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पंजाब: गले मिले, पर क्या गिले भी होंगे दूर?

पनचानबे वर्ष की उम्र तक सक्रिय रहे पंजाब की सियासत के वटवृक्ष प्रकाश सिंह बादल 25 अप्रैल को जिंदगी का...
पंजाब: गले मिले, पर क्या गिले भी होंगे दूर?

पनचानबे वर्ष की उम्र तक सक्रिय रहे पंजाब की सियासत के वटवृक्ष प्रकाश सिंह बादल 25 अप्रैल को जिंदगी का सफर पूरा कर परलोक गमन कर गए। पंजाब के इस ‘बाबा बोहड़’ को श्रद्धांजलि देने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह से लेकर भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, केंद्रीय मंत्रियों समेत देश भर के तमाम दलों के नेताओं और लोगों का सैलाब उमड़ा। बादल की स्मृति में समाचार पत्रों के संपादकीय पन्नों पर प्रधानमंत्री सहित भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं के छपे लेखों के जरिये संकेत देने की कोशिश की गई कि भाजपा और शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के तीन दशक तक चले गठबंधन की जड़ें बहुत गहरी हैं। बादल के निधन पर शोक संवेदना व्यक्त करते अकाली-भाजपाई गले मिलते दिखे। क्या उनके गिले दूर हुए, या भाजपा के साथ उनके गठबंधन की बहाली होगी, पंजाब की सियासत पर बादल के निधन का क्या असर पड़ेगा, बादल के बाद अब कौन जैसे सवाल पंजाब की सियासी फिजाओं में हैं।

श्रद्धांजलि सभा में सुखबीर बादल ने कहा, “मैं बादल साब तो नहीं बन सकता क्योंकि इसके लिए परमात्मा की बख्शीश होनी चाहिए। कोशिश करूंगा कि उनके मिशन पर चलूं।”

प्रकाश सिंह बादल ने अपने पुत्र सुखबीर सिंह को 2008 में शिअद का अध्यक्ष बनाकर संगठन की बागडोर सौंप दी थी। सुखबीर की संगठन पर, खासकर युवा नेताओं पर पकड़ मजबूत हुई है इसलिए नेतृत्व में बदलाव की गुंजाइश नहीं दिखती। हालांकि एक प्रभाव यह भी हुआ कि बादल के समकालीन सुखदेव सिंह ढींढसा जैसे कई टकसाली अकाली नेताओं ने शिअद से किनारा कर अलग दलों का गठन कर लिया। लेकिन वे अपनी सियासी जमीन नहीं बना पाए। परिवार की सियासी राह से अलग भतीजे मनप्रीत बादल का पंजाब पीपल पार्टी का प्रयोग सफल नहीं हुआ, तब उन्होंने कांग्रेस के बाद भाजपा का दामन थाम लिया।

14 दिसंबर 2020 को स्थापना की शताब्दी पूरी करने वाले शिअद के लिए बादल के बाद उभरे शून्य से उबरना कड़ी चुनौती है। बीते दो दशक में एक परिवार की पार्टी में तब्दील हो चुके शिअद में बादल के बराबर का कोई कद्दावर नेता नहीं उभर पाया। सुखबीर बादल भले ही पिता के विनम्र और मिलनसार व्यवहार की विरासत बरकरार रखने में सफल नहीं रहे, पर उनमें पिता की राजनीतिक चतुराई है।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर लालकृष्ण आडवाणी और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रकाश सिंह बादल के साथ सियासी और व्यक्तिगत रिश्ते गहरे रहे। 1997 में पंजाब में जब शिअद-भाजपा गठबंधन की सरकार सत्ता में थी, तब नरेंद्र मोदी पंजाब प्रभारी थे। इस नाते बादल के साथ मोदी के समीकरण सधे हुए रहे। 2013 में मोदी को भाजपा का पीएम चेहरा घोषित किए जाने पर नीतीश कुमार ने एनडीए छोड़ दिया, लेकिन बादल एनडीए के सहयोगी दलों के नेताओं में ऐसे पहले नेता थे जिन्होंने खुलकर मोदी का समर्थन किया।

मोदी कैबिनेट में शिरोमणि अकाली दल से बादल की पुत्रवधु हरसिमरत कौर सात साल कैबिनेट मंत्री रहीं। किसान आंदोलन के दौरान 26 सितंबर 2020 को शिअद ने एनडीए से तीन दशक पुराना गठबंधन तोड़ा और बादल ने विरोध स्वरूप 2015 में मिला पद्मभूषण सम्मान भी लौटा दिया। बाद में भाजपा खेमे में शिअद को लेकर नाराजगी आ गई क्योंकि बादल ने अकाल तख्त पर वह हुकमनामा वापस लेने के लिए दबाव नहीं बनाया जिसमें तख्त ने सिखों को आरएसएस के साथ न जुड़ने की बात कही थी।

भाजपा के शिअद से अलग होने के सुर 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले सीटों के बंटवारे के समय भी उठे थे। विधानसभा की 117 में से 23 और लोकसभा की 13 में से 2 सीटों पर लड़ने वाले भाजपा नेताओं के मन में हमेशा टीस रही कि शिअद की पिछलग्गू होने की वजह से पंजाब में भाजपा अपने दम पर उभर नहीं पाई और चंद शहरों के हिंदू आधार से आगे उसका आधार नहीं बढ़ सका।

बादल को श्रद्धांजलि देने के लिए भले ही भाजपाई नेता उमड़े लेकिन दोनों दलों की अलग हुई सियासी राह का दोबारा मेल फिलहाल मुश्किल है। केंद्रीय मंत्री एवं पंजाब भाजपा के प्रभारी गजेंद्र सिंह शेखावत ने कहा, “शिअद ने हमें छोड़ा है। तीस साल के गठबंधन में छोटे और बड़े भाई की भूमिका में हम रहे। अब गठबंधन बहाली को लेकर चर्चाओं के कयास उन लोगों की तरफ से लगाए जा रहे हैं, जिनका इसमें निजी फायदा छुपा है। शिअद से गठबंधन को लेकर भाजपा में फिलहाल न तो कोई चर्चा है और न ही कोई चिंतन।”

पंजाब भाजपा के अध्यक्ष अश्वनी शर्मा ने भी गठबंधन की संभावना से साफ इंकार करते हुए आउटलुक से कहा, “प्रधानमंत्री का बादल साहब की स्मृति में लेख और पार्टी के पूरे नेतृत्व का श्रद्धांजलि के लिए पंजाब पहुंचने को राजनीति से नहीं जोड़ना चाहिए। भाजपा बगैर किसी गठबंधन के अपने दम पर पंजाब में चुनाव लड़ेगी।”

प्रकाश सिंह बादल के निधन के बाद शिअद के और भी कमजोर होने की आशंका के मद्देनजर 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को इसका लाभ मिल सकता है। इसलिए भाजपा गठबंधन नहीं करेगी। दूसरा, कैप्टन अमरिंदर सिंह समेत कांग्रेस के एक दर्जन से अधिक बड़े चेहरे शामिल होने के बाद पंजाब में भाजपा एक तरह से कांग्रेस की बी टीम बन गई है। इसलिए भी शिअद के साथ गठबंधन उसे कतई मंजूर नहीं होगा।

2007 से 2017 तक लगातार एक दशक तक सत्ता में रहने के बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में 117 में से 15 और 2022 में तीन सीटों पर सिमटा शिअद बहुत कमजोर हो चुका है। शिअद के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि विधानसभा चुनाव में बादल पिता-पुत्र अपनी सीटें भी नहीं बचा पाए। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो गठबंधन की सरकार के दौरान 2015 में श्री गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं के विरोध में बरगाड़ी गांव में धरने पर बैठे सिखों पर पुलिस गोलीबारी से दो लोगों की मौत से सिख समाज में पनपी नाराजगी से पंथक शिरोमणि अकाली दल 2022 के विधानसभा चुनाव तक नहीं उबर पाया। बेअदबी के दोषियों के खिलाफ कार्रवाई न किए जाने को लेकर लोगों की भारी नाराजगी से 70 साल के सियासी सफर में शिअद तीन सीटों पर सिमट गया। प्रकाश सिंह बादल ने पहली बार ऐसी करारी हार देखी।

अपने सियासी करियर में 13 चुनाव लड़ चुके बादल सिर्फ दो विधानसभा चुनाव हारे थे- 1967 में गिद्दड़बाहा में कांगेस के हरचरण सिंह बराड़ से महज 57 वोटों से, जबकि 94 वर्ष की अवस्था में 2022 का चुनाव। यह न केवल उनके जीवन का आखिरी चुनाव रहा बल्कि लंबी से गुरमीत सिंह खुडियां से हार भी 22 हजार से अधिक मतों से हुई। पिछले एक साल से शिअद पंजाब की सियासत में पूरी तरह से हाशिये पर है।

बादल गांव में 4 मई को हुई श्रद्धांजलि सभा में आए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष समेत तमाम प्रमुख सिख तख्तों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी में सुखबीर सिंह बादल ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी। माफी अपनी जगह, लेकिन 2015 में बरगाड़ी बेअदबी के बाद कोटकपुरा पुलिस फायरिंग की जांच अभी जारी है। 25 अप्रैल को मृत्यु के दिन भी प्रकाश सिंह बादल के खिलाफ पंजाब एवं हरियाणा हाइकोर्ट में एक पूरक आरोपपत्र दायर किया गया था। जब तक पंजाब में श्री गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी का मुद्दा जिंदा रहेगा तब तक सुखबीर बादल और शिरोमणि अकाली दल की पंथक सियासत के भीतर ही उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। यह मुद्दा 2024 के लोकसभा चुनाव में भी शिरोमणि अकाली दल का पीछा नहीं छोड़ेगा।

इस मुद्दे पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के निशाने पर शिरोमणि अकाली दल है, भाजपा नहीं। भाजपा के खिलाफ किसान आंदोलन की आग भी ठंडी पड़ चुकी है। इन हालात में सुखबीर बादल के लिए एकमात्र विकल्प पार्टी को जमीनी स्तर पर पुनर्जीवित करना और उस स्थिति तक पहुंचाना होगा जहां वह पंजाब में फिर से भागीदार के रूप में भाजपा के साथ गठबंधन बहाली कर सकें।

सिख केंद्रित पंजाब में पंथक सियासत के सूत्रधार शिरोमणि अकाली दल के लिए अपनी खोई हुई सियासी जमीन को हासिल करना कोई मुश्किल काम नहीं है क्योंकि सिख पंथक सियासत न तो हिंदुत्व काडर वाली भाजपा के वश में है और न ही कांग्रेस और आप के बूते की बात है। प्रकाश सिंह बादल के निधन के बाद शिरोमणि अकाली दल में पंथक सियासत के झंडाबरदार सुखबीर बादल बन सकेंगे या कोई और पंथक चेहरा उभरेगा, यह अभी नहीं कहा जा सकता।  

पांच बार के मुख्यमंत्री के तौर पर प्रकाश सिंह बादल देश की ऐसी पहली शख्सियत रहे, जो अपने समय में सबसे कम उम्र (43) में मुख्यमंत्री बने और सबसे उम्रदराज (90) मुख्यमंत्री भी वही रहे। आजादी से पहले गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के चुनाव से शुरू हुई उनकी पंथक सियासत सात दशक से अधिक के सियासी सफर में सफलता की सीढ़ी बनी।

सियासत के साथ बादल ने पिता रघुराज सिंह से विरासत में मिले खेत-खलिहानों और ट्रांसपोर्ट के कारोबार को भी आगे बढ़ाया। देश की आजादी के पहले से स्थापित बादल परिवार की ट्रांसपोर्ट कंपनी डब्बावली ट्रांसपोर्ट और गजराज ट्रांसपोर्ट की लारियों में सवारी करने से शायद ही कोई पंजाबी छूटा हो। बादल के पुत्र सुखबीर ने ट्रांसपोर्ट कारोबार का विस्तार करते हुए ऑरबिट और इंडो कनेडियन ट्रासंपोर्ट कंपनियां खड़ी कीं। हालांकि सरकारी ट्रांसपोर्ट के समानांतर बादल परिवार का यह कारोबार चुनाव में हार का एक कारण बना। 

बादल अपना पहला चुनाव 1957 में मलोट से कांग्रेस के टिकट पर जीतकर विधानसभा पहुंचे थे। तब महापंजाब के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों के साथ बादल की नहीं बनी, तो वह शिरोमणि अकाली दल में शामिल हुए। 1920 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की टास्क फोर्स के रूप में उपजी देश की दूसरी सबसे पुरानी पार्टी शिरोमणि अकाली दल के संस्थापक अध्यक्ष सरदार सुरमुख सिंह चुब्बल के बाद मास्टर तारा सिंह सरीखे टकसाली नेता के हाथ शिरोमणि अकाली दल की पंजाब की सियासत में पैठ बढ़ी। वर्षों तक पार्टी का नेतृत्व हरचंद सिंह लोंगोवाल, गुरचरण सिंह टोहरा, जगदेव सिंह तलवंडी और सुरजीत सिंह बरनाला सरीखे नेताओं ने किया पर पिछले साढ़े तीन दशकों में बादल परिवार ने शिअद पर अपना दबदबा बना लिया।

1967 में शिरोमणि अकाली दल के टिकट पर पहला चुनाव लड़े प्रकाश सिंह बादल हार गए थे। 1969 में उन्होंने चुनाव जीता और 1970 में पहली बार पंजाब के मुख्यमंत्री बने। गठबंधन की बादल सरकार एक साल बाद ही टूट गई। 1977 में जनसंघ और अन्य दलों के साथ गठबंधन में बनाई सरकार भी करीब पौने दो साल चली। 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली जनता पार्टी सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे। इमरजेंसी के दिनों में बादल जेल में रहे।

1985 में बादल फिर से सरकार बनाने में सफल रहे। लेकिन तीसरी बार फिर उनकी सरकार कार्यकाल पूरा किए बगैर गिर गई। 1997 में चौथी बार उन्होंने सत्ता संभाली और इस बार कार्यकाल पूरा किया। पांचवीं बार 2007 से 2017 तक लगातार दस साल मुख्यमंत्री रह कर बादल ने इतिहास रचा।

कैंसर के इलाज के लिए अलग से सीएम रिलीफ फंड बनाया गया। मुल्लांपुर (न्यू चंडीगढ़) में मेडिसिटी विकसित की जहां स्थापित टाटा कैंसर रिसर्च इंस्टीटयूट का पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उद्घाटन किया।

पक्की नहरों का जाल बिछाने का श्रेय भी बादल को जाता है। हरियाणा के साथ सतलुज यमुना लिंक नहर के पानी के बंटवारे के मसले को उन्होंने कभी सिरे नहीं चढ़ने दिया। 2015 में हरियाणा के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद उनके कहने पर पंजाब के किसानों ने 80 के दशक में इंदिरा गांधी राज में खुदी एसवाइएल को रातोरात पाट दिया। वह कहते थे, “एसवाइएल पंजाब के किसानों के हितों के खिलाफ है। सतलुज का पानी अन्य राज्य के साथ साझा नहीं किया जा सकता।” किसानों को मुफ्त बिजली देने की पहल भी बादल ने की थी क्योंकि वे खुद किसान थे और वही उनका वोट बैंक भी रहे।

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