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अद्भुत है अवधपुरी और गोरक्षधाम के संबंध

भारत की जीवतंता, भारत की आत्मशक्ति और आत्मगौरव के प्रतिनिधि हैं भगवान श्रीराम। रामायण सिर्फ उनकी...
अद्भुत है अवधपुरी और गोरक्षधाम के संबंध

भारत की जीवतंता, भारत की आत्मशक्ति और आत्मगौरव के प्रतिनिधि हैं भगवान श्रीराम। रामायण सिर्फ उनकी कथा नहीं बल्कि भारत की संस्कृति और अध्यात्म की प्राणशक्ति की प्रतिनिधि है। इसीलिए राम और रामायण  एक दूसरे के पूरक हैं अर्थात जहां श्रीराम हैं वहां रामायण है और जहां रामायण है वहीं श्रीराम। पूरी दुनिया में राम और रामायाण की विभिन्न रूपों में उपस्थिति को देखें तो मानस में लिखी तुलसीदास की यह पंक्ति ‘रामायण सत कोटि अपारा’ एकदम सही साबित होती है। श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति के लंबे संघर्ष के बाद अब जब 5 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी जी के हाथों से प्रभु श्रीराम के मंदिर की नींव रखी जा रही है, तब सहज ही यह बात मन में आती है कि जन्म भूमि के लिए सदियों चले संघर्ष के बाद रघुकुल शिरोमणि प्रभु राम का मंदिर का शुभारम्भ उन्हीं योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्रित्व काल में हो रहा है जिनके दादागुरु गोरक्षपीठाधीश्वर श्रीदिग्विजयनाथ जी महाराज के समय रामलला का प्राकट्य हुआ था और जिनके गुरु श्रीअवेद्यनाथ जी महाराज की अध्यक्षता में श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ आंदोलन चला था। यही नहीं रामलला को टेंट से अपनी गोद में ले जाकर अस्थाई मंदिर में रजत सिंहासन पर स्थापित करने का सौभाग्य भी गोरक्षपीठाधीश्वर एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी को ही मिला।

वैसे तो श्रीराम जन्मभूमि के लिए संघर्ष उसी समय शुरू हो गया था जब मीर बांकी ने श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर के स्तम्भों के ऊपर मस्जिद जैसा ढांचा निर्मित किया। मार्च 1527 में महात्मा श्यामनंद जी महाराज से 1857-58 में गोरक्षपीठ के श्रीगोपालनाथ जी महाराज तक के इस लम्बे कालखण्ड में हजारों चिमटा सन्यासियों, योगियों, यतियों से लेकर राजाओं, रानियों/वीरांगनाओं और लाखों रामभक्तों ने जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए संघर्ष किया और बलिदान दिया। इसमें आंशिक सफलता तब मिली जब ब्रिटिश महारानी विक्टोरिया ने राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद की जानकारी पाकर, बाबरी मस्जिद का नक्शा मंगवाया और प्रांगण के बीच रेखा खीचकर आदेश दिया कि इस रेखा पर दीवार बनवा दी जाए। मुसलमान भीतर नमाज पढ़े और हिन्दू बाहर के चबूतरे पर पूजा-पाठ करें।

देश की मुक्ति के लिए संग्राम के साथ ही श्रीराम जन्मभूमि की मुक्ति के लिए भी लड़ाई भी चलती रही। 15 अगस्त 1947 को देश तो ब्रिटिश गुलामी से मुक्त हो गया लेकिन जन्मभूमि मुक्त नहीं हो पायी। आंदोलन की नयी रणनीति के तहत 1947 ई0 में ही हमुमानगढ़ी के श्रीरामदास जी के सभापतित्व में अयोध्या (तब फैजाबाद) मण्डल में हिन्दू महासभा का आयोजन हुआ, जिसमें राम जन्मभूमि पर रामभक्तों के पूर्ण अधिकार का संकल्प लिया गया। अक्टूबर 1949 में वेदान्ती रामपदार्थदासजी की अध्यक्षता में मानस यज्ञ प्रारम्भ हुआ। पाठ-समाप्ति के दिन आयोजित सभा में अखिल भारतीय धर्म-संघ के संस्थापक स्वामी करपात्रीजी और उत्तर प्रदेश हिन्दू-महासभा के अध्यक्ष श्रीगोरक्षपीठाधीश्वर महन्त श्रीदिग्विजयनाथजी महाराज ने सक्रिय भाग लिया, जिसमें राम जन्मभूमि के उद्धार के लिए संकल्प लिया गया। 22 और 23 दिसम्बर 1949 एक चमत्कार हुआ। यह कैसा चमत्कार था? 

श्रीराम जन्मभूमि की पुलिस चैकी पर तैनात हवलदार अब्दुल बरकत ने जिलाधिकारी अयोध्या (तब फैजाबाद) के समक्ष दिए गये अपने बयान में बताया था। उसका कहना था कि ‘वह उस रात को ड्यूटी पर था, उसने करीब दो बजे इमारत के अन्दर एक ख़ुदाई (ईश्वरीय अथवा दैवी) रोशनी कौंधते देखी, जिसका रंग सुनहरा था और उसमें उसने एक चार-पांच वर्ष के देवतुल्य बालक को देखा, उसने ऐसा कभी नहीं देखा था। इस दृश्य को देख कर वह सकते में आ गया। जब उसकी चेतना लौटी, तब उसने देखा कि मुख्य द्वार का ताला टूटा हुआ पड़ा है और असंख्य हिन्दुओं की भीड़ भवन में प्रवेश कर सिंहासन पर प्रतिष्ठित मूर्ति की आरती तथा ‘भये प्रकट कृपाला, दीन दयाला‘ की स्तुति कर रही है।‘ महत्वपूर्ण बात यह है कि रामलला प्राकट्य के समय महंत श्री दिग्विजयनाथ जी महाराज कुछ प्रमुख संतो के साथ अयोध्या में ही मौजूद थे। 23 दिसम्बर 1949 को इस घटना की प्राथमिकी अयोध्या के थानाध्यक्ष ने दर्ज की।

रामलला के प्राकट्य के बाद आंदोलन चलता रहा लेकिन 1980 के दशक में इस आंदोलन ने एक रणनीतिक रूप ग्रहण कर लिया। 7-8 अप्रैल 1984 को विश्व हिन्दू परिषद की ओर से विज्ञान भवन, नई दिल्ली में एक धर्म संसद बुलायी गयी जिसमें श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या, श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा और काशी में विश्वनाथ मंदिर की भूमि को मुक्त कराने की मांग रखी गयी। 18 जून 1984 को लक्ष्मण किला, अयोध्या में संत-महात्माओं एवं विश्व हिन्दू परिषद की बैठक संपन्न हुई और श्रीराम जन्मभूमि को सबसे पहले मुक्त कराने का निर्णय लिया गया। संतों ने श्रीगोरक्षपीठाधीश्वर महंत श्रीअवेद्यनाथजी महाराज के संयोजकत्व में श्रीराम जन्मभूमि को मुक्त कराने के लिए एक समिति के गठन का प्रस्ताव रखा। 21 जुलाई 1984 को वाल्मीकि भवन (अयोध्या) में ‘श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति’ का विधिवत गठन हुआ जिसके अध्यक्ष बने महंत श्री अवेद्यनाथजी महाराज जी बने। 

31 अक्टूबर और 01 नवम्बर 1985 को उडुपी धर्म संसद में निर्णय लिया गया कि यदि 8 मार्च 1986 तक श्रीराम जन्मभूमि का ताला नहीं खोला गया, तो पूरे देश के धर्माचार्य और संत 09 मार्च से सत्याग्रह आरम्भ कर देंगे। ध्यान रहे कि इस सत्याग्रह के संचालन का अखिल भारतीय दायित्व भी धर्म संसद द्वारा श्रीअवेद्यनाथजी महाराज को ही दिया गया। इस बीच 21 जनवरी 1986 को एक युवा वकील ने फैजाबाद सदर के मुंसिफ मजिस्ट्रेट की कोर्ट में आवेदन दिया कि वाद संख्या-02/1950 की व्यवस्था के अनुसार श्रीराम जन्मभूमि पर ताला लगाना और सशस्त्र पुलिस तैनात करके लोगों को आने-जाने से रोकना अवैध है। फरवरी 1986 में इसी मामले में जिला जज ताला खोलने का ऐतिहासिक आदेश दे दिया। संतों एवं भक्तों की पहली न्यायिक और निर्णायक जीत थी। इसके बाद अप्रैल 1986 को अखिल भारतीय नाथ संप्रदाय तथा श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति समिति के अध्यक्ष महन्त श्रीअवेद्यनाथ जी महाराज ने नागौर (राजस्थान) में घोषणा कर दी कि जब तक हिन्दू समाज को श्रीराम जन्मभूमि पूर्णरूपेण नहीं सौंपी जाती तथा विश्वनाथ मंदिर वाराणसी और श्रीकृष्ण जन्मस्थली मथुरा पूर्णतः मुक्त नहीं होती, तब तक हमारा संघर्ष जारी रहेगा।

29 मार्च 1987 से एक आक्रामक आंदोलन की शुरूआत हुयी जिसमें हिन्दू रिवाइवलिज्म की झलक स्पष्ट रूप से दिखने लगी। इसकी अनुगूंज लोकसभा तक भी पहुंची और 1 अप्रैल 1987 को बाबरी मस्जिद के समले पर लोकसभा में तीखीं झड़पें हुईं। कुछ प्रश्न वहां उभरे थे जिनके जवाब में श्रीअवेद्यनाथजी महाराज ने गोरखपुर में कहा था मन्दिर-मस्जिद तो हटाये जा सकते हैं, किन्तु श्रीराम का जन्म स्थान हटाया नहीं जा सकता। फलतः 05 अप्रैल 1987 को पवित्र सरयू के तट पर विशाल जन-समूह ने खड़े होकर प्रतिज्ञा ली गयी, कि हम श्रीरामलला की मूर्ति नहीं हटने देंगे और इसके लिए बलिदान देकर हम इस स्थान पर भव्य मन्दिर का निर्माण कराएंगे।

परिणाम यह हुआ कि 19 अक्टूबर 1988 को अयोध्या में सरयू के तट पर पर सात ईंटों का विधिवत पूजन करके यज्ञशाला की सात परिक्रमा की गई कि श्रीराम जन्मभूमि पर मन्दिर का निर्माण निश्चित हो गया। 10 जुलाई 1989 को इस मामले की पेशी थी। उसी समय इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्रीदेवकीनन्दन अग्रवाल ने भगवान श्रीराम के सर्वोत्तम मित्र के नाते श्रीराम की ओर से अपील की, कि ‘हम (रामलला) इस स्थान पर विराजमान हैं।‘  

कुल मिलाकर 500 वर्षों के संघर्षों के बाद और 134 वर्ष पुराने कानूनी विवाद को निपटाते हुए भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 1045 पृष्ठों में एक नया इतिहास लिखा। यह भारतीय इतिहास में एक नयी सुबह थी जब सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यों वाली पीठ ने सर्वसम्मति से अयोध्या 2.77 एकड़ की पूरी विवादित भूमि राम मंदिर के निर्माण के लिए दे दी। मुख्यन्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने स्पष्ट रूप से कहा कि ढहाया गया ढांचा ही भगवान राम का जन्मस्थान है और हिन्दुओं की यह आस्था निर्विवादित है। सर्वोच्च अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि मीर बांकी ने बाबरी मस्जिद बनवाई थी। धर्मशास्त्र में प्रवेश करना अदालत के लिए उचित नहीं होगा। बाबरी मस्जिद खाली जमीन पर नहीं बनायी गयी थी। मस्जिद के नीचे जो ढांचा था वह इस्लामिक ढांचा नहीं था। इस फैसले ने सत्य, त्याग, करुणा, आस्था और तप की सिद्धि को स्थापित किया। इसने देश की नाड़ियों में नवीन स्पंदन पैदा किया। अब जब मर्यादा के प्रतिमान, पुरोषत्तम, रघुकुलतिलक, अयोध्या के प्राण श्रीराम करोड़ों हृदयों में विराजने के साथ-साथ अयोध्या के भव्य सिंहासन पर विराजने जा रहे हैं और इसे देखकर सम्पूर्ण देशवासी हर्ष का अनुभव कर रहे हैं तब अयोध्या और गोरक्षधाम के उस सम्बंध को याद करना समीचीन लगता है जो ‘हरि-हर’ का सम्बंध है। 

 ( लेखक वरिष्ठ स्तंभकार, इतिहासकार, अंतरराष्ट्रीय मामले और अर्थव्यवस्था के जानकार हैं। मैकग्रा हिल, पियर्सन, लेक्सिस नेक्सिस और प्रभात प्रकाशन द्वारा उनकी 23 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। लेख में उनके निजी विचार है।)

 

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