साहित्य की तरह अगर सिनेमा भी वाकई समाज का दर्पण है, तो आज के दौर में उसे समावेशी होना पड़ेगा। न सिर्फ कथानक के दृष्टिकोण से, बल्कि किरदारों के चित्रण में भी। दुर्भाग्यवश, हिंदी सिनेमा का रिकॉर्ड समुदाय विशेष के स्टीरियोटाइप चित्रण के मामले में अच्छा नहीं है, जिसे आज दुनिया बॉलीवुड के नाम से जानती है। शुरुआत से ही पारसी समुदाय से लेकर बिहारियों तक और दक्षिण भारतीयों से लेकर पूर्वोत्तर के लोगों सहित कई समाजों की परदे पर ऐसी छवि गढ़ी गई, जो वास्तविकता से परे थी। कभी किसी हिट फिल्म में किसी समुदाय के किरदार का खास चित्रण किया गया, तो वैसे पात्र हर दूसरी फिल्म में नजर आने लगे।
हालांकि नई शताब्दी में किरदारों के घिसेपिटे, हास्यास्पद और अपमानजनक चित्रण में काफी कमी आई है। आज के दौर के युवा फिल्मकार समय की मांग के मुताबिक अपनी कहानियों और पात्रों को टाइपकास्ट न कर नए ढंग से पेश कर रहे हैं। चर्चित फिल्मकार नीरज पांडे उन फिल्मकारों में हैं, जिन्होंने कई बेहतरीन फिल्में बनाई हैं। इसलिए उनकी नई फिल्म घूसखोर पंडत के शीर्षक के कारण विवाद बढ़ा तो कई सवाल उठे।
फिल्म का ट्रेलर रिलीज होने के बाद आरोप लगे कि उनकी फिल्म का टाइटल न सिर्फ जातिवादी है, बल्कि समुदाय विशेष के प्रति दुर्भावना और पूर्वाग्रह दर्शाता है, जिससे समाज में वैमनस्य फैलने का खतरा हो सकता है। नतीजतन, कई शहरों में फिल्म के खिलाफ प्रदर्शन हुए, एफआइआर दर्ज हुई और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि किसी समुदाय की खराब छवि पेश की जाए। अंततः निर्माता ने हलफनामा दाखिल किया कि फिल्म का शीर्षक बदल दिया जाएगा।
दरअसल, फिल्मों के प्रदर्शन से ठीक पहले व्यावसायिक लाभ के लिए जानबूझकर विवाद को जन्म देना कई फिल्मकारों का पुराना शगल रहा है। बॉलीवुड मुगलों के लिए यह ब्रह्मास्त्र से कम नहीं है, खासकर जब उन्हें लगे कि फिल्म में दर्शकों को थिएटर तक लाने की क्षमता नहीं है। इसलिए प्रचार-प्रसार के लिए वे अक्सर ऐसे हथकंडों अपनाते रहे हैं, जिनसे देशव्यापी विवाद सामने आता है और जिसका फिल्म के कंटेंट से दूर दूर तक कोई वास्ता नहीं रहता। जाहिर है, विवादों के कारण दर्शकों के एक बड़े वर्ग में उस फिल्म के प्रति दिलचस्पी बढ़ती है, जिससे टिकट खिडकियों पर भीड़ उमड़ती है। निर्माताओं के लिए ऐसे विवाद फायदे का सौदा साबित होते हैं। तो, क्या ताजा प्रकरण से भी नीरज पांडे की फिल्म को व्यावसायिक लाभ होगा?
भारतीय सिनेमा के लंबे इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगे, जब विवादों के कारण औसत दर्जे या उससे भी बुरी फिल्म भी बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हुई है। कई फिल्म निर्माताओं के अनुसार, फिल्म की सकारात्मक पब्लिसिटी से अधिक लाभ उन्हें नकारात्मक चर्चा से मिलता है। जितना अधिक विरोध प्रदर्शन, बॉक्स ऑफिस पर फिल्म की उतनी ही मांग। अब ओटीटी प्लेटफार्म के लिए भी ऐसी रणनीति बनाई जा रही है, क्योंकि डिजिटल युग में भी सिर्फ फिल्म स्ट्रीम करने से दर्शक नहीं मिलते, उसके लिए भी प्रयास करने पड़ते हैं।
बॉलीवुड फिल्मों के शीर्षक, संवाद, गीत या किसी अन्य पहलू पर विवाद लंबे समय से होते रहे हैं। संजय लीला भंसाली को अपनी फिल्म पद्मावती का नाम बदल कर पद्मावत (2018) करना पड़ा। उन्हीं की एक और फिल्म राम लीला का नाम भी विरोध के बाद बदल कर गोलियों की रासलीला राम-लीला (2013) करना पड़ा। ऐसी ही वजहों से सलमान खान निर्मित लवरात्रि (2018) का नाम बदल कर लवयात्री और अक्षय कुमार अभिनीत लक्ष्मी बम का शीर्षक लक्ष्मी (2020) करना पड़ा।
साल 2009 में शाहरुख खान की फिल्म बिल्लू बार्बर से बार्बर शब्द हटा दिया गया क्योंकि एक समुदाय विशेष ने इसे अपमानजनक बताया। माधुरी दीक्षित की फिल्म आजा नचले (2007) के एक गीत के बोल में जातिसूचक शब्दों के उपयोग से विवाद खड़ा हुआ। इसके बावजूद आए दिन ऐसे विवाद होते रहते हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि कोई फिल्मकार विवादस्पद शीर्षक या कथानक चुनने के परिणामों से अनजान रहता है।
आज फिल्में सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, मजबूत सॉफ्ट पॉवर के रूप में विकसित हो चुकी हैं। इसका सामाजिक-राजनैतिक जीवन पर असर पड़ता है। इसलिए निर्माता-निर्देशक से उम्मीद रहती है कि वे फिल्मों की विषयवस्तु या शीर्षक में ध्यान रखेंगे कि उनसे किसी समुदाय की भावनाएं आहत न हों।