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24 जुलाई 2023 · JUL 24 , 2023

प्रथम दृष्टि: राजनीति का बाजार

राजनीति में पाला बदलना अब शायद अवसरवाद नहीं, पेशेवर होने का संकेत माना जाने लगा है
उप मुख्यमंत्री की शपथ लेते अजीत पवार

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शरद पवार के बाद सबसे ताकतवर समझे जाने वाले अजित पवार के पार्टी तोड़ने और भाजपा के साथ हाथ मिलाने से कितने लोगों को आश्चर्य हुआ होगा? मुझे नहीं लगता राजनीति में ऐसी घटनाएं अब लोगों को चौंकाती हैं। लेकिन यह सिर्फ अजित पवार के कारण नहीं हो रहा है, जिनके नाम 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद पाला बदलने का अनोखा कीर्तिमान दर्ज है। अजित को लंबे समय से अपने चाचा शरद पवार के राजनैतिक उत्तराधिकारी के रूप में देखा गया, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से वे अपनी अलग जमीन तलाशने की जुगत में दिख रहे हैं। इसके लिए अगर उन्हें राकांपा छोड़ कर भाजपा के साथ जाना पड़े या जाकर फिर वापस आना पड़े, शायद फर्क नहीं पड़ता।

राजनीति में तो यह सब चलता रहता है। अजित के लिए अगर किसी पार्टी में महत्वाकांक्षा पूरी न होने की आशंका हो, तो पार्टी छोड़ देने या तोड़ देने में कोई बुराई नहीं। वैसे भी इस तरह की घटनाएं पिछले चार-पांच दशक में आम हो गई हैं। आया राम-गया राम की राजनीति जो सत्तर और अस्सी के दशक में परवान चढ़ी, अब इतनी सामान्य हो गई है कि आम लोगों को ही नहीं, सियासी विश्लेषकों को भी नेताओं के पार्टी बदलने पर आश्चर्य नहीं होता है। यह बदलती राजनीति में कॉर्पोरेट संस्कृति की बढ़ती पैठ को दर्शाता है।

किसी जमाने में लोग ताउम्र एक ही पार्टी में बने रहते थे और यह सिर्फ वामपंथियों के लिए लागू नहीं होता था। कांग्रेस से लेकर भाजपा में ऐसी शख्सियतों की कमी नहीं रही, जिन्होंने जिस पार्टी की सदस्यता ग्रहण की उसी की सेवा में अपनी जिंदगी बिता दी। भले ही उस दल में उनकी प्रतिभा का यथोचित सम्मान हुआ या नहीं, पार्टी ने उन्हें चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिया या नहीं। वर्षों तक पार्टी के लिए दिन-रात पसीना बहाने वालों को भी जब साल-दर-साल टिकट नहीं मिला तो उन्हें निराशा तो हुई, लेकिन वे पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता बने रहे।

ऐसा नहीं था कि उनकी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं नहीं थीं, लेकिन विचारधारा से प्रतिबद्धता के कारण उनके लिए पार्टी सर्वोपरि रही। इसलिए उन लोगों ने अपनी पार्टी का दामन कभी नहीं छोड़ा। अब यह गुजरे जमाने की सोच लगती है कि आप किसी पार्टी की विचारधारा से प्रेरित होकर राजनीति में जाते हैं और वहीं के होकर रह जाते हैं। अब तो नई जमात के नेताओं को ट्विटर हैंडल का बायो भी कई बार अपडेट करना पड़ता है ताकि यह पता चल सके कि वे फिलहाल किस पार्टी में हैं।

कॉर्पोरेट जगत की तरह राजनीति में भी यह ‘अपवर्ड मोबिलिटी’ का दौर है। इसमें भी लोग ऊपर जाने का मौका ढूंढते हैं और जल्दी नहीं मिलने पर संभावनाओं को अन्यत्र तलाशने से परहेज नहीं करते। महाराष्ट्र में पिछले साढ़े तीन-चार साल से जो कुछ हो रहा है, वह इसी ट्रेंड को रेखांकित करता है। लेकिन, क्या यह महज किसी राज्य या पार्टी विशेष से संबंधित है? आज देश के तमाम राज्यों से लेकर केंद्र तक ऐसे नेताओं की कमी नहीं है जो कल तक जिन पार्टियों के कसीदे पढ़ा करते थे, उन पर आज विषवमन कर रहे हैं। इसलिए कहा भी गया है कि राजनीति में न तो कोई स्थायी मित्र होता है, न शत्रु। अगर आपकी निजी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति उनके साथ गलबहियां करने में होती है जिन्हें कल तक आप आस्तीन का सांप कहते थे, तो आप करेंगे। यही आधुनिक राजनीति में प्रासंगिक बने रहने का तकाजा है।

कॉर्पोरेट की तरह सियासत में भी अब यह आम धारणा बन गई है कि लंबे समय तक अगर आप किसी एक पार्टी में अपनी निष्ठा रखते हैं तो वहां आपके ‘डेड वुड’ बन जाने का खतरा बढ़ जाता है। शायद इसलिए आज के युवा राजनीतिकों में एक पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में जाने की ललक साफ देखी जा सकती है। जाहिर है, इस ललक के पीछे उनकी सत्ता से जुड़े रहने की अभिलाषा होती है।

लेकिन, इसे नैतिकता के तराजू में तौलने से पहले यह देखना चाहिए कि क्या राजनीति अब भी समाज या देश सेवा का जरिया है या एक करियर मात्र है, जो लोगों के निजी स्वार्थ सिद्धि का माध्यम बन गई है? कॉर्पोरेट जगत में ब्रांड लॉयल्टी को कभी आदर्श माना जाता था लेकिन बाद में काबिल लोगों को उच्च पद, बढ़ी पगार जैसे प्रलोभन देकर ‘पोचिंग’ किया जाने लगा। खेल, सिनेमा और अन्य क्षेत्रों में भी ऐसा ही देखने को मिला। आज के दौर में क्रिस्टियानो रोनाल्डो फुटबॉल के किस क्लब के लिए खेलेंगे, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उन्हें सबसे ज्यादा पैसे कौन दे रहा है। हिंदी सिनेमा में किसी जमाने में राज कपूर जैसे फिल्मकार अपनी बनाई टीम के साथ ही काम करना पसंद करते थे, लेकिन आज के दौर में वैसी वफादारी नहीं देखने को मिलती। आज हर क्षेत्र की तरह राजनीति में बाजारवाद हावी है, जहां आपकी प्रासंगिकता सिर्फ इस बात पर निर्भर करती है कि आप क्या ‘डिलीवर’ कर सकते हैं। कॉर्पोरेट संस्कृति की जुबान में इसे प्रोफेशनलिज्म कहते हैं। राजनीति में पाला बदलना अब अवसरवाद नहीं, पेशेवर होने की उसी संस्कृति का स्वरूप लगता है।