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स्मृति: इतिहास गोर्बाचेव को भुला नहीं पाएगा

मिखाइल सर्गेविच गोर्बाचेव को भी शायद यह पता नहीं था कि वे जिस कुर्सी पर पहुंचे हैं उसका कद व उसका रुतबा क्या होता है
शीतयुद्ध के दोस्तः राजीव गांधी और गोर्बाचेव की मुलाकात की एक छवि

उन्हें ठीक इसी तरह जाना था जैसे वे गए - बेआवाज, अचर्चित! 91 साल की उम्र और लंबी बीमारी से जर्जर हो चुके शरीर व मन को आगे खींचना जब संभव नहीं रहा तब उन्होंने आंखें मूंद लीं। यह उस आदमी का आंख मूंदना था जिसने अपने वक्त में दुनिया को अपनी तरफ आंखें फाड़ कर देखने-समझने पर मजबूर कर दिया था। 1985-91 के उस दौर में आत्मविश्वास व संकल्प से भरा वैसा दूसरा कोई नेता विश्व रंगमंच पर नहीं था। वे साम्यवादी सोवियत संघ के वैसे प्रधान थे जिन्होंने साम्यवाद का चश्मा नहीं लगा रखा था और न ही यूरोप-अमेरिका की दौलत का आतंक उन पर असर डालता था। वे रूसी किसान परिवार के बेटे थे- ग्रामीण परिवेश से निकला एक ऐसा युवा जिसकी आंखों में अपने देश व अपनी दुनिया के बारे में एक सपना , ‘‘मैंने खुद को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में पहचाना था जिसे उन बुनियादी सुधारों की दिशा में काम करना है जिसकी मेरे देश को और यूरोप, दोनों को जरूरत है।’’ 

आज शायद यह समझना भी मुश्किल हो कि तब की दुनिया की दो महान और विकराल महाशक्तियों में एक सोवियत संघ का राष्ट्रपति और वहां की कम्युनिस्ट पार्टी का मुखिया होने का मतलब क्या होता था! मिखाइल सर्गेविच गोर्बाचेव को भी शायद यह पता नहीं था कि वे जिस कुर्सी पर पहुंचे हैं उसका कद व उसका रुतबा क्या होता है। ऐसा इसलिए था कि वे रुतबे से कहीं ज्यादा रिश्ते की अहमियत जानते व पहचानते थे। रिश्ते उनकी राजनीति व उनकी राजनयिक रणनीति का आधार थे। बहुत छोटी उम्र में वे सोवियत संघ के सर्वेसर्वा बने थे। 15 साल की छोटी उम्र में वे सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के युवा संगठन में शामिल हुए और फिर जैसे दौड़ते हुए ऊपर चढ़े। सोवियत संघ के तत्कालीन विचारक-रणनीतिकार मिखाइल सुस्लोव ने इस युवा का हाथ थामा, उसे आगे बढ़ाया। वे जानते थे कि वे जो बने हैं वहां से उन्हें बनाने की शुरुआत करनी है। वे रूसी समाज के भीतर की खलबलाहट व घुटन को पहचानते थे। उनके बुजुर्गों ने साम्यवाद की चाबुक झेली थी; शीतयुद्ध की विभीषिका से उन सबका साबका पड़ा था। इसलिए गोर्बाचेव ने बहुत तेजी से एक निश्चित दिशा में काम करना शुरू किया।

मिखाइल सर्गेविच गोर्बाचेव

मिखाइल सर्गेविच गोर्बाचेव

(2 मार्च 1931 - 30 अगस्त 2022)

दुनिया भर में राष्ट्राध्यक्षों को गोर्बाचेव से परेशानी हुई। उन्होंने सोवियत संघ का ऐसा सर्वेसर्वा कभी देखा कहां था जो पारदर्शी और निश्छल मन और सूरत लिए उनके बीच पहुंचता था; जो खुली मानवीय हंसी हंसता था; संगीत सुनते हुए जिसकी आंखें भीग जाती थीं; जो अपनी पत्नी का भावुक प्रेमी था; जिसे हत्या व षड्यंत्र से वितृष्णा थी। यह सब तब भी और आज भी राजनीतिक पकवान के मसाले नहीं माने जाते हैं। गोर्बाचेव के पास दूसरे मसाले नहीं थे। ऐसा नहीं था कि वे सोवियत राजनीति की गलाकाट स्पर्धा और उसके खूनी इतिहास से परिचित नहीं थे। ऐसा भी नहीं था कि विश्व राजनीति के घाघ दादाओं को वे पहचानते नहीं थे। वे ताकत की राजनीति और कूटनीतिक चालों को अच्छे से समझते थे। बस इतना ही अंतर था कि वे इन सबको खारिज करते थे। वे कुछ दूसरी ताकतों के बल पर सोवियत संघ को बदलना चाहते थे और जानते थे कि सोवियत संघ में कोई भी बदलाव तब तक संभव नहीं है जब तक दुनिया में बदलाव की बयार न बहे।

इस बदलाव के लिए उन्होंने अपने दो हथियार चुने- ग्लासनश्च (खुलापन और पारदर्शिता)और पिरिस्त्रोइका (आर्थिक सुधार)। रूसी क्रांति के बाद से ही ये दोनों चीजें सोवियत संघ में लगभग बहिष्कृत थीं। समाज का दरवाजा बाहर की ओर उतना ही खुलता था जितना सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी के आका इजाजत देते थे; आर्थिक आजादी भी उतनी ही मान्य थी जितनी इजाजत थी। इससे अधिक व इससे अलग जो कुछ भी था वह सब अमेरिकी पूंजीवादी जाल था जो सोवियत संघ के सामान्य नागरिकों के लिए सर्वथा निषिद्ध था। गोर्बाचेव ने इन्हीं दोनों को आगे बढ़ाया- रूसी शासन के देश के दरवाजे खोले और आर्थिक सुधारों की हवा बहाई। देखते-देखते रूसी समाज पर स्टालिन के जमाने का इस्पाती पंजा ढीला पड़ने लगा। यूरोप, अमेरिका व सोवियत संघ घुलने-मिलने लगे। संधियां हुईं, कई मर्यादाएं तय हुईं। 28 साल पुरानी बर्लिन की दीवार ढह गई। पोलैंड, हंगरी, रोमानिया, चेकोस्लोवाकिया टूट गए। वारसा संधि के देश इधर-उधर हुए। इन सबको रोकने के लिए केजीबी ने पोशीदा बगावत का षड्यंत्र रचा लेकिन वह विफल हो गया। गोर्बाचेव ने कुर्सी छोड़ दी और सोवियत संघ दरक गया।

बहुत बाद में गोर्बाचेव ने अपने उठाए कदमों को याद करते हुए कहा था, ‘‘इससे कम गति से यह सब किया ही नहीं जा सकता था। सोवियत संघ के भीतर और दुनिया में भी ऐसे परिवर्तनों की जड़ काटने वाली ताकतें मौजूद हैं, यह मैं जानता था। इसलिए उनकी गति से अधिक तेजी लाने की जरूरत थी। यूरोप समझे, इससे पहले आणविक हथियारों पर प्रतिबंध की संधि मैंने पूरी कर ली थी। इतना जरूर लगता है मुझे कि पिरिस्त्रोइका को पहले करता मैं, उसके बाद ग्लासनश्च की शुरुआत करता तो यह जो बिखराव हुआ सोवियत संघ का, वह बचाया जा सकता था।’’

ऐसा आत्मसंशय बुनियादी परिवर्तन की कोशिश करने वाले हर आदमी के भीतर कभी न कभी उठता ही है। बिखरता देश, टूटता साम्यवादी तिलिस्म और पश्चिमी आकाओं में सोवियत संघ के कमजोर पड़ने की खुशी- इन सबका कितना दवाब गोर्बाचेव पर रहा होगा इसकी कल्पना ही की जा सकती है। सच तो यह है कि दरवाजा खोलना भर ही आपके हाथ में होता है- फिर खुला दरवाजा अपनी गति व दिशा दोनों तय करने लगता है। सोवियत संघ को बिखरना ही था, जैसे यूरोपीय संघ को अप्रभावी होना ही था। नाटो जैसी संधियां अर्थहीन होनी ही थीं। गोर्बाचेव के कारण यह बिखराव शांतिपूर्ण व स्वाभाविक हुआ अन्यथा इसका स्वरूप खूनी व प्रतिगामी हो सकता था। सोवियत संघ जिन आठ मुल्कों में टूटा वे सब अब तक अपना ठौर पा चुके हैं।

गोर्बाचेव इतिहास की यात्रा को गति दे कर चले गए। वे महात्मा गांधी नहीं थे, लेकिन उनके भीतर गांधी के कुछ तत्व जरूर मौजूद थे। इसलिए इतिहास जब-जब उन्हें याद करेगा, गोर्बाचेव के लिए कहेगा कि एक निहत्थे आदमी ने अकेले दम पर मेरी दिशा व दशा दोनों बदल दी! हम अपनी दुनिया को कितना बदल पाएंगे यह तो पता नहीं लेकिन जब कभी दुनिया मनुष्यों के रहने के लिए आज से ज्यादा शांत, उदार व न्यायप्रिय बनेगी वह गोर्बाचेव को जरूर याद करेगी।

 (लेखक गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष और वरिष्ठ टिप्पणीकार हैं। विचार निजी हैं)