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प्रथम दृष्टि: सबक के सवाल

जिस दुर्घटना में लगभग 275 निर्दोष लोग काल के गाल में समा जाएं, उस दुर्घटना से सबक सीखने की जरूरत है। लेकिन क्या सबक सीखा जाएगा?
दुर्घटनाओं के बाद महज जांच कमेटी बैठा देने से किसी सरकार की जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती है

आधुनिक विकास का पुल-पुलिया को प्रतीक समझा जाता है। यह नदियों के दो किनारों को जोड़ सकता है, खाइयों को पाट सकता है और शहरों को दमघोंटू ट्रैफिक से निजात दिला सकता है। आज के दौर में जिस शासक-प्रशासक ने जितने पुल बनाए, उसे विश्वकर्मा और विशेश्वरैया जैसी उपाधि मिली। लेकिन, उसी दौर की यह विडंबना भी है कि पुल-पुलिया को भ्रष्टाचार का भी प्रतीक समझा जाता है। विकास के नाम पर बनाए गए इन पुलों के नाम पर टेंडर के आवंटन से लेकर उद्घाटन समारोह के रिबन कटने तक आवंटित राशियों की कितनी बंदरबांट होती है, यह जानने के लिए किसी शरलॉक होम्स को न्योता देने की जरूरत नहीं है। आस-पड़ोस के खोजी पत्रकार (अगर इस दुर्लभ प्रजाति के एकाध नुमाइंदे अब भी बचे हों!) ही यह बताने के लिए काफी होंगे। नदियों पर पुल बनाना हो या रेलवे ट्रैक के ऊपर, शहरों में फ्लाइओवर का निर्माण हो या रिवरफ्रंट बनाना हो, इन सबके लिए बड़ी राशि की जरूरत होती है। जाहिर है, आवंटित राशि जितनी बड़ी होती है, भ्रष्टाचार का स्वरूप उतना ही व्यापक होता है।

हमारे यहां वर्षों से कमीशनखोरी की ऐसी व्यवस्था बनी हुई है कि इस तरह के प्रोजेक्ट में भ्रष्टाचार का व्याप्त होना सामान्य समझा जाता है। पिछले कुछ दशकों में इस व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के नाम पर कुछ कवायद जरूर हुई है। निविदा के आवंटन का स्वरूप तक बदला गया है। बिहार में किसी समय सभी सरकारी निविदाओं पर बाहुबलियों का कब्जा होता था और उन्हें अपने नाम करवाने के लिए दफ्तरों के भीतर खुलेआम खून-खराबा तक होता था। ऑनलाइन टेंडर का प्रावधान होने के बाद कुछ बदलाव आया और उम्मीद की गई कि भविष्य में भ्रष्टाचार पूरी तरह खत्म नहीं, तो कम से कम उस पर अंकुश जरूर लगेगी। लेकिन क्या ऐसा हुआ?

बिहार में इसी सप्ताह गंगा नदी पर 1,710 करोड़ रुपये की लागत से बन रहा एक विशाल पुल अपने उद्घाटन के पांच-छह महीने पूर्व ध्वस्त हो गया। इसके बावजूद इस घटना पर उतना आश्चर्य नहीं हुआ जितना होना चाहिए था। ऐसा लगा मानो यह तो होना ही था। दरअसल मात्र 14 महीने पूर्व यही निर्माणाधीन पुल एक बार और ढह गया था। उस वक्त दलील दी गई कि तेज आंधी के कारण पुल ढह गया। भागलपुर जिले में बन रहे सुल्तानगंज-अगुवानी ब्रिज का शिलान्यास 2014 में किया गया था। उस समय कहा जा रहा जा रहा था कि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले उसका उद्घाटन कर दिया जाएगा। पिछले दिनों अनुमान लगाया जा रहा था कि अगले लोकसभा चुनाव के पहले उसे इस साल दिसंबर तक जनता को समर्पित कर दिया जाएगा। लेकिन, नौ साल बाद इस पुल के गंगा की गोद में जाने के बाद कुछ कहा नहीं जा सकता है कि यह प्रोजेक्ट कब पूरा होगा। अब इसे नए सिरे से बनाने की जरूरत हो सकती है। जैसा कि आम तौर पर होता है, पुल के ध्वस्त होने के बाद सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष के बीच कटाक्ष और आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला शुरू हो चुका है। जांच करने की बात हो रही है, पुल बनाने वाली कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने की मांग उठ रही है, दोषियों को सजा देने की बात तो स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव कह रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि पिछले साल इस पुल के ढहने के बाद क्या कार्रवाई हुई? अगर जांच हुई तो उसका क्या नतीजा निकला? क्या पुल बनाने की प्रक्रिया में वाकई गुणवत्ता के साथ समझौता किया गया? अगर इतने बड़े पुल का डिजाइन ही गलत था, जैसा दावा किया जा रहा है, तो उसे किसने पास किया और उसके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? क्या पिछले वर्ष की घटना के बाद बिहार सरकार को त्वरित कार्रवाई करनी चाहिए थी, खासकर तब जब मामला विधानसभा में उठा था? ये सारे सवाल हैं जिनके उत्तर राज्य की जनता को जानने का अधिकार है, विशेषकर पुल के आसपास रहने वाले स्थानीय लोगों को, जो इस पुल के बनने का ख्वाब वर्षों से देख रहे थे।

दुर्घटनाओं के बाद महज जांच कमेटी बैठा देने से किसी सरकार की जिम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती है। उस जांच के क्या नतीजे आए और दोषियों पर क्या कार्रवाई हुई, यह जानना ज्यादा जरूरी है। अगर ऐसा नहीं होता है तो इस तरह की दुर्घटनाओं को रोकना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन होगा। कोई तो जिम्मेदार होगा। यह बात हर जांच पर लागू होती है। ओडिशा की भयावह ट्रेन दुर्घटना के हर पहलू की जांच का क्या नतीजा निकलता है, उसे भी जानना जरूरी है। वह मानवीय भूल थी या या तकनीकी, इसे समझना और समझाना होगा। जिस दुर्घटना में लगभग 275 निर्दोष लोग काल के गाल में समा जाएं, उस दुर्घटना से सबक सीखने की जरूरत है ताकि भविष्य में लोग सचेत रहें। इस तरह की दुर्घटनाओं को रोका तो नहीं जा सकता लेकिन उन्हें रोकने के लिए यथासंभव उपाय किए जा सकते हैं। अगर तकनीक की मदद से दो ट्रेनों के टक्कर को रोकना संभव है, तो उसे प्राथमिकता के आधार पर हर रूट पर लागू किया जाना चाहिए। देश की जीवनरेखा कही जाने वाली भारतीय रेल के लिए यात्रियों की सुरक्षा से अधिक महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं हो सकता है।