उनका जीवन’, ‘कछुए की तरह’, ‘एकत्र’ और ‘भूलने का रास्ता’ जैसे कथा-संग्रहों को मिलाकर अब तक नौ कहानी संग्रह प्रकाशित। मध्यप्रदेश विद्युत मंडल से सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन तथा ‘पहल’ पत्रिका के संपादन में सहयोग।
पुराना घर और पुरानी बस्ती

उनकी आंखें खुशी से फैलती रहती थीं इन दिनों। क्योंकि अब तक सब कुछ हो चुका था। जो बाकी था, वह सैमसंग का लेटेस्ट एंड्रायड फोन जो अभी छत्तीस हजार में उन्होंने खरीदा था के आने से पूरा हो गया था। और कुछ न हो तो व्हाट्सअप पर व्यस्त रहना आसान हो गया था। पिछले पंद्रह वर्षों में अब, जो चीजें उनकी हसरतों में या अपूर्ण इच्छाओं में रहती थीं, उन्हें गिरफ्त में लिया जा सकता था और वह ले भी रहे थे। जो जी तोड़ प्रयासों के बाद भी नहीं हो पाता था पहले, अब आसानी से हो रहा था। तब भी थोड़े पैसे बच ही जाते थे, हालांकि अब जरूरत नहीं थी।

उनके इस तरह खुले हाथ को देखकर कुछ पुराने पर कमतर दोस्त चौंक उठते थे। वह दिखाते नहीं थे पर यह देख कर खुश हो जाया करते थे। सोचते इन अनुभूतियों के लिए कितने लंबे समय तक जिंदगी में तरसना पड़ा। कोई हिसाब नहीं है। वहां तक अपनी सोच पर कोई रंज उनके दिल में नहीं आता था। उस तरह फर्क करना भी हो सकता है, वह जानते ही नहीं थे।

पुराने समय और उस समय के अभावों का दुख अब घेरता भी नहीं था। जब वह बेरोजगार थे तब उनके बारोजगार मित्र शराब वगैरह समय-समय पर पी लेते थे और उनसे भी आग्रह करते थे पर उनके अंदर जिद थी कि जब तक कमाएंगे नहीं, पिएंगे नहीं। लेकिन यह जिद दुखी भी तो कर ही देती थी। उन दिनों दुखी हो जाने के अनेकानेक कारण रोज इस तरह सामने आते रहते थे।  पर अब उस तरह का कोई दुख नहीं था, जब मर्जी में आए पी लेते हैं और दूसरों को पिला भी देते हैं। हालांकि कुछ चीजें अच्छी नहीं हैं, जैसे तीन-चार साल पहले से उच्च रक्तचाप तंग करने लगा है और अभी कुछ दिनों पहले रक्त परीक्षण के बाद डाक्टर ने कहा था, ‘सावधान गौतम जी, आप नहीं बदले तो डायबेटिक हो जाएंगे।’

जब कभी इन तकलीफों का जिक्र वह अपने रिश्तेदारों, दोस्तों आदि से करते तो वह लोग एक ही बात कहते कि ‘गौतम जी आपने जीवन में इतना संघर्ष किया है कि यह सब आपके साथ होना स्वाभाविक है।’ उन लोगों की यह बातें उनके लिए सांत्वना का काम भले ही न करती हों पर यह बात कि उन्होंने बहुत संघर्ष किया उनकी बड़ी सांत्वना बन जाती है।’ खुशनसीबी देखिए कि इतनी कम उम्र में वह बाल बच्चों को ठिकाने लगा चुके थे, पत्नी बेहद अच्छी हमसफर थी ही इसलिए अपने जीवन को लेकर कहना चाहिए, वह अब इतने फिक्रमंद नहीं रह गए थे और सोचते थे कि मेडिकल साइंस ने इतनी तरक्की की है कि दवाइयों से जीवन इस तरह ही चलता रहेगा। दवाइयां खरीदने की उनकी आर्थिक क्षमता भरपूर हो ही गई थी।

कभी-कभी क्या अक्सर ही वह दवाइयां खरीदते हुए अपने देश की अर्थव्यवस्था को चुपचाप धन्यवाद करते कि उसी ने तो उन्हें इतना सक्षम बना दिया था। पहले तो नहीं, पर अभी पिछले दस वर्षों में नौकरी में उन्होंने अपने वेतन से दोगना-तिगुना कमाया था। अब नौकरी के तीन ही वर्ष तो बचे थे तो उन्होंने अपनी रफ्तार धीमी नहीं की थी। इसके लिए सब तरफ से प्रोत्साहन ही प्रोत्साहन था। कभी कोई पश्चाताप सेंध मारते दिखता तो वह उसे निमर्मता से कुचल देते फिर खुश हो जाते।

उन्हें शायद यह मालूम नहीं था कि जब चिंताएं और दायित्व समाप्त हो जाएं तो एक शून्य घर बनाने लगता है। और यह बहुत दिनों तक बना रहे तो बहुत सारे तनाव पैदा होने लगते हैं और कोई भी निरर्थक आध्यात्मिकता की ओर भटक सकता है। गनीमत है कि गौतम जी के साथ ऐसा नहीं हुआ। पर न जाने क्यों अब वह कभी-कभी विमूढ़ होकर अक्सर एक प्रश्न से घिरा स्वयं को पाते हैं, ‘अब क्या?’

एक बार वह इससे ऐसे घिरे कि याद करने लगे कि क्या पहले ऐसा कभी हुआ था? पर इसी वजह से वह स्मृतियों में भी गोता लगाने लगे। अचानक उन्हें लगा कि इस गोते ने तो उन्हें बड़ी राहत पहुंचाई। अपनी इस बीमारी के लिए उन्हें जैसे मुफीद औषधि मुफ्त में मिल गई।

अब जब-जब वह इस तरह घिरते तब-तब स्मृतियों में चले जाते। वहां एक सम्मोहन और आनंद दोनों उन्हें मिलने लगे। दरअसल अभी वह जहां रहते हैं वह एक नई और पॉश लोकेलिटी है। लगभग चौदह पंद्रह साल पहले उन्होंने अपना घर वहां बनाया था अन्यथा तो वहां से पंद्रह बीस किलोमीटर दूर शहर की एक पुरानी बस्ती में वह अपने बचपन से एक किराए के घर में रहे आए थे।

अब वह अपनी स्मृतियों के सहारे वहां बार-बार लौट रहे थे पर इतने वर्षों में एकाध-दो बार ही उस ओर जाना हुआ था। उस ओर बचपन के और बेहद घनिष्ठ मित्र भी रहते थे पर उनसे मिलना अन्यत्र नियमित होता रहता था। इसलिए उनके घर जाने की जरूरत नहीं रहती थी।

पर एक दिन अचानक न जाने कैसे उन्हें लगा कि उस पुरानी बस्ती में सशरीर जाकर देखा जाए। उन्होंने वक्त नहीं लिया और इसका निर्णय ले लिया। फिर उस ओर रहने वाले अपने एक पुराने मित्र अभय पटेल को तुरंत फोन लगाया और कहा, ‘यार आज शाम मैं चाहता हूं कि तुम्हारी तरफ आऊं।’

‘स्वागत है, पर कोई खास बात?’ अभय पटेल की आवाज थी। ‘नहीं कोई खास बात नहीं, यूं ही तुम सबकी याद आ रही थी।’ उन्होंने जवाब दिया। ‘बहुत अच्छा, आ जाओ।’ अमर पटेल ने कहा।’

गर्मी के दिन थे और सूर्यास्त देर से होता था। अभय पटेल के घर जब वह शाम को पहुंचे तो साढ़े छः बज रहे थे पर बहुत उजाला था।

अभय पटेल के ड्राइंग रूम में जब वह बैठे तो उसने पत्नी को चाय बनाने के लिए आवाज दी। ‘नहीं-नहीं, चाय वाय की बिल्कुल जरूरत नहीं है। मैं चाहता हूं कि हम-तुम इस इलाके में कुछ समय के लिए पैदल घूमें। पता नहीं क्यों मेरी बहुत इच्छा हो रही है, ऐसा करने की।’ कहते हुए वह खड़े हो गए।

‘अगर ऐसा है तो चलो, चलते हैं।’ अभय पटेल भी यह कहते हुए चलने के लिए खड़े हो गए। दोनों जब बाहर निकले तो उजाला कम हो चला था फिर भी इतनी रोशनी थी कि सब कुछ स्पष्ट दिख रहा था। अभय पटेल की गली से निकलकर जब दोनों मुख्य सड़क पर पहुंचे तो गौतम जी ने एक पल रूककर चारों ओर देखा। एक ठंडी आह सी उनके भीतर से निकली, फिर उनकी ओर विस्मय से देख रहे अभय पटेल से उन्होंने कहा, ‘इस ओर तरक्की बिल्कुल नहीं हुई, कुछ बदला हुआ नहीं दिखता। वही मैली-कुचैली दुकानें, मैले-कुचैले कपड़े पहने, सुस्ती से चलते लोग। सड़कों पर चारों ओर पसरा अतिक्रमण, चारों ओर गंदगी ही गंदगी।’

‘जब तुम्हें देखकर यह लग रहा है तो यहां घूमने की इच्छा क्यों पैदा हुई? तुम्हारे भीतर।’ यह कोई हिकारत है या कुछ और है मैं समझ नहीं पा रहा हूं।’ अभय पटेल ने बीच में टोकते हुए पूछा।

ऐसे किसी प्रश्न की उम्मीद गौतम जी अभय पटेल से नहीं करते थे। उन्होंने किंचित आश्चर्य से उसे देखा फिर कहा, ‘नहीं मेरे अंदर हिकारत बिल्कुल नहीं है, दुख जरूर है कि यहां कुछ बदला नहीं। न जाने बचपन की कितनी स्मृतियां यहां से जुड़ी हैं और यहीं रहते हुए देखे गए सपने भी याद आते हैं।’

‘तुम्हारे पुराने घर की ओर चलें?’ अचानक अभय पटेल ने कहा। वे लोग बातचीत करते हुए काफी आगे निकल आए थे और पास से सड़क उस ओर भी मुड़ रही थी जहां चार-पांच मकान छोड़कर गौतम जी का वह घर था जहां वह लगभग पैंतीस-चालीस वर्ष रहे थे।

सुनकर एक क्षण गौतम जी ठिठके फिर असमंजस भरे लहजे में कहा, ‘नहीं थोड़ा अभी आगे का चक्कर लगा लें, फिर उधर से आगे की गली से मुड़कर आखिर में वहां पहुंचेंगे तो ठीक रहेगा।’

‘ठीक है जैसो तुम चाहो।’ अभय पटेल ने निर्विकार ढंग से कहा।

वे लोग धीरे-धीरे आगे बढ़ते रहे। गौतम जी बड़े गौर से सड़क की दोनों ओर देख रहे थे। पुरानी छोटी-छोटी किराने की दुकानें वैसी की वैसी ही थीं जहां से बचपन में माता-पिता के कहने पर दौड़ लगा-लगाकर वह किराना सामग्री लाया करते थे। कभी-कभार सुबह-सुबह नाश्ते के लिए आलूबंडा, समोसा वह जहां से लाते थे उन सारी-की-सारी गुमटियों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था। सिर्फ कुछ जगहों, दुकान-होटल या गुमटियों में सामग्री बेचते चेहरे जरूर बदल गए थे। शायद पुराने मालिकों की नई पीढ़ी अपना दायित्व लेकर वहां आ खड़ी हुई थी।

अभय पटेल ने तभी देखा कि जिस तरह से ‘नहीं-नहीं’ के लिए सिर हिलाया जाता है, गौतम जी का सिर ठीक उसी तरह से हिल रहा है। वह खुद को रोक नहीं सका और अचानक पूछा, ‘क्या हुआ, तुम इस तरह सिर क्यों हिला रहे हो?’

गौतम जी चौंके और कहा, ‘कुछ भी तो यहां नहीं हुआ, इसलिए सिर हिला रहा हूं भाई। ये कैसी बस्ती है कि जहां तरक्की के लिए कोई संघर्ष नहीं हुआ, कोई बदलाव नहीं।’

शायद इस जवाब को सुनकर अभय पटेल किंचित तैश में आ गया। वह उसी बस्ती का नागरिक था इसलिए स्वाभाविक था। उसने गंभीरता से कहा, ‘चलो भाई खतम करो, यही क्या कम है कि तुम इस बस्ती के नागरिक थे और तुमने तरक्की कर ली, तुम बदल गए।’

सुनकर गौतम जी ने अभय पटेल की ओर हैरत से देखा। वह उसकी बात में छिपी व्यंजना को समझने की कोशिश करते रहे। एक घड़ी के लिए उन्होंने सोचा कि कुछ कहें पर शांत रहे। उन्हें अजीब सी आशंका ने घेर लिया कि अभय पटेल अब कुछ भी कहने पर नाराज हो सकता है।

तब तक पूरी तरह अंधेरा हो चुका था और स्ट्रीट लाइटें रोशन हो गई थीं। वह दोनों अब वहां पहुंच गए थे जहां से एक चौड़ी गली सामने थी और जो गौतम जी के पुराने घर की ओर पहुंचाती थी।

तभी अभय पटेल ने रूककर कहा, ‘चलो काफी देर हो गई, अब तुम्हारे पुराने घर की ओर चलते हैं।’

‘ठीक है, चलो उसी ओर चलते हैं अब।’ गौतम जी को बहुत अच्छा लगा कि अभय पटेल असहज नहीं हुआ है। उन्होंने मन-ही-मन निर्णय लिया कि वह अब कोई ऐसी बात नहीं करेंगे जो अभय पटेल को अच्छी न लगे।

जब वे लोग गली में प्रवेश कर गए तो गौतम जी एकदम रोमांचित हो उठे और पुरानी स्मृतियां साफ पानी की तरह मन में छलछलाने लगीं। पहली बार वहां पहुंचने के बाद उन्होंने तीव्र खुशी को महसूस किया। उनकी चाल तेज हो गई। वह अब जल्दी पहुंचना चाहते थे। अभय पटेल भी खुश होकर तेज चलते लगा।

अभी वह दोनों गौतम जी के पुराने घर तक पहुंचने ही वाले थे कि सामने की तरफ से सफेद कपड़े पहना लगभग चालीस वर्षीय एक साइकिल सवार आकर गौतम जी के सामने रूका और साइकिल से उतरकर उसने गौतम जी के पैर छुए और कहा, ‘प्रणाम करता हूं भैया, आज इस तरफ कैसे?’

गौतम जी चौंक कर ठिठक गए और हड़बड़ाते हुए पूछा, ‘अरे-अरे कौन हैं भाई आप?’

एक तो साइकिल सवार, दूसरे गोल्फ कैप जैसी टोपी पहने था, गली में रोशनी कम थी इसलिए गौतम जी अचानक पहचान नहीं पाए। उसने पहचान लिया था इसलिए हंसते हुए कहा, ‘मैं, भैया शिव कुमार, आपका पुराना पड़ोसी।’

‘अरे वाह शिवकुमार तुम अच्छे मिले यार।’ गौतम जी ने उसे पहचानते हुए गले लगा लिया। कुछ क्षणों बाद उससे अलग हुए फिर बहुत गौर से एकटक उसे देखते हुए पूछा, ‘अब कहां रह रहे हो तुम?’

‘वहीं रह रहा हूं भैया, उसी घर में।’ उसने जवाब दिया। पर गौतम जी की नजर उससे नहीं हटी। बहुत देर तक वह उससे कुछ कह न सके सिर्फ याद करते रहे कि इस शिवकुमार की किस तरह छोटी उम्र में उनके सामने ही शादी हो गई थी। वे लोग चार भाई थे और शिवकुमार सबसे बड़ा, सबसे अच्छा सीधा-सादा, पढ़ा-लिखा होनहार खुशदिल आदमी था। लेकिन इसी वजह से वह अपने परिवार से अलग हो गया था और जीविका के लिए घर-घर जाकर ट्यूशन करता था और तभी उसकी पत्नी को एक कपड़े के शोरूम में सौभाग्य से नौकरी मिल गई थी। उन दोनों पति-पत्नी के प्रेम की मिसाल वह जब-तब लोगों को दिया करते थे। उन्हें उम्मीद थी कि शिवकुमार एक-न-एक दिन कुछ बन कर दिखाएगा।

‘क्या सोचने लगे भैया?’ शिवकुमार की आवाज पर वह चौंके। फिर सकुचाते हुए कहा, ‘नहीं कुछ नहीं। और सुनाओ क्या हाल चाल हैं?’

‘सब ठीक है भैया।’ शिवकुमार के इस जवाब को बिना सुने उन्होंने पूछा, ‘तो भाई, आजकल क्या कर रहे हो?’ इस प्रश्न को सुनकर शिवकुमार के चेहरे पर तीव्र मुस्कान उभरी फिर उसने सहजता से कहा, ‘और क्या करना है भैया पहले जैसी ट्यूशन ही करता हूं, अभी वहीं से निपट कर चला आ रहा था कि आप दिख गए।’

पर यह सुनकर गौतम जी को उसकी मुस्कान पर संदेह हुआ और उन्होंने दूसरा प्रश्न किया, ‘और बहू क्या करती है?’

‘वह तो शुरू से उसी शोरूम में है जहां आपके सामने उसकी नौकरी लगी थी।’ पत्नी की पूछ पर उसकी मुस्कान पहले से ज्यादा बढ़ गई थी। उसकी यथावत मुस्कान को गौतम जी न जाने क्यूं बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे। उन्होंने बिना रूके आगे पूछा, ‘और तुम्हारे बाल बच्चे?’

‘भैया इस बाबद कभी सोचा ही नहीं तो कुछ हुआ नहीं।’ उसने पूर्ववत सहजता से जवाब दिया।

इतना सब कुछ सुनकर न जाने कितनी विचित्र-विद्रूप रेखाएं गौतम जी के चेहरे पर उभरीं, जिसे न तो शिवकुमार देख पाया न अभय पटेल। फिर वह अपने आपको रोक न सके और कहा, ‘यार शिवकुमार मुझे बहुत अफसोस है कि तुमने जरा भी संघर्ष नहीं किया, नहीं तो तुम पता नहीं क्या से क्या हो गए होते, तुम सीधे-सादे ही रहे आए।’

यह सुनकर शिवकुमार ने आश्चर्य सहित उन्हें देखा और लगभग ठहाका जैसा लगाते हुए कहा, ‘अब मैं आपको क्या बताऊं भैया कि इसी तरह रहे आने के लिए मैंने कितना संघर्ष किया।’ वह कुछ सोचते हुए एक पल के लिए रूका फिर दोबारा कहा, ‘खैर छोड़िए, वह लंबी कहानी है। फिर कभी। आप सुनाइए कैसे हैं आप?’

पर गौतम जी शिवकुमार के सारे जवाब सुनकर अब इस लायक नहीं रह गए थे कि अपना हाल चाल बता पाते। उन्हें शिवकुमार के जवाबों पर बिल्कुल विश्वास नहीं हो रहा था। उन्हें अपना दिल भारी-भारी सा लग रहा था। उसी स्थिति में वह सोचने लगे कि उन्होंने इस ओर आने का नाहक निर्णय ले लिया था। कुछ देर बाद वह अपने पुराने घर को देखे बिना ही वापस लौट आए।

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