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अपने दु:खों व गलतियों पर हंसना चार्ली चैपलिन ही सिखाते हैं

चार्ली की हर फिल्म में आपको एक गंभीर डिबेट दिख जाएगी। 'द डिक्टेटर' में चार्ली का दिया गया लास्ट भाषण ही सुन लीजिए। मानवता के प्रति प्रेम, युद्ध-गुस्सा, मशीनीकरण पर मानव की विजय का कितना गंभीर फोटो खिंचते हैं चार्ली
अपने दु:खों व गलतियों पर हंसना चार्ली चैपलिन ही सिखाते हैं

चार्ली चैपलिन को पहली बार छुटपने में 'चैरी बोलेसम' के एड में देखा था। वो स्कूल जाने के शुरुआती दिन थे। सफेद शर्ट, ब्लू हाफ पैंट, एक स्कूल बैच लगा टाई और चैरी बोलेसम से पोलिश किया जूता। गांव के उस नये खुले प्रायवेट 'इंडियन पब्लिक स्कूल' में हर नकल शहरी अंग्रेजी स्कूलों की होती थी। पहनावा से लेकर टिफिन का डब्बा तक। हां, पढ़ाई का मीडियम हिन्दी बना रहता। मास्टर साब कई बार खुद अंग्रेजी में लपटाते तो बच्चा को ही सोटिया देते। तो चार्ली उसी जमाने में हमें हंसाता हुआ टीवी पर आने लगा था। उस दौर में दूरदर्शन पर स्कूल जाते समय 'शान्ति' और लौटने के वक्त 'युग' सीरियल आता था। हमेशा 'शान्ति' को अधूरे मन से छोड़ कर निकलना पड़ता और शाम तीन बजे दौड़ते हुए आधे से 'युग' सीरियल देखने को मिलता।

फिल्म 'डिक्टेटर' में चार्लीचैरी बोलेसम एड देखते समय इतना पता थोड़े न था कि इ विदेशी फिल्मों का हीरो है। इतना दुबला-पतला आदमी, नाक सिंकौड़े-विदेशी मूंछ तो हमारे यहां फिल्मों-नाटकों में कॉमेडियन कम साइड हीरो का ही हुआ करता है। वो जमाना मिथुन से निकल सन्नी देओल, अमीर खान, सलमान, गोविंदा का था। सब मोटे-ताजे या फिर संजय दत्त टाइप अन्याय के खिलाफ गोली-बंदूक उठाने वाले।

फिल्में वही गांव के ठाकुर का शोषण, शहरी कोरपोरेटी बाप का इश्क में बाधा जैसे मुद्दे पर ही बनती थी। उस समय ठाकुरों की पिटाई करते ये हीरो सच्चे के नायक लगते। हमारे ग्रुप के बच्चों ने बांट लिया था। सबको बड़ा हो कर गोविंदा, सलमान या फिर संजय दत्त ही बनना था। दूरदर्शन वालों से आज शिकायत करने का मन करता है। हम गांवों-कस्बों में बड़े होने वाले जेनरेशन को विदेशी सिनेमा से मरहूम करने की साजिश इसी सरकारी चैनल ने किया है। आज बप्पी लहरी जमाने की फिल्मों के बारे में सोचकर हंसी आती है।

धीरे-धीरे गांव से भाया कस्बा होते हुए शहर पहुंचा। कुछ केबल टीवी और कुछ यूट्यूब पर चार्ली चैपलीन की फिल्मों को देखने लगा- आज भी पूरा नहीं देख पाया हूं। लेकिन दो-तीन फिल्मों को ही देख मन मानने लगता है कि अपना हिन्दी सिनेमा चार्ली चैपलिन जैसा एक भी हीरो पैदा न कर सका। कोई एक हीरो का नाम ले लीजिए जिसके प्रति श्रद्धा से आपका मन भर जाय लेकिन चार्ली की महानता देखिये कि आज भी उसकी फिल्मे दुनिया के हर कोने में देखी-पसंद की जाती है। चार्ली की कोई फिल्म देख लीजिए। उनकी फिल्मों में भी शोषण, अमानवता, असमानता के खिलाफ लड़ाई दिखती है लेकिन झुठउका मार-धाड़, धिसुम-धिसुम से अलग। हमारे यहां तो नायक पिलपिलाया रहता है आव देखा न ताव मार-पीट शुरू। अब जरा सोचिये जो जेनरेशन ही जवान हो रहा हो मारपीट-धिसुम-धसाम के बीच उसकी समाज-व्यवस्था और जीने की लड़ाई में कितनी गहराई आ पाएगी। चार्ली अपनी फिल्मों में कैसे हंसते-हंसाते बड़ी-बड़ी चोट कर जाते हैं। खुद मार खा कर भी इस व्यवस्था को गहरी चोट  पहुंचा जाते हैं। हमारे यहां का कोई हीरो मार खाने लगे तो उसे फ्लॉप मान लिया जाता है।

हिन्दी फिल्मों में शोषण से लड़ते-लड़ते नायक चोली के पीछे क्या है..गाने लगता है (मैं सभी हिन्दी फिल्मों की बात नहीं कर रहा)। जिस तरह के शोषण, अव्यवस्था से हमारे युवा पीढ़ी में गुस्सा, नफरत पैदा हुआ था उसे इस मुए सीनिमा ने एंग्री यंग मैन में बदल कर रख दिया। आप याद कीजिए उस जमाने की कोई फिल्म जिसमें कोई गंभीर बात कही गई हो( हम सब सन्नी दैओल की तारीख पर तारीख वाला डॉयलॉग सुन ही खुश होते रहे।) चार्ली की हर फिल्म में आपको एक गंभीर डिबेट दिख जाएगी। द डिक्टेटर में चार्ली का दिया गया लास्ट भाषण ही सुन लीजिए। मानवता के प्रति प्रेम, युद्ध-गुस्सा, मशीनीकरण पर मानव की विजय का कितना गंभीर फोटो खिंचते हैं चार्ली। चार्ली ने कितनी गहरी चोट पहुंचाई है इस कारपोरेटी तंत्र की फिल्म 'मॉडर्न टाइम्स' में और वो भी आज से पचासियों साल पहले ही उन्होंने औद्योगिकरण के खिलाफ जो सवाल उठाए....आज भी घोर समकालीनता रखते हैं।

कुछ-कुछ राज कपूर साब ने चार्ली सा कुछ करने का प्रयास किया। इसलिए भी राजकपूर मुझे अच्छे लगते हैं तब से जब चार्ली की फिल्मों से परिचय नहीं हुआ था। विदेशी फिल्मों की नकल भी बॉलीवुड ने सेलेक्टिव ही किया। मार-धाड़, एक्शन और धूम-धड़ाका तो चुरा लिया लेकिन वो ह्युमर, वो सटायर वहीं छोड़ आए जो चार्ली की फिल्मों को कालजयी फिल्म बनाते हैं। शायद दोष हम दर्शकों का ही है। हिष्ट-पुष्ट हीरो चाहने वाले हम हिन्दी दर्शक एक दुबले-पतले,नाटे से आदमी को हीरो के रुप में शायद ही स्वीकार पाते। देखिये न कैसे सलमान से लेकर आमिर तक सबको बॉडी बनाकर फिगर मेंटेन करना पड़ रहा है- हमारी अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए। 

और अंत में, मेरा कतई मानना नहीं है कि हिन्दी फिल्मों में कुछ अच्छा है ही नहीं। समानांतर सिनेमा भी इसी हिन्दी सिनेमा का पार्ट रहा है और मुख्यधारा में भी दर्जनों गंभीर-उत्कृष्ट फिल्में बनती रही हैं..बन रही हैं। लेकिन भाई चार्ली की तो बात ही कुछ और है..आज भी चार्ली की नकल करने वाला मन को गुदगुदा जाता है। अभी चार्ली को बहुत पढ़ना देखना है...

 

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