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पंजाब: नशे के चंगुल में सरहदी इलाकों के मजदूर, केंद्र ने राज्य सरकार पर लगाए गम्भीर आरोप

“केंद्रीय गृह मंत्रालय का सरहदी जिलों में नशा देकर खेत मजदूरों को बंधुआ बनाने का आरोप मगर पंजाब...
पंजाब: नशे के चंगुल में सरहदी इलाकों के मजदूर, केंद्र ने राज्य सरकार पर लगाए गम्भीर आरोप

“केंद्रीय गृह मंत्रालय का सरहदी जिलों में नशा देकर खेत मजदूरों को बंधुआ बनाने का आरोप मगर पंजाब सरकार का दावा कि यह निराधार”

लगभग ग्यारह महीने, पंजाब में छह महीने और दिल्ली की सीमा पर पांच महीने, से केंद्र के विवादास्पद नए कृषि कानूनों के खिलाफ जारी आंदोलन की एक बड़ी उपलब्धि किसान नेता नशे की लत के खात्मे के रूप में बता रहे थे, तभी पिछले महीने के आखिरी हफ्ते में केंद्रीय गृह मंत्रालय एक रिपोर्ट लेकर प्रस्तुत हुआ। इस रिपोर्ट के मुताबिक, सरहदी इलाकों में नशा खेत मजदूरों को बंधुआ बनाने के काम आ रहा है। इसमें कहा गया है, ‘‘नशे की लत में पड़े ये मजूदर बरसों से यहां के किसानों के बंधुआ हो गए हैं।  इन्हें परिवार के भरण-पोषण के लिए पगार नहीं नशा दिया जा रहा है।’’ लेकिन पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सरहदी इलाकों गुरदासपुर, तनरतारन और अमृतसर जिले के खेतों में नशे के लालच में बंधुआ मजदूरी के आरोपों को सिरे से खारिज किया और कहा, ‘‘यह भी पंजाब के किसानों के बारे गलतफहमियां फैलाने की केंद्र सरकार की एक हरकत है। किसानों को बदनाम करने और आंदोलन को पटरी से उतारने की लगातार चल रही साजिशों का ही हिस्सा है।’’

भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के अध्यक्ष बलबीर सिंह राजेवाल भी कहते हैं, ‘‘केंद्र के तीन कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन की पहल और अगुआई करने वाले पंजाब के किसानों को बदनाम करने के लिए केंद्र सरकार हर हथकंडा अपना रही है। ऐसा कोई किसान नहीं, जो प्रवासी या स्थानीय मजदूरों को नशेड़ी बनाकर उनसे खेतों में मजदूरी करा रहा है।’’

केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से 17 मार्च को पंजाब सरकार को लिखे पत्र में दावा किया गया कि बीएसएफ सेे 2019 और 2020 में पंजाब के सरहदी जिलों में 58 लोगों ने बताया था कि वे पंजाब के किसानों के पास बंधुआ मजदूर के तौर पर काम कर रहे थे। पत्र में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लिखा था, ‘‘गैर-कानूनी मानव तस्करी सिंडिकेट भोले-भाले मज़दूरों का शोषण करते हैं और पंजाबी किसान उनसे अपने खेतों में घंटों काम करवाने के लिए उनको नशा देते हैं।’’

लेकिन बतौर पंजाब सरकार, उसकी जांच में पाया गया कि बीएसएफ ने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि उस पत्र को मीडिया में लीक करने से पहले तथ्यों की जांच कर लेनी चाहिए थी और राज्य सरकार से जांच करवानी चाहिए थी।

मुख्यमंत्री ने बताया, ‘‘सभी 58 मामलों की गहराई से जांच की गई और ऐसा कुछ भी नहीं पाया गया।’’ उनके मुताबिक जो 58 बंधुआ मजदूर बताए जा रहे हैं, उनमें चार पंजाब के अलग-अलग इलाकों के हैं जबकि तीन की मानसिक हालत कमजोर है। पठानकोट से पकड़ा गया पटियाला का परमजीत सिंह पिछले 20 साल से मानसिक रूप से परेशान है और दो महीने पहले घर से निकल गया था। गुरदासपुर के रूड़ सिंह को पकड़े जाने वाले दिन से ही अमृतसर में इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ में दाखिल कराया गया था। एसबीएस नगर का रहने वाला सुखविंदर सिंह भी मानसिक रोगी है। इन तीनों को स्थानीय पुलिस की तस्दीक के बाद उनके परिवारों के हवाले कर दिया गया, जिन्हें केंद्रीय गृह मंत्रालय नशे के लालच में किसानों का बंधुआ मजदूर बता रहा है।

पंजाब सरकार ने जांच में पाया कि हिरासत में लिए 58 व्यक्तियों में से 16 दिमागी तौर पर बीमार हैं, जिनमें चार बचपन से ही इस बीमारी से पीडि़त हैं। इनमें एक, बुलंदशहर (उत्तर प्रदेश) के बाबू सिंह का तो आगरा में इलाज चल रहा था और उसके डॉक्टरी रिकार्ड के आधार पर उसे परिवार के सदस्यों के हवाले कर दिया गया। बीएसएफ द्वारा पकड़े गए तीन व्यक्तियों की पहचान उनकी मानसिक स्थिति के कारण नहीं की जा सकी। जांच में यह भी पता लगा है कि 14 व्यक्ति अपनी गिरफ्तारी से कुछ दिन या हफ्ते पहले ही पंजाब आए थे। गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति ने अदालत में भी जबरदस्ती खेत मजदूर के तौर पर काम करने और अमानवीय हालत में रखे जाने का आरोप नहीं लगाया।

कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि किसी भी रिकॉर्ड से यह संकेत नहीं मिलता कि इन व्यक्तियों को लंबे समय तक काम पर लगाए रखने के लिए जबरदस्ती नशा दिया जाता था। यह कहना भी गलत है कि इन व्यक्तियों की मानसिक दशा नशे से बिगड़ी है। जो भी हो, सरकारों के बीच यह खींचतान अभी जारी है। उम्मीद यही की जानी चाहिए कि ऐसे संवेदनशील मामलों में पुख्ता जांच की जाए। सिर्फ सुर्खियां बनाने से बाज आया जाए।

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