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ट्रैप्ड : जीने की अदम्य जिजीविषा

ट्रैप्ड हिंदी सिनेमा के लिए नई तरह की फिल्म है। विक्रमादित्य मोटवानी कुशल निर्देशकों की कतार में शामिल हैं। इस बार बिना गाने, कम संवाद और लगभग तामझाम वीहिन एक प्रयोगधर्मी फिल्म उनके खाते में है।
ट्रैप्ड : जीने की अदम्य जिजीविषा

आज के दौर में जब संवाद के इतने साधन हैं, तब कोई व्यक्ति घर में कैद रह जाए और उससे बाहर निकलने के लिए उसे जतन करना पड़े, यह सुन कर यकीन करना मुश्किल है लेकिन विक्रमादित्य ने ऐसा दिखाने का जोखिम उठाया और वह काफी हद तक सफल रहे। शौर्य (राजकुमार राव) को अपनी गर्लफ्रैंड नूरी (गीतांजलि थापा) से शादी करने से पहले एक घर चाहिए, लो बजट। शादी के लिए वह इतना उतावला है कि यह भी नहीं सोचता कि वीरान इमारत में पत्नी को लेकर रहना भी है या नहीं। लेकिन अपने बजट में घर किराए पर मिलने की अगली सुबह खुशनुमा होने के बजाय भयावह हो जाती है।

मोटवानी ने हर फ्रेम को बहुत सावधानी से गढ़ा है। जाहिर है इस फिल्म को देखने के बाद बहुत से किंतु परंतु हैं लेकिन खास बात उस व्यक्ति की जिजीविषा है जो अकेले अंधेरे में बिना साधनों के उस वीरान फ्लैट में मरना नहीं चाहता है। लो बैटरी फोन में शौर्य ने पहला फोन अपनी गर्ल फ्रैंड को क्यों नहीं किया, जो व्यक्ति मौत का इंतजार कर रहा हो वह मामूली चूहे से डरेगा क्या, घर वालों, दोस्तों यहां तक कि गर्ल फ्रैंड ने भी उसे खोजने की कोशिश क्यों नहीं की? ऐसे कितने दिन शौर्य अंदर रह गया कि उसकी गर्ल फ्रैंड ने शादी भी कर ली, अब तो फोन की आखिरी लोकेशन ट्रेस हो जाती है जैसे तमाम प्रश्न उठना लाजिमी हैं लेकिन फिर भी मोटवानी का यह ईमानदार प्रयास है कि वह उस रोमांच को बरकरार रखने में सफल रहे हैं जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखता है। 

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