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चंपारण के इतिहास में रमेशचंद्र झा का हिस्सा

बिहार के मोतिहारी जिले में सुगौली थाना के पास एक गाँव पड़ता है, फुलवरिया । इसी गाँव में रमेशचन्द्र झा...
चंपारण के इतिहास में रमेशचंद्र झा का हिस्सा

बिहार के मोतिहारी जिले में सुगौली थाना के पास एक गाँव पड़ता है, फुलवरिया । इसी गाँव में रमेशचन्द्र झा का जन्म हुआ । 8 मई 1928 को । आज से करीब 95 बरस पहले । भारत सरकार ने आज़ादी के अमृत महोत्सव के अंतर्गत इन्ही रमेशचन्द्र झा को याद करते हुए अपनी वेबसाइट पर लिखा है - “रमेशचन्द्र झा बचपन में ही आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गए थे, जिसके कारण उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया । महज़ 14 वर्ष की आयु में उनपर थाना डैकैती के कई मुक़दमे चले । 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के लिए उन्हें जेल भी भेजा गया । कहा जाता है कि उनकी सक्रियता ने अंग्रेज़ी शासन को परेशान करके रख दिया था ।…” 

 

आज़ादी के अमृत महोत्सव के तहत देश उनकी 95वीं जयंती मना रहा है, यह उनके जिले-जवार के लोगों को शायद ही पता हो । लेकिन उनके गाँव फुलवरिया में उनके होने के सबूत अब भी ज़िंदा हैं । गाँव के अंदर आते ही पंचायत से सटे उनका घर है । घर के बाहरी हिस्से में वो खपड़ैल कमरा भी है, जहां उन्होंने अपनी ज़िंदगी बिताई और बहुत सारा मूल्यवान साहित्य भी रचा । हल्के नीले रंग में रंगे उनके कमरे में काठ का उनका पुराना आलमीरा रखा है । उसमे कुछ दूसरे लेखकों की किताबें हैं, कुछ उनकी अपनी किताबें भी हैं, हरिवंश राय बच्चन से लेकर, बाबा नागार्जुन, त्रिलोचन, शिवपुजन सहाय और बेनीपुरी जी की बहुत सारी चिट्ठियाँ हैं, जिनमे अब जान बाक़ी है । 

 

पहले बात 1942-43 की । रमेश बाबू और उनके परिवार ने आज़ादी की लड़ाई में जान फूंक दी थी । अगर इनके परिवार के बारे में ठीक से पता करें तो पता चलेगा कि पूरे चंपारण में दर्जन भर सेनानियों का ये इकलौता परिवार था । जहां सब के सब बागी थे, मर्द भी और औरतें भी । पिता लक्ष्मीनारायण झा ने भी अंग्रेज़ी हुकूमत से जमकर लड़ाई की और कई बार गिरफ़्तार हुए। परिवार में राजाजी झा, नंदजी झा, उपेन्द्र झा, शुभकला देवी, जागीदत्त झा सभी लड़ाई में थे । 

 

स्वतंत्रता सेनानी और मशहूर पत्रकार कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने लिखा भी है- “रमेशचन्द्र झा और उनके परिवार का इतिहास स्वतंत्रता संग्राम में बर्बाद होकर अट्टाहास करने का इतिहास है । वे उनमें है, जिन्होंने गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ने को स्वयं हथकड़ियाँ पहनी हैं और खौफ़नाक फ़रारी ज़िंदगी का लुत्फ़ भी उठाया है…”।

 

रमेशचन्द्र झा को अंग्रेजों की मुखबिरी करने और उनकी कई ख़तरनाक गतिविधियों पर नज़र रखने में लगाया गया । यह सोच कर लगाया गया कि 14 साल के लड़के पर शक नहीं जाएगा, लेकिन हुआ उल्टा । रितु चतुर्वेदी और आर.एस. बख्शी “बिहार थ्रू द एज़ेज़” में लिखते हैं - “रमेशचन्द्र झा को पकड़ लिया गया था और इण्डियन डिफेंस एक्ट की धारा 38(5)(a) लगाकर रात भर थाने के जेल में रखा गया । अगली सुबह हथकड़ी लगाकर उन्हें कोर्ट में पेश किया गया ।” 

 

हालाकि यहाँ कम उम्र का तिकड़म काम कर गया और वे छूट गए । सुगौली रेलवे थाना लूट और अग्निकांड को लेकर रमेशचन्द्र झा को फिर अभियुक्त बनाया गया पर वे फ़रार हो गए और लंबे समय तक भूमिगत रहे । आज़ादी की लड़ाई का उनका हिस्सा थोड़ा नहीं, बहुत ज़्यादा है । कुछ कहानियाँ फ़िल्मी भी हैं । 

 

कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने 1963 में एक संस्मरण छापा । शीर्षक था - ‘...और तीसरे दर्जे का कैदी करार दिया गया’ । इसमें रमेशचन्द्र झा लिखते हैं-“सुगौली का अनवर दारोगा जानता था कि ये सब मेरा किया धरा है, पर उसे सबसे ज्यादा भय गायब हुई पिस्टल की वजह से था, इसलिए जब कभी वह मुझे गिरफ़्तार करने आता तो आदर से ही बात करता और मैं कभी कभी कह देता कि आज गिरफ़्तार होने का मेरा मूड नहीं है..”।

 

साल 1942 तक आते आते गाँधी समझ गये थे कि गिरफ़्तारियाँ देने और जेलें भरने का समय जा चुका है । उन्होंने संपूर्ण आज़ादी की माँग रख दी थी । बंबई के मंच से बोल भी दिया था - अपने अपने इलाक़े आज़ाद कर लीजिए, देश खुद ब खुद आज़ाद हो जाएगा । बलिया में चित्तू पांडे जैसे सेनानियों ने ऐसा किया भी । यही तेवर बिहार का भी था । फिर बिहार का चम्पारण भला क्यूँ पीछे रहता । चम्पारण का इतिहास छिटपुट घटनाओं वाला नहीं है । तीस-पैंतीस बरस की तो सिर्फ़ आज़ादी की लड़ाई का इतिहास रहा है । यह गाँधी के पूरे रचनात्मक आंदोलन की हर कसौटी पर खरा उतरने वाला जिला रहा । ये सब बिना गरम दल और नरम दल वालों के संभल नहीं था । 

 

1942 की अगस्त क्रांति के बीच जिन स्वतंत्रता सेनानी का घर सबसे ज्यादा लूटा गया, वो लक्ष्मीनारायण झा और उनके बेटे रमेशचन्द्र झा का ही है।गाँव के लोग बताते हैं कि अंग्रेज उनके घर के कपड़े और बर्तन तक लूट ले जाते थे । हर बार घर उजड़ता, हर बार बसाया जाता। 

 

रमेशचन्द्र झा आजादी की लड़ाई भी लड़े और जेल की यातनाएं भी भोगी। लेकिन हर जेल-यात्रा उनके लिए साहित्यिक वरदान हीं बनी। जेल में ही उनका झुकाव साहित्य और लेखन की तरफ हुआ। फिर तो वे कुछ यूँ आज़ाद हुए कि कवि हो गए। 

 

अब बात 50 और 60 के दशक की। गांधी के ‘चंपारण सत्याग्रह आन्दोलन’ (1917) ने जो भावना भरी उसने कइयों को कवि बनाया। यह भी देश सेवा थी। इसमें चम्पारण से पहला नाम आता है- गोपाल सिंह नेपाली का। मुंगेर के विख्यात साहित्यकार कुमार केदारनाथ राय केशरी ने लिखा है कि “कविवर नेपाली के निधन से जो स्थान रिक्त हुआ है, उसकी पूर्ति की साक्षात मूर्ति रमेशचंद्र झा जी हैं।”

 

ज़िंदगी की बड़ी धूप-छाँव से गुज़र कर रमेश बाबू ने हिंदी की लगभग सभी विधाओं में जमकर लिखा । उनके पास चूँकि खुद का भोगा हुआ यथार्थ था, देश प्रेम था, गाँधी दर्शन का प्रभाव था, उन्होंने राष्ट्रीय साहित्य और अपने समकालीनों को पढ़ा भी और बहुत कुछ रचा भी । 

 

छोटे से गांव में रहते हुए लगभड़ 70 से ज़्यादा किताबें लिखीं । रिर्पोताज, कॉलम, लेख-आलेख काफ़ी कुछ लिखा । ‘चम्पारन की साहित्य साधना’, और ‘अपने और सपने : चम्पारन की साहित्य यात्रा’ लिखकर चंपारण के बहुतेरे भूले बिसरे स्वतंत्रता सेनानियों और साहित्यकारों को ढूँढने का श्रेय भी उन्ही को जाता है । इन किताबों ने बिहार का साहित्यिक इतिहास तैयार करने में बड़ी भूमिका निभाई । “चंपारण की साहित्य साधना” के रेफ़्रेंस के बग़ैर बिहार के साहित्यिक इतिहास की कल्पना भी नहीं की सकती। 

 

इनके अलावा उन्होंने मुरलिका, प्रियंवदा (खण्ड काव्य), स्वगातिका, मेघ-गीत, आग-फूल, भारत देश हमारा जैसे कविता संग्रह दिए । दुर्ग का घेरा, मजार का दीया, मिट्टी बोल उठी, राव हम्मीर, वत्स-राज, कुंवर सिंह, कलिंग का लहू जैसे ऐतिहासिक उपन्यास भी उन्होंने लिखे । बाल साहित्य पर भी उनकी कलम खूब चली । 

 

07 अप्रैल 1994, को फुलवरिया में ही उन्होंने आख़िरी साँस ली लेकिन जिनके शब्दों का सूरज कभी अस्त नहीं हुआ । वे अपने गाँव में अब कवि जी के नाम से ही याद हैं । वे उम्दा क़िस्म के मंचीय कवि भी रहे, बतौर हरिवश राय बच्चन “उनके गीतों में हृदय बोलता है और कला गाती है ।” उनकी कविताएँ को आकाशवाणी पटना, दिल्ली और बनारस जैसे कई स्टेशनों से लाइव सुना गया । 

 

आज से क़रीब चालीस बरस पहले ऑडियो कैसेट में रिकॉर्ड हुए उनके कुछ गीत और ग़ज़लों को डिजिटाइज़ कराया गया है । वे बारिश के कारण घरघराती हुई आवाज़ में तरन्नुम में गाते गये सुनाई पड़ते हैं - “मंदिर मंदिर खंडित प्रतिमा / बाकि अपनी गौरव गरिमा / प्राण प्राण को विचलित करती / एक ही माया एक ही नग़मा / किसका पूजन किसका वंदन / किसको सादर नमन करूँ मैं / घाट घाट का पानी पीता / किस जल से आचमन करूँ मैं / किस पनघट का स्मरण करूं मैं।”

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