राज्य के गठन के बाद से केरलम 15 विधानसभाएं चुन चुका है और अब 16वीं विधानसभा के लिए वोटिंग 9 अप्रैल को होगी। नतीजे 4 मई को निकलेंगे। ये चुनाव राजनैतिक रूप से भी बेहद अहम हो सकते हैं, क्योंकि नतीजे राज्य के सामाजिक और राजनैतिक भविष्य की दिशा तय कर सकते हैं। दशकों से यहां की राजनीति दो प्रमुख गठबंधनों माकपा के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) और कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) के बीच घूमती रही है। राज्य में भाजपा अब तक सिर्फ एक विधानसभा सीट जीत पाई है। हालांकि, हाल के चुनावों में लगातार बढ़ते वोट शेयर के साथ पार्टी और एनडीए को उम्मीद है कि इस बार वे इस चक्र को तोड़ पाएंगे।
केरलम में दशकों से बारी-बारी एलडीएफ और यूडीएफ के बीच सत्ता बदलती रही है, लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ ने दोबारा सत्ता में आकर इस पैटर्न को तोड़ दिया। विजयन का पहला कार्यकाल कई चुनौतियों से भरा था। उनके पहले कार्यकाल में राज्य में दो विनाशकारी बाढ़ के साथ कोविड-19 महामारी भी आई, जिसमें हजारों लोगों की जान चली गई। कई जानकारों का मानना है कि उन आपदाओं के दौरान सरकार के कामयाब कामकाज से एलडीएफ को सत्ता में वापसी में मदद मिली। 140 सदस्यीय विधानसभा में फिलहाल एलडीएफ के 95, यूडीएफ के 41 विधायक हैं। 2016 में, एलडीएफ के 91 और यूडीएफ के 41 विधायक थे और एनडीए को एक सीट मिली थी।
पिछले चुनाव में जीत से माकपा को पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में मिली करारी हार के बाद राष्ट्रीय मंच पर अपनी उपस्थिति बनाए रखने में मदद भी मिली। कभी तीन राज्यों की सत्ता में रहे वामपंथी दल अब काफी हद तक केरलम तक सीमित रह गए हैं। इसलिए एलडीएफ के लिए राज्य में जीत दोहराना राष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।

भाजपा में शामिल होते पूर्व कांग्रेस प्रदेश महासचिव
कांग्रेस के लिए भी दांव उतने ही ऊंचे हैं। राज्य में एक दशक से सत्ता से बाहर रहने के बाद पार्टी को अपनी संभावनाएं बनाए रखने के लिए जीत की सख्त जरूरत है। भाजपा की अपने आधार के विस्तार की आक्रामक कोशिशों के मद्देनजर कांग्रेस के अंदरूनी सूत्र भी मानते हैं कि पार्टी संगठन को बरकरार रखने के लिए जीत से कम पर बात नहीं बनेगी। इसके अलावा, कांग्रेस इस बार हारती है, तो उसके कुछ सहयोगी छिटक सकते हैं। उसमें प्रभावी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग सहित अन्य पार्टियां भी कांग्रेस के साथ अपने लंबे समय से गठजोड़ पर सोचने को मजबूर हो सकते हैं। यानी अलग-अलग वजहों से दोनों प्रमुख मोर्चों के लिए जीत जीवन-मरण का प्रश्न है।
एलडीएफ की चुनौतियां
सत्ता संभालने के बाद से पिनराई सरकार की केंद्रीय प्राथमिकता जमीनी विकास ही रही है। उनके आलोचकों के मुताबिक, सरकार कुछ बुनियादी वामपंथी प्रतिबद्धताओं से किनारा करके व्यावहारिक रवैया अपना रही है। उसका जोर बुनियादी ढांचे के विकास और पूंजी निवेश पर है। सो, सरकार विकास के अपने रिकॉर्ड को प्रमुख चुनावी मुद्दा बना रही है।
लेकिन विकास के इस रिकॉर्ड के अलावा एलडीएफ सरकार कई आरोपों और राजनैतिक चुनौतियों से घिरी हुई है। उसमें सबरीमला में सोने की चोरी में पार्टी नेताओं की कथित संलिप्तता, भाई-भतीजावाद के आरोप और कुछ पुलिस अधिकारियों तथा संघ परिवार के बीच सांठगांठ के दावे शामिल हैं। इसके अलावा सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के कामकाज को लेकर भी सरकार की आलोचना हुई है। उच्च शिक्षा को लेकर भी सरकार पर हमले हो रहे हैं। आलोचकों का मानना है कि राज्य में उच्च शिक्षा की स्थिति अच्छी नहीं है, यही वजह है कि उच्च शिक्षा के लिए राज्य के युवा विदेशों में पलायन कर रहे हैं। साथ ही माकपा के भीतर संगठनात्मक मुद्दों ने सत्ताधारी मोर्चे पर भी दबाव बढ़ा दिया है।
विपक्ष के दांव
कांग्रेस के लिए चुनाव न केवल केरलम में, बल्कि पार्टी की राष्ट्रीय स्थिति के लिहाज से भी करो या मरो की लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है। राहुल गांधी और प्रियंका के वायनाड से लोकसभा चुनाव लड़ने के फैसले से समझा जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व केरलम को महत्वपूर्ण राजनैतिक आधार के रूप में देख रहा है। लेकिन पार्टी गुटबाजी से जूझ रही है। प्रभावी नेताओं के बीच होड़ ने संगठन के भीतर तालमेल की कमी को उजागर कर दिया है। पार्टी पर टिकट बंटवारे को लेकर भी भारी दबाव है। कई वरिष्ठ नेता अपने समर्थकों के लिए टिकटों पर दबाव बना रहे हैं। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष तथा सांसद के. सुधाकरन विशेष रूप से सक्रिय हैं।

पुथुग्या यात्रा में राहुल
इन चुनौतियों के बावजूद, कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूडीएफ आत्मविश्वास से भरा लगता है। यह भरोसा दिसंबर में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में मिली भारी जीत से बना है। उन चुनावों में ग्रामीण निकायों के अलावा कई निगमों में ज्यादातर सीटें हासिल की थीं। यूडीएफ नेताओं का तर्क है कि ये नतीजे लोगों में सत्ता-विरोधी भावना के उभरने का संकेत हैं।
अलग-अलग न्यूज चैनलों के चुनावी सर्वे में मुकाबला कड़ा होने की संभावना जताया गया है। कुछ राजनैतिक जानकारों का कहना है कि भले सत्ता-विरोधी लहर बहुत मजबूत न हो, लेकिन मतदाताओं के कुछ तबकों में मौजूदा शासन से ऊब जरूर दिखाई दे रही है।
एनडीए के लिए क्या?
भाजपा केरलम में अब तक सिर्फ 2016 में नेमोम विधानसभा सीट पर ही जीत दर्ज कर पाई थी। लेकिन 2021 में पार्टी इस सीट को बरकरार नहीं रख पाई और माकपा ने उसे वापस छीन लिया। हालांकि नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से राज्य में लोकसभा चुनावों में भाजपा का वोट शेयर लगातार बढ़ा है। लेकिन पार्टी विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करने में नाकाम रही है। यह रुझान 2016 और 2021 दोनों चुनावों में देखने को मिला। 2024 के लोकसभा चुनावी आंकड़ों के अनुसार, भाजपा करीब 11 विधानसभा क्षेत्रों में आगे थी। हाल में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में पार्टी तिरुवनंतपुरम नगर निगम जीतने में कामयाब रही, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनावों की तुलना में उसका वोट शेयर कम हो गया। फिर भी, इस बार पार्टी को कम से कम तीन से पांच सीटें जीतने की उम्मीद है।
मुख्य समीकरण
केरलम में कुल मतदाताओं में करीब 48 प्रतिशत अल्पसंख्यक मतदाता हैं और राज्य की राजनीति में उनकी भूमिका निर्णायक बनी हुई है। मुस्लिम मतदाताओं का झुकाव मुख्य रूप से यूडीएफ की ओर रहा है, जिसकी एक वजह ‘इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग’ की मौजूदगी है।
ईसाई मतदाता दूसरा महत्वपूर्ण वर्ग है। उसमें एक तबके का झुकाव लोकसभा चुनावों के दौरान, खासकर मध्य केरलम में कुछ हद तक भाजपा की ओर दिखा था, लेकिन स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों से संकेत मिला कि इन का बड़ा हिस्सा शायद वापस यूडीएफ की ओर लौट आया है। विपक्ष का आत्मविश्वास काफी हद तक इसी रुझान पर टिका हुआ है।
बहरहाल, चुनाव के नतीजे इस पर निर्भर करेंगे कि एलडीएफ अपनी बहुप्रचारित विकास परियोजनाओं और कल्याणकारी योजनाओं के असर को सत्ता-विरोधी भावना पर हावी कर पाता है या नहीं। नतीजे चाहे जो भी हो, वाम मोर्चा या यूडीएफ कोई भी जीते केरलम की सियासत काफी हद तक बदल सकती है और उसके अक्स केंद्र में भी दिख सकते हैं।