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19 फरवरी 2024 · FEB 19 , 2024

पुस्तक समीक्षा: यारों ने कितनी दूर बसाई हैं बस्तियां

संपूर्ण यादों का एल्बम
संस्मरण विधा पर पुस्तक

वरिष्ठ कवि-पत्रकार, सिने-समीक्षक प्रताप सिंह ने अपनी नवीनतम पुस्तक ‘उजाले उनकी यादों के’ माध्यम से एक लंबे अंतराल के बाद संस्मरण जैसी विधा को जीवंत बना दिया है। उनकी इस पुस्तक में गायिका रेशमा, प्रमुख कवि त्रिलोचन- विष्णु खरे, चित्रकार सूरज घई – महिंदर सिंह, पत्रकार राधेश्याम यादव – अनंत डबराल, संपादक प्रभाष जोशी – जगदीश चंद्र, कथाकार क्षितिज शर्मा, नाटककार राजेन्द्र पांडे, आलोचक डॉ. कृष्णदत्त पालीवाल, सिनेमा को समर्पित अनिल साहरी तथा रनिंग कमेंट्री के बादशाह मेलविल डिमेलो जैसी प्रतिभाओं को जिस तटस्थता और आत्मीयता से याद किया गया है वह काबिल-ए- जिक्र है। कुश्ती-कला के दो विख्यात गुरुओं को भी उनकी गरिमा और आभा के अनुरूप याद किया गया है। इस नाते इस संपूर्ण रचनाशीलता को यादों का एल्बम भी कहा जा सकता है।

रेशमा के तनहाई भरे गायन को लेखक बड़ी ही स्पर्शी भाषा में इस प्रकार व्यक्त करता है। “कोई-कोई सुर दरवेशी-रंग लेकर आता है और वीराने में नया जीवन रचता है। वीराने में ही सधी-फूटी आवाज में बसी आत्मा की बरी (मुक्त) किलकारियां हीं। तेरह चौदह साल की बंजारन रही वही रेशमा और उसी ने वीराने के अलम (दुख) और तनहाई  को गाया अपने मुक्त गीतों में।”

खांटी पत्रकार अनंत डबराल और आर एस यादव, दोनों के अभावग्रस्त व संघर्ष भरे सुदामा-जीवन को जिस सूरत से याद किया गया है वह खुदनवीसी से लिखी उनकी दास्तान मालूम होती है।

विष्णु खरे को लेखक ने गैर-रोमानी कवि और अहम सिने-पारखी के रूप में याद किया है। बहुत खरी और आत्मीय-आलोचना के साथ! खरे जी के बारे में वह एक जगह लिखते हैं, “खरे जी बहुविद्याग्राही-प्रतिभा के धनी थे इसलिए चिरपरिचित, विकट, आजमाई अन्वेषित विद्या में भी उनकी अनुकूलता, चुप्पी और प्रतिकूलता बिफर कर सामने आती थी। जानकारियों का अंबार लगाकर, किसी को भी ‘दोयम’ या ‘दृष्टिवान’ सिद्ध करना भी उन्हें आता था। विश्व-सिनेमा हो या भारतीय (बंबईया) सिनेमा, उनकी समीक्षा और जानकारियां उसे (अपनी नजर से) दरका देने का भी पूरा दमखम रखती थीं। बेशक, कभी-कभार त्रिलोचन जी के अंदाज की याद दिलाते हुए ‘कहीं के कहीं’ भी पहुंच जाते थे।’ जनपद के किसानी-कवि और सॅानेट में अग्रणी त्रिलोचन को “दूसरों के कविगुरु उतने मेरे" कहकर संबोधित किया गया है।

हिंद केसरी मास्टर चंदगीराम और गुरु हनुमान पर जिस अंदाज से लिखा गया है उसको पढ़कर पहले वाली जोरावर-दिल्ली में होने वाली बड़ी-जोड़ की कुश्तियां और नामी अखाड़ों की तस्वीरें ‘कलाई-पकड़’, ‘ढाक’, ‘किताब’, ‘कमर-पेटा’ और ‘सक्खी’ व ‘कला-जंग’ जैसे प्रमुख दांव-पेंचों की जीवंतता के साथ आंखों के सामने नाच उठती हैं। इन दोनों वृत्तांतों को कुछ इस कदर और डिटेल्स के साथ बयान किया है कि लेखक की उन वक्तों की स्मरण-शक्ति की भी दाद देनी होगी! जादू बयानी का यह आलम लेखों में होने का कारण लेखक का स्वयं पहलवानी के दांव-पेंच और कुश्तियों से वाकिफ होना रहा होगा।   

रेशमा, मास्टर चंदगीराम, गुरु हनुमान, विष्णु खरे और प्रभाष जोशी के संस्मरण विस्तार पा गए हैं। अतिशय बयान संस्मरणों की शैली को पत्रकारिता की छाया से ढक देते हैं।

सूरज घई, राजेंद्र पांडे, श्याम ‘निर्मम’, अनिल साहरी, महेंद्र कार्तिकेय की कलाओं की कड़ी कारीगीरी, उनकी जिंदगी के भिन्न खाकों और विवेकशीलता पर खूब गौर किया गया है। विभिन्न कला-अनुशासनों से सराबोर और जुदा प्रकृति के लेखक-कलाकार, आलोचक-पत्रकार, गीतकार-शाइर को चुन कर और एक ही किताब में, उन सब पर जिस खूबसूरती से सहज-बयानी से लेखक ने उन्हें पाठको के सम्मुख उतारा है, उस के लिए लेखक साधुवाद के पात्र हैं। पुस्तक में डॉ. निदारिया के बनाए रेखांकन भी सजीव हो उठे हैं!

उजाले उनकी यादों के

प्रताप सिंह

प्रकाशक | विजया बुक्स

पृष्ठः 184 |

मूल्य: 450