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जनादेश 2022: राज्य चुनाव तय करेंगे महामहिम

“यूपी-उत्तराखंड में भाजपा की सीटें घटीं तो अपना राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति बनाना होगा...
जनादेश 2022: राज्य चुनाव तय करेंगे महामहिम

“यूपी-उत्तराखंड में भाजपा की सीटें घटीं तो अपना राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति बनाना होगा मुश्किल”

फरवरी और मार्च में पांच राज्यों में जो चुनाव हो रहे हैं, उनके नतीजों का असर इसी साल के मध्य में होने वाले राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनावों पर भी दिखेगा। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का पांच साल का कार्यकाल जुलाई में और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू का अगस्त में खत्म हो रहा है। इनके चुनाव में राज्यसभा और लोकसभा के सांसद तथा राज्यों के विधायक मतदान करते हैं। इस साल कुल 75 राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल खत्म होने वाला है, जिनमें से 73 का कार्यकाल अप्रैल से जुलाई के पहले पखवाड़े तक खत्म होगा। यानी उनका चुनाव राष्ट्रपति चुनाव से पहले ही होगा। राज्यसभा सांसदों का चुनाव भी विधायक ही करते हैं। इस लिहाज से ये विधानसभा चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं।

इन पांचों विधानसभाओं में कुल 690 विधायक हैं, जिनमें सबसे ज्यादा 403 विधायक उत्तर प्रदेश के हैं। भारतीय जनता पार्टी के शासन वाले उत्तराखंड में विधायकों की संख्या 70 है। 2017 में उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में से भाजपा और उसके सहयोगियों ने 325 पर जीत दर्ज की थी। उत्तराखंड में भी उसे 70 में से 57 सीटों पर जीत मिली थी। लेकिन अगर विधानसभा चुनावों में इन दोनों राज्यों में भाजपा को नाकामी मिलती है या सीटें कम आती हैं तो उसके लिए अपने उम्मीदवार को राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति बनाना मुश्किल हो जाएगा।

उत्तर प्रदेश इस लिहाज से भी अहम है क्योंकि यह देश का सबसे अधिक आबादी वाला राज्य है और यहां के हर विधायक के वोट की वैल्यू भी सबसे अधिक है। इस समय प्रमुख राज्यों में पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, केरल, झारखंड, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली में गैर-भाजपा सरकारें सत्ता में हैं। अगर इन पार्टियों ने मिलकर अपना राष्ट्रपति प्रत्याशी खड़ा किया तो भाजपा के लिए जीत दर्ज कर पाना मुश्किल होगा। पिछले राष्ट्रपति चुनाव में शिरोमणि अकाली दल और शिवसेना, भाजपा के साथ थे जो अब उसके खिलाफ हैं। इन दोनों के राज्यसभा में तीन-तीन सांसद हैं। महाराष्ट्र में पहले भाजपा-शिवसेना की सरकार थी, जबकि अब कांग्रेस-राकांपा-शिवसेना सत्ता में है। तमिलनाडु में भी भाजपा विरोधी सरकार बन गई है। छत्तीसगढ़ और राजस्थान भी उसके हाथों से जा चुके हैं।

अभी जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं उनके लिहाज से देखें तो राष्ट्रपति चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश के 11, पंजाब के सात और उत्तराखंड के एक राज्यसभा सांसद का कार्यकाल खत्म होगा। इनके अलावा महाराष्ट्र के छह, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और बिहार के चार-चार, केरल, मध्य प्रदेश और कर्नाटक के तीन-तीन, झारखंड, असम, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ के दो-दो सांसदों का भी कार्यकाल जुलाई से पहले खत्म होना है। बाकी अन्य राज्यों के और कुछ नामित सदस्यों का भी कार्यकाल राष्ट्रपति चुनाव से पहले खत्म होगा। हालांकि नामित सदस्य राष्ट्रपति चुनाव में वोट नहीं डाल सकते हैं।

उत्तर प्रदेश से राज्यसभा की जो 11 सीटें खाली होंगी उनमें से अभी पांच भाजपा के पास हैं। अगर विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा तो इन सीटों को बरकरार रखना भी मुश्किल हो जाएगा। इसलिए भाजपा नेता स्वीकार करते हैं कि राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा बढ़ने से राष्ट्रपति चुनाव में उसके समीकरण बिगड़ सकते हैं। उन्हें राज्यसभा सांसदों की संख्या बढ़ने की उम्मीद तो नहीं है, फिर भी अगर पार्टी मौजूदा संख्या को बरकरार रख पाती है तो वही उपलब्धि होगी।

लोकसभा में तो भाजपा बहुमत में है लेकिन राज्यसभा में अल्पमत में होने के कारण उसे क्षेत्रीय पार्टियों की मदद लेनी पड़ती है। राज्यसभा के 237 सांसदों में से भाजपा के 97 सांसद हैं। एनडीए के सभी सांसदों की संख्या 141 होती है। लेकिन यह संख्या बीजू जनता दल (बीजद) के नौ और तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) के छह सांसदों को मिलाकर बनती है। संसद के शीत सत्र में छह राज्यसभा सांसदों वाली आंध्र प्रदेश की सत्तारूढ़ वाइएसआर कांग्रेस तो भाजपा के साथ दिखी, लेकिन टीआरएस और बीजद ने उससे दूरी बना ली।

टीआरएस सांसदों ने लगभग रोजाना सत्र की कार्यवाही में बाधा डालने की कोशिश की तो बीजद कई मुद्दों पर बाकी विपक्षी दलों के साथ खड़ा दिखा। केंद्र सरकार ने जब मिशनरीज ऑफ चैरिटी के एफसीआरए लाइसेंस का नवीकरण नहीं किया तो बीजद प्रमुख और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने चैरिटी को फंड देने की घोषणा कर दी। हाल ही पार्टी की एक बैठक में उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से यह भी कहा कि हमारा दिल्ली में कोई बॉस नहीं है। अगर भारतीय जनता पार्टी उत्तर प्रदेश में बड़ी जीत दर्ज करने में नाकाम रहती है तो क्षेत्रीय पार्टियों का रुख उसके प्रति और कड़ा हो सकता है। तब शायद विपक्ष का साझा उम्मीदवार ही राष्ट्रपति बने।

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