कुछ समय पहले तक बीमार होने पर लोग सीधे सरकारी अस्पताल पहुंचते थे और अपना इलाज करवाकर घर लौटते थे। इतना ही नहीं लोग जब डॉक्टरों के पास जाते थे तो डॉक्टर सबसे पहले बीमार लोगों की नब्ज टटोलते थे और अपनी सलाह देते थे, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अब लोग सरकारी अस्पताल के बदले निजी अस्पतालों में पहुंचते हैं जहां मरीज की पूरी बात सुने बिना ही डॉक्टर विभिन्न तरह की चिकित्सीय जांच करवाने की सलाह देते हैं। चिकित्सीय जांच के बिना इलाज ही नहीं करते हैं। जांच खर्च और डॉक्टरों की फीस मरीजों पर इतनी भारी पड़ती है कि कई मरीज बीच में ही इलाज बंद कर देते हैं और भगवान की अराधना करने लगते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी निजी अस्पतालों के मनमाने बिलों पर चिंता व्यक्त की है और सरकार को क्लीनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट जैसे नियमों को सख्ती से लागू करने का निर्देश दिया है।
बीमारियां विकास को बाधित करती हैं और दुनिया की अर्थव्यवस्था गड़बड़ा देती हैं। किसी भी देश की संपन्नता इससे भी आंकी जाती है कि वहां लोग कितने स्वस्थ और खुशहाल हैं। भारत में 'पहला सुख निरोगी काया' जैसी कहावत प्राचीन काल से है, लेकिन आधुनिक जीवनशैली की आपाधापी में बीमारियां ग्रहण की तरह काया पर छाती चली गईं। भारत में स्वास्थ्य को लेकर समय-समय पर होने वाले सर्वेक्षणों में चिंताजनक आंकड़े सामने आते रहते हैं। मधुमेह, रक्तचाप और दिल संबंधी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।
अस्पतालों में इलाज के दौरान मरीजों और उनके परिजनों को जिन तकलीफों से गुजरना पड़ता है, वे भी किसी लाइलाज बीमारी से कम नहीं हैं। दो साल पहले इन्हीं तकलीफों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की थी कि निजी अस्पताल लूट-खसोट का अड्डा बन गए हैं। शिकायतें आम हैं कि निजी अस्पताल अपनी ही दुकानों से दवाइयां खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। जांच, मेडिकल उपकरणों, ट्रांसप्लांट आदि को लेकर भी मनमाना शुल्क वसूला जाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में सरकारी अस्पतालों के मुकाबले निजी अस्पतालों में इलाज सात गुना महंगा है। मरीजों का शोषण रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही केंद्र और राज्य सरकारों को नीति बनाने के निर्देश भी दिए हैं। लेकिन सरकार इस ओर ध्यान नहीं दे रही है।
दरअसल, पूंजीवाद ने चिकित्सा क्षेत्र को कमाई के बड़े मैदान में तब्दील कर दिया है। कभी चिकित्सा के पेशे को भगवान के दूसरे रूप में मानवता की सेवा का पर्याय माना जाता था। लेकिन आज मुनाफे की चांदी बटोरने की होड़ वाले अग्रणी पेशों में चिकित्सा व्यवसाय की गिनती होने लगी है। धन बटोरने की अंधी हवस में मानवता के तार-तार होने की इस व्यवसाय से जुड़ी खबरें आये दिन सुर्खियां बटोरती रहती हैं। यूं तो आज पैसे की अंतहीन भूख उन तमाम पेशों में नजर आती है जो सेवा-परोपकार व मनुष्यता के कल्याण में अग्रदूत माने जाते रहे हैं। लेकिन कुछ पेशे ऐसे हैं जो इंसानियत के रखवाले माने जाते रहे हैं। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट को पूछना पड़ा कि दिल्ली में जिन 51 अस्पतालों को रियायती जमीन दी गई थी और उन्होंने कुछ प्रतिशत गरीबों का इलाज मुफ्त करने का वायदा किया था, वे ऐसा क्यों नहीं कर रहे हैं? दरअसल, बात सिर्फ दिल्ली की नहीं है, पूरे देश में निजी अस्पतालो में लूट मची हुई है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2012 में एक नीतिगत फैसला लिया था, आपातकालीन स्थिति में खासकर दुर्घटना के शिकार सभी मरीजों को निजी अस्पताल मुफ्त में इलाज उपलब्ध कराएगी। साल 2018 में भी, देश की शीर्ष अदालत ने रियायती जमीन हासिल करने वाले अस्पतालों को नसीहत दी थी कि गरीब लोगों को मुफ्त इलाज उपलब्ध कराना सुनिश्चित किया जाए। साथ ही इस मामले में लापरवाही बरतने वालों की जवाबदेही भी सुनिश्चित करने को कहा था। विडंबना यह है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा चेताने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया। वहीं दूसरी ओर इस बाबत निगरानी करने वाले सरकारी विभाग भी आंख मूंद कर बैठे रहते हैं।
सरकारी जमीन पर रियायती दरों पर बने निजी अस्पतालों के लिए सबसे महत्वपूर्ण शर्त यह है कि उन्हें ईडब्ल्यूएस (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) और गरीबी रेखा से नीचे के मरीजों को मुफ्त इलाज देना होगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार, इन अस्पतालों को अपने इनडोर बेड का 10% और ओपीडी का 25% हिस्सा गरीबों के लिए आरक्षित रखना अनिवार्य है। रियायती दर पर जमीन लेने वाले निजी अस्पताल गरीब मरीजों को मुफ्त में बिस्तर, दवा, इलाज, सर्जरी और नर्सिंग सुविधाएं प्रदान करने के लिए बाध्य हैं। सर गंगाराम अस्पताल ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ. डी.एस.राणा कहते हैं कि इस अस्पताल में 10 फीसदी की जगह 18 फीसदी गरीब मरीजों का इलाज मुफ्त में किया जाता है।
उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार के नीतिगत फैसले में इस बात का प्रावधान था कि रियायती कीमत पर जमीन पाने वाले अस्पतालों को आंतरिक रोगी विभाग में न्यूनतम दस प्रतिशत और ओपीडी में पच्चीस प्रतिशत गरीबों का इलाज मुफ्त करना होगा। जिससे जुड़ी जवाबदेही पूरी करने को शीर्ष अदालत ने 2018 में भी चेताया था। लेकिन इसके बावजूद जमीनी हकीकत में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। यही वजह है कि पिछले दिनों शीर्ष अदालत ने इन अस्पतालों को नोटिस भिजवाए हैं। साथ ही अवज्ञा करने पर अवमानना की कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। इस बात में कोई संदेह नहीं कि इन निजी अस्पतालों में गरीबों को मुफ्त इलाज मिल सके, पहली जवाबदेही सरकार की बनती है। यदि सरकार की नियामक एजेंसियां सख्ती दिखाती तो क्या मजाल थी कि निजी अस्पताल अपने वायदे से मुकर जाते। बाकायदा, ऐसे मामलों में उदासीनता दिखाने वाले सरकारी अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए और लापरवाही दिखाने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी होनी चाहिए। निस्संदेह, इन हालातों के चलते ही आम जनता का तंत्र से भरोसा उठता है। यदि सरकारी तंत्र निगरानी व जवाबदेही तय करने में चुस्ती दिखाता तो कई गरीब मरीजों का जीवन बचाया जा सकता था।
आज जीवन रक्षा से जुड़ी चिकित्सा सुविधाएं इतनी महंगी हो चुकी हैं कि हर साल लाखों लोग खर्चीले इलाज कराने के चलते गरीबी के दलदल में धंस जाते हैं। पिछले तीन दशकों में डॉक्टर और बड़े हेल्थकेयर सुविधाएं प्रदान करने वाले और भारत में तृतीय श्रेणी का देखभाल करने की दशा पूरी तरह से बदल गई है, जिसे अमूमन हेल्थकेयर के क्षेत्र में ‘कॉर्पोरेटाइजेशन या निगमीकरण’ का आरोप झेलना पड़ता है। 1980 के उपरांत, वे लोग जो बड़े अस्पताल आदि खोलने को इच्छुक होते थे, उन्हें राज्य द्वारा मुफ़्त जमीन मुहैया करायी जाती थी, और निर्धन वर्ग को मुफ़्त स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के एवज़ में टैक्स में भारी रियायत और फायदे दिए जाते थे। इस वजह से निजी, कॉर्पोरेट, लाभकारी सेवा प्रदाताओं में भारी उछाल आयी। ये अस्पताल स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में बेहतर गुणवत्ता प्रदान करने के लिए नवीनतम ‘स्टेट ऑफ़ द आर्ट’ तक़नीक का संयोजन करती हैं। ये सारे ख़र्च मरीज़ वहन करते हैं।
निस्संदेह, ये औषधि के वैज्ञानिकी विकास के महत्व को कमतर करने का कोई कुत्सित प्रयास नहीं हैं, लेकिन कॉर्पोरेट अस्पतालों मे इलाज की कीमत को ऊंचा करने को लेकर एक तीखी आलोचना का मुद्दा ज़रूर है। दूसरी तरफ, निजी चिकित्सक, चार्ज किये जाने वाले शुल्क के संबंध में बहुत ही कम नियमों के दायरे मे आते हैं। क्लीनिकल स्थापना एक्ट, 2010 के अंतर्गत मरीजों को दिए जाने वाली चिकित्सा को और भी ज्य़ादा पारदर्शी बनाए जाने की अपेक्षा जतायी जाती है, परंतु देशभर के भीतर कई डॉक्टर एसोसिएशन ने इस नियामक के अमलीकरण पर विरोध दर्ज किया।
भारत में इलाज का महंगा होना एक जटिल मुद्दा है, जिसके पीछे स्वास्थ्य बजट में कमी, निजी क्षेत्र की नियामक संस्थाओं का अभाव, ग्रामीण-शहरी स्वास्थ्य सेवाओं में भारी असमानता और दवाओं/जांचों की बेलगाम कीमतें हैं। सरकारी अस्पतालों पर निर्भरता और उनकी सीमित क्षमता के कारण निजी अस्पताल मनमानी करते हैं। भारत स्वास्थ्य सेवाओं पर अपने जीडीपी का बहुत कम हिस्सा खर्च करता है, जिसके कारण सरकारी अस्पताल पर्याप्त बुनियादी ढांचे और डॉक्टरों की कमी से जूझ रहे हैं। साथ ही निजी स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए कोई प्रभावी नियामक संस्था या वैधानिक निकाय नहीं है, जिससे मेडिकल लापरवाही और महंगे इलाज पर अंकुश नहीं लगता।
लेकिन महंगे इलाज पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ.विनय अग्रवाल का कहना है कि डॉक्टरों का वेतन, मेडिकल उपकरणों की कीमत, बिजली खर्च इतने ज्यादा हैं कि अस्पताल प्रशासन वहन करने में लाचार हैं। सरकारी अस्पाल अगर सही तरीके से काम करे तो मरीज निजी अस्पतांलों में जाएंगे ही नहीं। उनका कहना है कि सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी तो है ही एक्स-रे मशीन तक उपलब्ध नहीं है। नतीजा मरीजों को निजी अस्पतालों में इलाज के लिए जाना पड़ता है। डॉ. अग्रवाल का कहना है सभी निजी अस्पतालों में गरीब मरीजों का इलाज किया जाता है। निजी अस्पताल सरकारी दवाब पर नहीं अपनी मर्जी से इलाज करते हैं। डॉ.अग्रवाल कहते हैं सरकार निजी अस्पतालों को किसी भी तरह की सब्सिडी नहीं देती है। बिजली से लेकर प्रोपर्टी टेक्स तक पर सरकार कामर्शियल चार्ज वसूलती है।
हालांकि, आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं से 5 लाख तक का इलाज मिलता है। लेकिन, इन योजनाओं के बावजूद, बहुत से लोग अभी भी अपनी संपत्ति बेचने और महंगे इलाज के कारण गरीबी की रेखा से नीचे जाने को मजबूर हैं। फार्मास्युटिकल और मेडिकल डिवाइस कंपनियों की दवाओं के दामों में भारी अंतर के कारण इलाज महंगा होता है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं के बीच असमानता है, और सरकारी अस्पतालों में भीड़ के कारण लोग निजी अस्पताल में जाने को मजबूर हैं, जहां से महंगी सेवाएं मिलती हैं।
भारत में महंगा इलाज मुख्य रूप से निजी अस्पतालों की बढ़ती निर्भरता, उन्नत तकनीक (रोबोटिक, MRI), ब्रांडेड दवाओं के ऊंचे दाम, और कम स्वास्थ्य बीमा कवरेज के कारण है। लगभग 75% लोग अपनी जेब से खर्च करते हैं, और निजी अस्पतालों में अनियंत्रित शुल्क, अनावश्यक जांच और डॉक्टरों की उच्च फीस इसे और महंगा बना देती है। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की कमी या खराब स्थिति के कारण अधिकांश लोग महंगे निजी अस्पतालों का रुख करते हैं, जो कॉरपोरेट लाभ के लिए काम करते हैं।
विदेशों में गरीब लोगों को इलाज सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज, सरकारी योजनाओं, सब्सिडी वाले बीमा, और एनजीओ की मदद से मिलता है। कई देशों में गरीबों के लिए मुफ्त सरकारी अस्पताल और हेल्थ इक्विटी फंड के माध्यम से इलाज सुलभ कराया जाता है, जहां प्राथमिक और आपातकालीन चिकित्सा मुफ्त होती है। कनाडा, यूके और कई यूरोपीय देशों में, सरकार सभी नागरिकों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का वित्तपोषण करती है, जिससे गरीबों को उच्च गुणवत्ता वाला मुफ्त या नाममात्र का इलाज मिलता है। अमेरिका जैसे देशों में, मेडिकेड जैसी सरकारी योजनाएं गरीबों और कम आय वाले लोगों के लिए स्वास्थ्य बीमा और मुफ्त इलाज प्रदान करती हैं।
अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी और लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के शोधकर्ताओं ने इलाज पर होने वाले खर्च को लेकर एक व्यापक सर्वे किया है। जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (जेएएमए) हेल्थ फोरम में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार दुनिया में करोड़ों लोगों के लिए बेहतर इलाज किसी सपने से कम नहीं। ऊपर से महंगी दवाएं इलाज को आम आदमी की पहुंच से दूर बना देती हैं। इसी कड़ी में किए एक नए अंतराष्ट्रीय अध्ययन ने खुलासा किया है कि कमजोर और मध्यम आय वाले देशों को समृद्ध देशों की तुलना में समान दवाओं के लिए कहीं ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। इससे पहले ही आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहे देशों में लोगों पर इलाज का बोझ काफी बढ़ जाता है।
शोधकर्ताओं ने इस बात का भी खुलासा किया है कि दवाओं की उपलब्धता में भी असमानता की गहरी खाई मौजूद है। उदाहरण के लिए जहां यूरोप और पश्चिमी देशों में दवाएं आसानी से उपलब्ध हैं। वहीं अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में मरीजों को इसके लिए काफी जद्दोजहद करनी पड़ती है। दवाओं की उपलब्धता से जुड़े आंकड़ों को देखें तो जहां कुवैत में महज 41 फीसदी जरूरी दवाएं उपलब्ध थीं, वहीं जर्मनी में यह आंकड़ा 80 फीसदी दर्ज किया गया। भारत में एक बड़ी आबादी के पास हेल्थ इंश्योरेंस नहीं है, जिससे बीमारी के समय पूरा खर्च मरीज को खुद उठाना पड़ता है। निजी अस्पतालों में परीक्षण, बेड के किराए और अन्य सुविधाओं के लिए मनमाना शुल्क वसूला जाता है, जिस पर प्रभावी नियंत्रण की कमी है। इस खतरनाक खेल पर अंकुश तभी लगेगा, जब 'बचाव इलाज से बेहतर है' को जन आंदोलन बनाया जाएगा। सरकार को स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर और सर्वसुलभ बनाने के साथ इस पर भी ध्यान देना चाहिए कि लोगों को स्वस्थ जीवन जीने का माहौल कैसे मिले। लोग स्वास्थ्य के प्रति जागरूक हो जाएंगे तो हम बड़ी जंग जीत लेंगे।
(लेखक के विचार निजी हैं)