1990 के दशक से लेकर आज के दौर तक आइटम नंबर में कैमरा एंगल और गानों ने स्त्री देह को कलाकार के बजाय वस्तु की तरह पेश किया, जो आज भी चालू
थानेदार (1990) फिल्म का गाना “तम्मा तम्मा लोगे”, 2017 में बद्रीनाथ की दुल्हनिया फिल्म में रीमेक के रूप में फिर सुनाई पड़ा। हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार डांस गीतों में से एक इस गीत की कोरियोग्राफी खास है। ऊपर से लिए गए शॉट, सामने से, पैरों के क्लोज शॉट, जिन्हें आज ‘हुक स्टेप’ कहा जाता है, वह साफ दिखाई देता है। फिर भी इस गाने में नायिका के शरीर के साथ सम्मानजनक दूरी बनाए रखी गई है। कैमरा कहीं भी दखल देने वाला या असहज नहीं लगता। नायक और नायिका के बीच भी पर्याप्त दूरी है। कोरियोग्राफी पुरुष नजरिए को खुश करने के लिए नहीं बनाई गई है। उल्टा, जैसे-जैसे गाना आगे बढ़ता है, माधुरी दीक्षित और संजय दत्त के डांस स्टेप लगभग समान नजर आते हैं।

तमन्ना भाटिया
अब 2024 की फिल्म स्त्री 2 के लोकप्रिय डांस नंबर “आज की रात” पर नजर डालिए, तमन्ना भाटिया पर फिल्माए इस गाने के बोल, उसकी कोरियोग्राफी, कलाकारों के कपड़े, सिनेमैटोग्राफी और कैमरे के एंगल, कुछ मिलाकर सब पुरुष नजरिए को खुश करने के लिए काम करता दिखता है। यह ऐसा गाना है, जो औरतों को वस्तु की तरह दिखाता है और दर्शकों को ललचाने के लिए इस्तेमाल करता दिखता है। पिछले करीब 35 साल में ऐसे गानों की संख्या बढ़ी है, जहां गीत, संगीत, नृत्य और कैमरा सभी मिलकर ऐसा दृश्य अनुभव तैयार करते हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य पितृसत्तात्मक और स्त्री-विरोधी सोच को बढ़ावा देना और पुरुष नजरिए को मजबूत करना होता है।
सबसे पहले शब्दों से शुरू करते हैं, “वक्त बर्बाद न बिन बात की बातों में कीजिए, आज की रात मजा हुस्न का आंखों से लीजिए।” इन पंक्तियों में खुद नायिका जैसे कह रही है कि उसे वस्तु की तरह देखा जाए। ऐसे बोल, जिसमें औरत को वस्तु बनाया जाता है, 90 के दशक से या शायद उससे पहले से देखे जा सकते हैं। सबसे बदनाम गाने “चोली के पीछे क्या है” (खलनायक, 1993) या “सेक्सी, सेक्सी, सेक्सी मुझे लोग बोले” (खुद्दार, 1994) हैं। हम “कोई जाए तो ले आए, मेरी लाख दुआएं पाए” (घातक, 1996), “मैं हूं एक शरारा” (मेरे यार की शादी है, 2002) से लेकर “मैं तो तंदूरी मुर्गी हूं यार, गटका ले सैयां अल्कोहल से” (दबंग 2, 2012) तक पहुंच गए। जो पुरुष ये गीत लिखते हैं, वे स्त्री को वस्तु बना देने की क्रिया से खुद को अलग दिखाने की कोशिश करते हैं। वे इन गीतों को महिलाओं से ही गवाते हैं। इसके उलट, पिछले दो दशकों के कुछ लोकप्रिय डांस गाने, जैसे “कजरारे” (बंटी और बबली, 2005) और “बीड़ी जलाईले” (ओमकारा, 2006) में इच्छा और आकर्षण तो है, लेकिन महिला वस्तु की तरह पेश नहीं होती।

ऐश्वर्या राय
समस्या सिर्फ गीतों के बोल तक सीमित नहीं है। उसका दूसरा बड़ा हिस्सा फिल्मांकन है। फिल्मांकन में भी कई पहलू शामिल होते हैं, कोरियोग्राफी, सिनेमैटोग्राफी, लाइटिंग और कॉस्ट्यूम। इन सभी को समझना जरूरी है, ताकि यह जाना जा सके कि आखिर किस नजरिए को खुश किया जा रहा है। इस बदलाव को साफ तौर पर दो गानों में देखा जा सकता है, “इश्क दी गली विच नो एंट्री” (नो एंट्री, 2005) और “शीला की जवानी” (तीस मार खान, 2010)। पहले गाने की कोरियोग्राफी ऐसे मूवमेंट्स से भरी है, जिसका मकसद बिपाशा बसु के कम कपड़ों में दिखाए गए शरीर को दिखाना है। दूसरा गाने में कैटरीना कैफ और पुरुष डांसरों के बीच की दूरी बहुत कम है; वे लगभग उनके शरीर से सटे हुए नजर आते हैं। गाने के कुछ हिस्सों में कैटरीना घूमते हुए बिस्तर पर दिखाई देती हैं, जहां उनके कपड़े कम हैं और पुरुष डांसर भी उसी बिस्तर पर मौजूद हैं। कोरियोग्राफी में छाती को आगे ले जाने जैसे स्टेप्स शामिल हैं। पूरे गाने में कैमरे का ध्यान खास तौर पर कैटरीना के खुले पेट और शरीर के उस हिस्से पर रखा गया है, जिसे कपड़ों के जरिए जानबूझकर उभारा गया है। हर बार जब “शीला की जवानी” लाइन आती है, तो कैमरा उनके चेहरे से हट जाता है, क्योंकि वे भी अपना चेहरा कैमरे से मोड़ लेती हैं। कपड़ों और कोरियोग्राफी पर साथ में चर्चा करना जरूरी है, क्योंकि आजकल गानों में कपड़ों का इस्तेमाल महिलाओं के शरीर के जरिए दर्शकों को लुभाने के लिए किया जाता है। पूरे गाने में कॉस्ट्यूम बदलना भी मुख्य रूप से पुरुष कल्पनाओं को खुश करने के लिए ही किया गया लगता है।
यही ढांचा दो साल बाद “चिकनी चमेली” (अग्निपथ, 2012) में भी दिखाई देता है। इस गाने में भी ज्यादातर कपड़े ऐसे हैं, जो पेट को खुला रखते हैं, पुरुष डांसर बहुत करीब नजर आते हैं और कोरियोग्राफी इस तरह बनाई गई है कि दर्शकों की नजर सिर्फ कैटरीना कैफ के शरीर पर टिकी रहे। इसके विपरीत, “आ जाने जां” (इंतकाम, 1969) को याद कीजिए। वहां पुरुष एक पिंजरे में बंद है, जबकि हेलेन उसके चारों ओर पूरी आजादी से नृत्य करती हैं। वह अपनी पसंद की दूरी बनाए रखती हैं। “शीला की जवानी” वाला यही पैटर्न 2015 की फिल्म हैप्पी न्यू ईयर में “मैं लवली हो गई यार” गाने में भी नजर आता है, जिसकी शुरुआत ही कमर के क्लोज-अप शॉट्स से होती है।
कई बार गाने के बोल और कोरियोग्राफी का आपस में कोई संबंध नहीं होता, फिर भी कोरियोग्राफी को जानबूझकर आकर्षक और उत्तेजक बनाया जाता है। “चित्तियां कलाइयां” (रॉय, 2015) गाना कलाइयों (हाथों) के बारे में है, लेकिन जैकलीन फर्नांडिस जिस अंदाज में डांस करती नजर आती हैं वह भद्दा है। इसी तरह “तरस नी आया तुझको” (मुंज्या, 2024) दिल टूटने के दर्द पर आधारित गाना है, लेकिन इसे शरवरी पर ‘आइटम’ सॉन्ग की तरह फिल्माया गया है।
90 के दशक में गोविंदा की फिल्में, जैसे राजा बाबू (1994) के गानों में भी कूल्हे मटकाने जैसे स्टेप्स और आपत्तिजनक कोरियोग्राफी देखी जा सकती है। लेकिन कई लोकप्रिय डांस नंबरों, जैसे “हुस्न है सुहाना” (कुली नंबर 1, 1995), “सोना कितना सोना है”, “मैं तुझको भगा लाया हूं” और “यूपी वाला ठुमका” (हीरो नंबर 1, 1997), “अंखियों से गोली मारे” (दूल्हे राजा, 1998) और “मखना” (बड़े मियां छोटे मियां, 1998), कोरियोग्राफी धीरे-धीरे गोविंदा के खास डांस स्टेप्स और हास्य से भरे मूव्स की ओर मुड़ने लगी। इन गानों में उनका अंदाज ज्यादा मस्तीभरा और कॉमिक था। फिर भी, 90 के दशक की कई आपत्तिजनक कोरियोग्राफियों ने पर्दे पर महिला को वस्तु की तरह दिखाने के लिए एक जगह बना दी थी। वही सोच और वही तरीका आज भी अलग-अलग रूपों में जारी है।
सिनेमैटोग्राफी भी कलाकार की स्वतंत्रता हनन में बड़ी भूमिका निभाती है। कैमरा कहां रखा गया है और किस नजरिए से शूट किया गया है, यह तय करता है कि दर्शक किस तरह से उस कलाकार को देखेंगे। 90 के दशक के बाद जिन गानों का जिक्र किया गया है, उनमें कैमरे का इस्तेमाल अक्सर महिला शरीर को और ज्यादा उभारने और उसे सेक्स सिंबल के रूप में दिखाने के लिए किया गया है। जब आगे से गहरे गले वाले कपड़े पहने जाते हैं, तो ऊपर से लिए गए शॉट, या फिर शरीर के अलग-अलग हिस्सों पर बहुत पास और धीरे-धीरे घूमते शॉट ये सब आज के ‘आइटम सॉन्ग’ या डांस नंबर की तय शैली बन चुके है। नोरा फतेही के लगभग हर गाने, चाहे वह “दिलबर” (सत्यमेव जयते, 2018) हो, “साकी” (बाटला हाउस, 2019) हो, या हाल का “दिलबर की आंखों का” (थम्मा, 2025) हो, इसी शैली में होते हैं और उसे और ज्यादा उत्तेजक बनाते हैं। कैमरा कलाकार से कितनी दूरी पर है और किस एंगल से शॉट लिया गया है, यह मायने रखता है।
इसलिए अगली बार जब आप कोई नया लोकप्रिय डांस नंबर देखें या किसी पार्टी में उस पर नाचें, तो यह भी सोचें कि उसे कैसे फिल्माया गया है, वह किसके लिए बनाया गया है। हम जब ऐसे गानों को बिना सवाल किए लोकप्रिय बनाते हैं, तो कहीं न कहीं उसी व्यवस्था का हिस्सा बन जाते हैं। ये गाने हमें याद दिलाते हैं कि किस तरह महिलाओं से उनकी अपनी इच्छा, उनकी आवाज और उनके शरीर पर अधिकार धीरे-धीरे छीना जा रहा है और यह सब बिना झिझक, बार-बार होता रहता है।