Advertisement
19 फरवरी 2024 · FEB 19 , 2024

भारत रत्न: हाशिए के लोगों के नायक

भारतीय राजनीति के प्रतीक-पुरुषों को सत्ता की मर्यादाहीन राजनीति में इस्तेमाल कर लगातार उनकी अवमानना की जा रही
कर्पूरी ठाकुर (24 जनवरी 1924–17 फरवरी 1988)

कर्पूरी ठाकुर के जन्मशती वर्ष में जनवरी 2023 से लेकर अभी तक अलग-अलग जगह बहुत कार्यक्रम हुए। लेकिन मुख्यधारा मीडिया में उनका कवरेज न के बराबर था। सोशल मीडिया पर जरूर कुछ कार्यक्रमों की जानकारी थी। कर्पूरी ठाकुर की शख्सियत, राजनीति और विचारधारा का विवेचन करने वाले लेख और टिप्पणियां भी सोशल मीडिया और लघु पत्रिकाओं में ही प्रकाशित हुए। लेकिन भारतीय जनता पार्टी-नीत एनडीए सरकार ने जैसे ही कर्पूरी ठाकुर के जन्मशती वर्ष की समाप्ति पर मरणोपरांत उन्हें भारत-रत्न देने की घोषणा की, वे मुख्यधारा मीडिया में ‘समाजवादी आइकान’ बन गए!

अंग्रेजी अखबारों ने बढ़-चढ़ कर उनके बारे में रिपोर्ट, लेख और संपादकीय प्रकाशित किए। सरकार के इस औचक फैसले पर कई नेताओं और पार्टियों की प्रतिक्रियाएं भी मीडिया का विषय बनीं। इन सब में कर्पूरी ठाकुर को भारत-रत्न देने के फैसले के पीछे सरकार की ‘राजनीति’ का उल्लेख और अनुसंधान हुआ। कहा गया कि सरकार ने विपक्ष की जाति-जनगणना के कार्ड को भोथरा करने के लिए भारत-रत्न का दांव चला है। यानी राम-मंदिर निर्माण और उद्घाटन के साथ लबालब भरे ‘कमंडल’ में ‘मंडल’ को डुबोने का करतब कर्पूरी ठाकुर को भारत-रत्न देकर किया गया है। उन्हें भारत-रत्न देकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ/भाजपा ‘सिद्ध’ करना चाहते हैं कि ‘हिंदुत्व’ और सामाजिक न्याय में कोई विरोध नहीं है। हालांकि, यह सरकार का एक चुनावी पैंतरा-भर है, क्योंकि केंद्र सरकार ने पूरे जन्मशती वर्ष के दौरान याद करने की भी जहमत नहीं उठाई।

भारत-रत्न की राजनीति ने बिहार की महागठबंधन सरकार को भी चपेट में ले लिया है। वहां कर्पूरी ठाकुर की ‘विरासत के दावेदारों’ में घमासान हो गया है। अत्यंत पिछड़े वर्गों (ईबीसी) के ‘इंजीनियर’ नीतीश कुमार ने यह कहते हुए कि “ठाकुर ने कभी परिवारवादी राजनीति नहीं की”, राजद की परिवारवादी राजनीति पर तंज कस दिया। साथ ही “मैंने खुद भी कभी अपने परिवार को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया” कह कर खुद को कर्पूरी ठाकुर का असली वारिस भी जता दिया। वारिस होने की दावेदारी की मजबूती के लिए उन्होंने यह भी कह डाला कि उन्होंने कर्पूरी के बेटे रामनाथ ठाकुर को राज्यसभा का सदस्य बनाया। उन्होंने भाजपा को भी संदेश दे दिया कि ईबीसी वोटों पर उन्हीं का पेटेंट है!

अपने नायक के साथः लोकनायक जयप्रकाश के साथ कर्पूरी, चंद्रशेखर और अन्य

अपने नायक के साथः लोकनायक जयप्रकाश के साथ कर्पूरी, चंद्रशेखर और अन्य

जदयू और राजद में पिछले कुछ समय से कश्‍मकश चल रही थी। इसके अलावा नीतीश खुंदक में थे कि उनके जैसे ‘सबसे ऊंचे कद के नेता’ होते हुए ‘इंडिया’ गठबंधन ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना तो दूर, गठबंधन का अध्यक्ष तक नहीं बनाया। 2019 के लोकसभा चुनावों के पहले भी उन्हें अपेक्षा थी कि कांग्रेस आगे बढ़ कर उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार स्वीकार करेगी। ऐसा न होने पर वे महागठबंधन छोड़ वापस भाजपा के साथ चले गए थे। 28 जनवरी को फिर पलटी मारते हुए वे कर्पूरी ठाकुर की विरासत की गठरी उठा कर भाजपा के साथ आ गए हैं। दिलचस्प है कि भारत-रत्न की घोषणा से चर्चा में आए कर्पूरी ठाकुर मीडिया से बाहर हो गए और नीतीश कुमार केंद्र में आ गए। अखबारों के संपादकीय और लेख कर्पूरी ठाकुर को छोड़ कर मंडल-कमंडल की राजनीति और उसके विभिन्न प्रकारों (वेरिएशंस) पर प्रकाश डाल रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों ने मान लिया है कि सोशल जस्टिस की राजनीति का भविष्य कर्पूरी ठाकुर की समाजवादी विचारधारा के साथ नहीं, ‘हिंदुत्व’ की राजनीति के साथ है जो ‘विकास’ और ‘गुड गवर्नेंस’ का एजेंडा ले कर चलती है। ऐसे में यह सवाल पूछना मुनासिब होगा कि कारपोरेट घरानों की गोद में बैठी सांप्रदायिकता, जातिवाद, व्यक्तिवाद और परिवारवाद की सत्ता-लोलुप राजनीति के गर्भ से निकला भारत-रत्न कर्पूरी ठाकुर का सम्मान बढ़ाता है या मरणोपरांत उनकी गरिमा का क्षय करता है? दरअसल, यह प्रकरण फिर स्पष्ट करता है कि भारतीय राजनीति के प्रतीक-पुरुषों को सत्ता की मर्यादाहीन राजनीति में इस्तेमाल कर लगातार उनकी अवमानना की जा रही है।

यहां राजनेता कर्पूरी ठाकुर की थोड़ी चर्चा अप्रासंगिक नहीं होगी। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी समाजवादी नेता थे। उनकी जितनी पैठ राजनीति और समाजवादी विचारधारा में थी, उतनी ही साहित्य, कला और संस्कृति में। उनका अपना प्रशिक्षण समाजवादी आंदोलन और विचारधारा में हुआ था। फुले, आंबेडकर और पेरियार समेत सभी परिवर्तनकारी विचारों को वे आत्मसात कर चलते थे। लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, नागरिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार जैसे मूलभूत आधुनिक मूल्यों के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता थी। सादगी के साथ अपने पद का परिवार और मित्रों के लिए किंचित भी फायदा न उठाना उनकी खूबी थी। उनका स्वाभिमानी व्यक्तित्व गांधीवादी-समाजवादी धारा से भी जुड़ा था। कर्पूरी ठाकुर अति-पिछड़ी और संख्या में अल्प नाई जाति से थे। बावजूद उन्होंने अपनी स्वतंत्र राजनैतिक हैसियत बनाई।

कर्पूरी ठाकुर स्वतंत्रता आंदोलन और समाजवादी आंदोलन की पैदाइश थे। उन्होंने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत कॉलेज की पढ़ाई छोड़ कर भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सेदारी से की थी। वे 1952 के चुनावों में बिहार विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए थे। मृत्युपर्यंत तक उन्होंने लगातार विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की। 1977 में समस्तीपुर से लोकसभा चुनाव जीता। पूरे राजनैतिक करिअर में केवल 1984 का लोकसभा का चुनाव हारे थे। बिहार विधानसभा में उन्होंने लंबे समय तक नेता विपक्ष की भूमिका निभाई। 22 दिसंबर 1970 से 2 जून 1971 और 24 जून 1977 से 21 अप्रैल 1979 तक वे दो बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने बिहार में अत्यंत पिछड़े वर्गों, अन्य पिछड़े वर्गों, महिलाओं और आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए क्रमश: 18, 12, 3, 3 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया था। जिसके लिए सवर्ण सामंती मानसिकता के लोगों, खास कर जनसंघ वालों की ओर से उन्हें अपमानजनक भाषा का सामना करना पड़ा था।   

उन्होंने हमेशा वंचित समूहों को आगे लाने का प्रयास किया, लेकिन वे खुद को पूरे बिहार की जनता का प्रतिनिधि मानते थे। उनकी ‘छोटी’ जाति सहित बहुत-सी बाधाएं उनके रास्ते में आती रहीं, लेकिन उन्होंने अपने राजनैतिक संघर्ष और विचारधारात्मक प्रतिबद्धता से उन बाधाओं का मुकाबला किया। कभी सांप्रदायिक जातिवाद और जातिवादी अस्मितावाद का सहारा नहीं लिया। लिहाजा, वे किसी जाति-विशेष के नेता नहीं, ‘जननायक’ के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उनके व्यक्तित्व की इस खूबी को जाबिर हुसैन ने अपनी कविता ‘भीड़ से घिरा आदमी’ में बखूबी चित्रित किया है। उन पर लिखी गई कई कविताओं में सर्वश्रेष्ठ यह कविता बताती है कि कर्पूरी ठाकुर का व्यक्तित्व क्षेत्र, जाति और धर्म से बंधा नहीं था। देश से भी वह बस उतना ही बंधा था कि उपनिवेशवादी गुलामी से उसकी मुक्ति हो; ताकि बहुपरती सामंतवादी-वर्चस्ववादी व्यवस्था को बदल कर बराबरी का समाज कायम हो।

स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान खुद कर्पूरी ठाकुर ने  कविता लिखी थी, “हम सोए वतन को जगाने चले हैं/ हम मुर्दा दिलों को जिलाने चले हैं।/ गरीबों को रोटी न देती हुकूमत,/ जालिमों से लोहा बजाने चले है।/ हमें और ज्यादा न छेड़ो, ऐ जालिम!/ मिटा देंगे जुल्म के ये सारे नजारे।/ या मिटने को खुद हम दीवाने चले हैं/ हम सोए वतन को जगाने चले हैं।’’ यह कविता एक समय समाजवादी आंदोलन के संघर्ष में प्रभात फेरी का गीत बन गई थी। डॉक्टर लोहिया की यह स्थापना कि जातियां शिथिल होकर वर्गों में परिणत हो जाती हैं और वर्ग संघटित होकर जातियों का रूप धारण कर लेते हैं, कर्पूरी ठाकुर की जाति और वर्ग के सवाल की समझ को व्यावहारिक स्तर पर निर्देशित करती है। सामाजिक न्याय के नाम पर सामंती शैली में परिवारवादी राजनीति करने वाले नेता जब खुद को कर्पूरी ठाकुर की विरासत का वाहक बताते हैं, तो उनका अवमूल्यन ही होता है!

राजनीति में दलित, आदिवासी, पिछड़ों, महिलाओं और गरीब मुसलमानों को राजनीति में आगे लाने की लोहिया की पेशकश देश की सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक-सांस्कृतिक संरचना को हमेशा के लिए बदल डालने का एक युगांतरकारी विचार था। लोहिया ने इन हाशिये पर स्थित समुदायों के दिमाग के वि-ब्राह्मणीकरण (डि-ब्राहमणाईजेशन) और वि-औपनिवेशीकरण (डि-कोलोनाईजेशन) की आशा की थी। क्योंकि यह दिमाग पुराने ब्राह्मणवादी और नए उपनिवेशवादी मूल्य-विधान से बहुत हद तक एक मुक्त क्षेत्र था। इस रूप में वह ‘दिमाग’ सांप्रदायिक फासीवाद और पूंजीवादी साम्राज्यवाद की स्थायी काट हो सकता था। लेकिन युगांतर उपस्थित करने की संभावनाओं से भरी लोहिया की इस पेशकश को सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले नेताओं ने फूहड़ जातिवाद में घटित कर दिया; और उसे सांप्रदायिक फासीवाद और पूंजीवादी साम्राज्यवाद की सेवा में लगा दिया। पिछड़े/दलित नेताओं में अकेले कर्पूरी ठाकुर ने अपने राजनीतिक कर्म में लोहिया की आशा को अपने व्यक्तित्व और राजनैतिक कर्म में फलीभूत किया। आशा की जानी चाहिए कि उनकी प्रासंगिकता के इस सबसे महत्वपूर्ण आयाम को भारत-रत्न की राजनीति में ओझल नहीं होने दिया जाएगा।

(लेखक दिल्ली विवि में प्रोफेसर और समाजवादी आंदोलन से जुड़े रहे हैं। विचार निजी हैं)