हाल ही में छत्तीसगढ़ के रायपुर में ऑर्गनाइज़र द्वारा “छत्तीसगढ़ @25 : शिफ्टिंग द लेंस- सिक्योरिटी,प्रोस्पेरिटी एंड स्टेबिलिटी” विषय पर आयोजित परिसंवाद में देश के गृहमंत्री अमित शाह ने भाग लिया। उन्होंने इस कार्यक्रम में अनेक विषयों पर अपनी बात रखी जिसमें देश में नक्सलवाद की समस्या पर रखे गये विचार उल्लेखनीय हैं। उन्होंने भारत में नक्सलवाद के उदय के कारण और इसके पीछे की विचारधारा की भूमिका के बारे में बताया।
उन्होंने कहा पिछले 25 वर्षों में छत्तीसगढ़ ने अभूतपूर्व प्रगति हासिल की है और गत वर्षों में विकास के नए कीर्तिमानों को स्थापित किया है। ये सुधार उस समय हुए जब राज्य का एक बड़ा हिस्सा माओवादी उग्रवाद से प्रभावित था जिसके कारण यहाँ किसी भी प्रोजेक्ट को स्थापित करने में बहुत सी कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता था।
देश के गृहमंत्री ने कहा यदि देश में माओवादी समस्या का सही आंकलन नहीं किया गया तो यह भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक अन्याय होगा। उन्होंने कहा कि माओवाद को केवल विकास या क़ानून व्यवस्था की समस्या मानना ग़लत है।
जब 80 के दशक में माओवादी गतिविधियां शुरू हुईं तब बस्तर से अधिक अविकसित देश में सौ से अधिक ज़िले थे। यदि इस माओवादी हिंसा के पीछे का कारण है विकास की कमी तो बस्तर से अधिक अविकसित ज़िलों में इस प्रकार की हिंसा क्यों नहीं पनपी?
देश में नक्सलवादी हिंसा के पीछे क़ानून व्यवस्था को भी उत्तरदायी नहीं माना जा सकता क्योंकि नक्सलवादी हिंसा के उद्भव से पहले बस्तर की क़ानून व्यवस्था देश के अनेक ज़िलों से अधिक बेहतर थी ।
उन्होंने कहा कि इस माओवादी हिंसा के पीछे मूलतः एक विचारधारा का हाथ है। यदि इसके पीछे माओवाद की विचारधारा न होती तो इसका नाम माओवादी क्यों रखा जाता। वास्तविकता में यह एक ऐसी विचारधारा है जो किसी भी समस्या का समाधान बंदूक से निकालने की बात करती है। ये विचारधारा भारत देश के संविधान की भावना से पूर्णतः विपरीत है। भारत के संविधान की आत्मा यह है कि हर समस्या का समाधान लोकतांत्रिक व्यवस्था के आधार पर संवाद के माध्यम से निकले।
भारतीय समाज में प्राचीन काल से ही संवाद को एक महत्वपूर्ण समाधान माना गया है। हम अपनी पुरातन परंपराओं में मतांतर को भी स्वीकार कर शांति का मार्ग अपनाते हैं।
जटिल से जटिल समस्याओं के निदान के लिए भी हमने सदा ही परिसंवाद और परिचर्चा को समाधान के रूप में चुना है। लेकिन स्वाधीनता के बाद देश में संविधान और लोकतांत्रिक गणतंत्र की स्थापना के बाद भी देश के एक बड़े हिस्से में सशस्त्र क्रांति का उद्भव हुआ जिसने अपने ही देश के लाखों नागरिकों को शिकार बना लिया।
निश्चित ही यह नक्सलवादी आंदोलन देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बनकर उभरा। जिसकी शुरूआत चारू मजूमदार और कानू सान्याल के द्वारा 1967 में नक्सलबाड़ी से की गई। इसकी शुरुआत को लेकर देश में एक ऐसा विमर्श खड़ा किया गया जिसमें ये दिखाया गया कि देश में नक्सलवादी आंदोलन किसानों, मज़दूरों और आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ा जाने वाला एक आंदोलन है ये जल,जंगल और ज़मीन के लिए एक सशस्त्र क्रांति है।
इसलिए एक छोटी सी जगह नक्सलबाड़ी से शुरू हुआ ये हिंसक आंदोलन देश के 11 से अधिक राज्यों और 90 से अधिक ज़िलों तक पहुँच गया था जिसमें छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार,उड़ीसा, मध्यप्रदेश,आन्ध्रप्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्य प्रमुख हैं। ज्ञात है माओवादियों के द्वारा चलाए जा रहे इस आंदोलन का एकमात्र उद्देश्य हिंसा के रास्ते पर चलकर साम्यवादी शासन की स्थापना करना है इसलिए इन्होंने अपने लक्ष्य को सशस्त्र क्रांति के रूप में चुना है।
देश के एक बड़े भूभाग पर इस आतंकवादी नेटवर्क को रेड टेरर के रूप में देखा जाता है जिसमें ख़ास तौर पर आदिवासी क्षेत्रों के भोले भाले नवयुवकों ,महिलाओं और बच्चों को गुमराह करके शामिल किया जाता रहा है।
आदिवासी लोगों के मन में सरकार और व्यवस्था के प्रति एक घृणित मानसिकता का पोषण कर उनके हाथ में हथियार देकर हिंसात्मक कार्यवाही के लिए उकसाया जाता रहा है। एक आंकड़े के अनुसार सन् 2009-2021 के बीच नक्सल आतंकवाद के द्वारा मारे जाने वाले लोगों की संख्या जम्मू कश्मीर के आतंकियों के द्वारा मारे गए लोगों से कहीं अधिक है।
यही नहीं इन माओवादियों के द्वारा सरकार के अनेक विकास कार्यों को बाधित किया जाता रहा है और ढांचागत निर्माण को ध्वस्त किया जाता रहा है जिनमें सड़क,स्कूल और पुल जैसे अनेक बुनियादी ढांचों को ध्वस्त किया जाता है। यदि सच में ही इस हिंसक आंदोलन के पीछे कोई विकास का कारण होता तो इसके आतंकवादी इन ढांचागत निर्माणों को नुक़सान नहीं पहुँचाते।
वो बड़े पैमाने पर सरकार के द्वारा लाए हुए प्रोजैक्ट्स को चलने नहीं देते हैं। इसके पीछे एक सुनियोजित विचारधारा दिखाई पड़ती है जो अपने ही देश को विकास के रास्ते से हटाकर देश में अस्थिरता पैदा करने का प्रयास करती है और देश में शांति को भंग करके देश की आंतरिक सुरक्षा के सम्मुख एक बड़ी चुनौती को पैदा करती है।
भारत सरकार के गृह मंत्रालय के द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार 2004-2025 (नवंबर) तक माओवादी आतंकवाद की हिंसा में 8956 लोग मारे गए जिनमें अधिकतर लोग आदिवासी समुदाय के ही हैं जिन्हें पुलिस का मुखबिर बताकर कठोर यातनाएं दी गयीं और उनकी हत्या कर दी गई।
इससे यह ज्ञात होता है आदिवासियों और गरीबों की लड़ाई का झूठा नाटक करने वाले माओवादियों के द्वारा फैलायी गई हिंसा का सर्वाधिक शिकार आदिवासी और उपेक्षित वर्ग के लोग ही हुए हैं।
माओवादियों के द्वारा अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए चलायी जा रही सशस्त्र क्रांति का सबसे बुरा प्रभाव वनवासी क्षेत्र में रहने वाले लोगों पर ही पड़ा है। इस आतंक का नेटवर्क चलाने वाले लोग हमेशा बच्चों और महिलाओं को आगे कर अपने काम को अंजाम देते हैं। वामपंथी उग्रवाद और इसके हिंसक हमलों से समाज में कितने ही लोगों को असहनीय पीड़ा का सामना करना पड़ा है ।
इस बार के संसद सत्र में केरल के प्रतिष्ठित समाजसेवी और राज्यसभा के सदस्य मास्टर सदानंदन ने सदन में अपनी बात रखते हुए अपने जीवन की सबसे दर्दनाक घटना के बारे में बताया। उन्होंने कहा 1994 में 30 वर्ष की आयु में कम्युनिस्टों के द्वारा उनके ऊपर क्रूर हमला किया गया था और उनके दोनों पैरों को काट दिया गया था आज वो कृत्रिम पैरों के सहारे चलते हैं। उन्होंने सदन के पटल पर अपने कृत्रिम अंगों को दिखाते हुए वामपंथी चरमपंथ के हिंसक चेहरे को उजागर किया।
50 वर्षों से भी अधिक समय से चल रहे इस हिंसक आंदोलन ने अनेक बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया जिसमें आम नागरिकों के साथ-साथ देश के अनगिनत सुरक्षा जवानों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी है।
गुरमीत कँवल अपनी पुस्तक ‘नक्सल वायलेंस द थ्रेट विदिन’ में रेड टेरर के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के बारे में बताते हैं। जिसमें भारत के वामपंथी उग्रवादियों का संबंध नेपाल के उग्रवादियों के साथ ही साथ बांग्लादेश और पाकिस्तान के आतंकियों के साथ भी है। उन्हें इस नेटवर्क से हथियार, ड्रग, फाइनेंस ,ट्रेनिंग और वैचारिक समर्थन भी मिलता है।
लेकिन वर्तमान सरकार और इसके गृहमंत्री माओवादी उग्रवाद के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति को अपनाकर इसके मूल ख़ात्मे के लिए संकल्पबद्ध हैं। पिछले वर्षों में सरकार के द्वारा चलाए गए ‘नक्सल मुक्त भारत’ अभियान के तहत सैकड़ों कुख्यात आतंकवादियों को मारा गया है। जिसमें माडवी हिडमा जैसे एक करोड़ से अधिक इनाम के आतंकवादी भी सम्मिलित हैं।
सरकार के द्वारा देश की आंतरिक सुरक्षा के हित में नक्सल समस्या को ख़त्म करने के लिए बातचीत के स्तर पर भी प्रभावशाली प्रयास किए जा रहे हैं जिसमें आत्मसमर्पण के द्वारा नक्सल आंदोलन से निकले हुए लोगों को सुविधाएँ देकर समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है।
अब तक हज़ारों लोगों ने हथियार छोड़कर आत्मसमर्पण किया है इसमें देवजी तिरूपति जैसे माओवादी संगठन के कमांडर और बड़ी संख्या में महिलाएँ भी शामिल हैं।
देश के गृहमंत्री अनेक मंचों से भारत से वामपंथी उग्रवाद को पूर्णतः समाप्त करने की बात करते हैं। भारत सरकार के गृह मंत्रालय की यह घोषणा है कि मार्च तक देश को पूर्णतः नक्सलवाद से मुक्त कर दिया जाएगा।
आज देश बदलाव के पथ पर अविचल आगे बढ़ रहा है। देश के प्रधानमंत्री ने 2047 तक भारत देश को एक विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प लिया है। ’नक्सल मुक्त भारत’ इस दिशा में एक उत्कृष्ट उपलब्धि के रूप में सुनिश्चित हो और समाज की मुख्यधारा से पीछे छूट गये इस वर्ग की भागीदारी भी इसमें अग्रणी हो, निश्चित ही यह बदलते हुए नये भारत की एक सुंदर तस्वीर होगी।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफ़ेसर हैं, विचार निजी हैं)