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आदिवासियों को जमीन से बेदखल करने के अपने आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 13 फरवरी के अपने उस आदेश पर रोक लगा दी जिसमें उसने देश के करीब 21 राज्यों के 11.8...
आदिवासियों को जमीन से बेदखल करने के अपने आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को 13 फरवरी के अपने उस आदेश पर रोक लगा दी जिसमें उसने देश के करीब 21 राज्यों के 11.8 लाख से अधिक आदिवासियों और जंगल में रहने वाले अन्य लोगों को जंगल की जमीन से बेदखल करने का आदेश दिया था। दरअसल, ये वे लोग हैं जेेा अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून, 2006 के तहत वनवासी के रूप में अपने दावे को साबित नहीं कर पाए थे।

जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने राज्यों को निर्देश दिया कि वे वन अधिकार अधिनियम के तहत खारिज किए गए दावों के लिए अपनाई गई प्रक्रिया और आदेशों को पास करने वाले अधिकारियों की जानकारी दें। इसके साथ ही पीठ ने यह जानकारी भी मांगी कि क्या अधिनियम के तहत राज्य स्तरीय निगरानी समिति ने प्रक्रिया की निगरानी की।

अगली सुनवाई के लिए 10 जुलाई की तारीख तय

पीठ ने राज्यों को ये जानकारियां जमा करने के लिए चार महीने का समय दिया। इसके साथ तब तक के लिए 13 फरवरी के अपने आदेश पर रोक लगा दी। पीठ इस मामले में अगली सुनवाई के लिए 10 जुलाई की तारीख तय की है।

इससे पहले शीर्ष अदालत बुधवार को 13 फरवरी के अपने आदेश पर रोक लगाने के केन्द्र सरकार के अनुरोध पर विचार के लिए सहमत हो गई थी। न्यायालय ने इस आदेश के तहत 21 राज्यों से कहा था कि करीब 11.8 लाख उन वनवासियों को बेदखल किया जाए जिनके दावे अस्वीकार कर दिए गए हैं।

हम अपने 13 फरवरी के आदेश पर रोक लगा रहे हैं

पीठ ने संक्षिप्त सुनवाई के बाद कहा, ‘हम अपने 13 फरवरी के आदेश पर रोक लगा रहे हैं।’ पीठ ने कहा कि वनवासियों को बेदखल करने के लिये उठाए गए तमाम कदमों के विवरण के साथ राज्यों के मुख्य सचिवों को हलफनामे दाखिल करने होंगे।

मदद के लिए उदारता अपनाई जानी चाहिए: केंद्र

केन्द्र ने 13 फरवरी के आदेश में सुधार का अनुरोध करते हुए न्यायालय से कहा, ‘अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वनवासी (वन अधिकारों की मान्यता) कानून, 2006 लाभ देने संबंधी कानून है और बेहद गरीब और निरक्षर लोगों, जिन्हें अपने अधिकारों और कानूनी प्रक्रिया की जानकारी नहीं है, की मदद के लिए इसमें उदारता अपनाई जानी चाहिए।’

अपने हलफनामे में केंद्र ने क्या कहा

केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा‌ कि वह समय-समय पर राज्य सरकारों द्वारा अधिनियम के कार्यान्वयन की निगरानी कर रहा है। उसने देखा कि अधिनियम को गलत तरीके से परिभाषित करने के कारण बड़ी संख्या में दावों को खारिज कर दिया गया। ग्राम सभाओं में दावे दाखिल करने की प्रक्रिया को लेकर जागरूकता का अभाव है। कई मामलों में दावा करने वालों को उनके दावे खारिज किए जाने का कारण नहीं बताया गया और वे उसके खिलाफ अपील नहीं कर पाए।

केंद्र सरकार ने बड़ी संख्या में दावों को खारिज किए जाने की अपनी चिंता को लेकर पिछले कुछ वर्षों में राज्यों को भेजे गए अपने पत्रों का उल्लेख भी किया। उसने उन घटनाओं का भी जिक्र किया जहां वन अधिकारी अपील का मौका दिए बिना ही आदिवासियों को बेदखल करने का आदेश दे देते थे। हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा, ‘अधिनियम के तहत दावों का खारिज होना आदिवासियों को बेदखल करने का आधार नहीं है। अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके आधार पर दावे के खारिज होने के बाद किसी को बेदखल किया जाए।’

13 फरवरी के अपने आदेश में पीठ ने राज्यों को दी चेतावनी

इससे पहले 13 फरवरी के अपने आदेश में पीठ ने राज्यों को चेतावनी देते हुए आदेश दिया था कि उन सभी को 24 जुलाई या उससे पहले जंगल की जमीनों से बेदखल किया जाए जिनके दावे खारिज हो गए हैं। अदालत ने कहा था कि अगर उनको बेदखल किए जाने का काम शुरू नहीं किया जाता है तो वह इसे गंभीरता से लेगी।

अदालत ने आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, केरल, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, त्रिपुरा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिवों को यह बताने के लिए भी कहा था कि जिनके दावे खारिज हो गए हैं उन्हें उनकी जमीन से बेदखल क्यों नहीं किया गया।

फरवरी के शुरुआती दिनों में आदिवासी मामलों के मंत्री को भेजा गया पत्र

आदिवासी मामलों के मंत्री को इस महीने की शुरुआत में भेजे गए एक पत्र में, विपक्षी दलों और भूमि अधिकार कार्यकर्ताओं के समूहों ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा था कि भारत सरकार ने कानून का बचाव नहीं किया है। पत्र में कहा गया था, ‘पिछली तीन सुनवाई में (मार्च, मई और दिसंबर 2018 में) केंद्र सरकार ने कुछ नहीं कहा है।’ इसके अलावा बीते 13 फरवरी को हुई आखिरी सुनवाई के दौरान कोर्ट में सरकारी वकील मौजूद ही नहीं थे।

 

 

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