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20 मार्च 2023 · MAR 20 , 2023

संपादक के नाम पत्र

भारत भर से आई पाठको की चिट्ठियां
पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं

ठगी के नए रास्ते

आउटलुक के 6 मार्च 2023 अंक में प्रकाशित आवरण कथा, ‘मोबाइल मधुर फांस’ समाज के उन लोगों के लिए आंखें खोलने वाला आलेख है, जो इंटरनेट की दुनिया में अपनी खुशी तलाशते हैं। दुनिया में अकेलेपन, अनिश्चितता और घबराहट ने लोगों को कमजोर कर दिया है। ऐसे में, वर्चुअल चैट और वीडियो कॉलिंग के जरिए मुलाकातों ने अपराधियों के लिए नए रास्ते खोल दिए हैं। ठगों ने अपना सबसे बड़ा निशाना वरिष्ठ नगारिकों को बनाया है। हालांकि, ऐसा नहीं है कि खुद को टेक सैवी समझने वाले युवा इससे बच गए हैं। युवाओं को लगता है कि वे प्रौद्योगिकी के बीच ही बड़े हो रहे हैं, तो उन्हें सब पता है। हालांकि ऐसी जालसाजी में फंसने वाले लोगों में बड़ा हिस्सा युवाओं का है। भारत में कई अवैध कॉल सेंटर चल रहे हैं, जो इस तरह का काम करते हैं। लेकिन जनता में अभी इतनी समझ विकसित नहीं हुई है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अजनबी से बातचीत में पैसे का अनुरोध स्वीकार नहीं करना चाहिए।

युगल किशोर राही | छपरा, बिहार

 

थोड़ी सी सावधानी

साइबर स्कैम कम से कम अब भारत में नई बात नहीं रह गई है। अखबारों में हर दिन ऐसी एक न एक खबर जरूर होती है। इस बार की आवरण कथा, ‘मोबाइल मधुर फांस’ (6 मार्च 2023) में इस पर इसमें विस्तृत जानकारी दी गई है। लेकिन फिर भी लोग फंस रहे हैं या ऑनलाइन ठगी का शिकार हो रहे हैं। अगर ऐसा हो रहा है, तो कहीं न कहीं इसमें थोड़ा अंश लालच का भी है। असावधानीवश किसी लिंक को खोल लेने से या किसी ऑनलाइन पेमेंट से ठगी हो जाना अलग बात है। लेकिन आवरण कथा में जिस मधु जाल की बात की गई है, वह तो इंसानी लालच का ही नतीजा है। ऐसे कई लोग हैं, जो दिन में कम से कम दस फोटो सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं। हर दिन घर-परिवार और बच्चों की जानकारी जिसमें स्कूल का नाम भी होता है और फोटो अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर डालते रहते हैं। अनजान लोगों की फ्रेंड रिक्वेस्ट स्वीकारते हैं, उनसे घरवालों की तरह बातें करने लगते हैं। जब आप थाली में परोस कर सामने वाले अपराधी को सब दे दे रहे हैं, तो वह भला पीछे क्यों हटेगा। सोशल मीडिया इस्तेमाल करने वालों को इतनी सावधानी तो रखना ही चाहिए।

चारूदत्त शर्मा | सम्भल, उत्तर प्रदेश

 

शिकायत जरूरी

आजकल आरबीआइ हर खाताधारक को यह जरूर सूचित करता है कि किसी से अपने कार्ड डीटेल, पिन नंबर या ओटीपी साझा न करे। लेकिन इस बार की आवरण कथा, (‘मोबाइल मधुर फांस’, 6 मार्च 2023) कुछ अलग ही किस्से बताती है। सेक्स्टॉर्शन के मामले बढ़ रहे हैं, तो सिर्फ इसलिए कि लोग ब्लैकमेलरों की शिकायत पुलिस से नहीं करते। कोई भी जालसाज यदि आपकी अंतरंग फोटो या वीडियो के बदले पैसे मांगता है, तो उस वक्त थोड़ी देर के लिए शर्मिंदगी जरूर होती है लेकिन यदि शिकायत की जाए, तो जीवनभर का सुकून हो जाता है। वैसे तो यह सब काम करने से बचना चाहिए लेकिन फिर भी यदि फंस गए या दुर्घटनावश फंसा लिए गए हैं, तो सबसे पहले पुलिस विभाग के साइबर सेल से संपर्क करना चाहिए। साइबर अपराधियों के खिलाफ जब तक शिकायतें नहीं पहुंचेंगी, पुलिस कुछ नहीं कर पाएगी। साइबर जालसाजों को सजा होना जरूरी है।

वेदांत शर्मा | लखनऊ, उत्तर प्रदेश

 

सामाजिक उपेक्षा

आउटलुक के 6 मार्च के अंक में साइबर प्रेम पर बहुत सी जानकारी दी गई है। लेकिन सबसे सटीक बात जयपुर पुलिस के साइबर क्राइम एक्सपर्ट मुकेश चौधरी ने कही है। उनका कहना बिलकुल सही है कि सेक्सटॉर्शन को ‘रोमांस फ्रॉड’ कहना ज्यादा सही है। क्योंकि ज्यादातर लोग रोमांस के चक्कर में पड़ कर ही इसमें फंस रहे हैं। यह दौर ही ऐसा है कि हर किसी को आजादी चाहिए चाहे वह घर-परिवार की जिम्मेदारी हो या स्थायी रिश्ते से। यही वजह है कि लोग ऐसे लुभावने झांसे में आकर फंस जा रहे हैं। हर व्यक्ति के जीवन में फोन, ईमेल, वॉट्स ऐप ने ऐसी सेंध लगा रखी है कि किसी के पास भी वास्तविक रिश्ते के बारे में सोचने का वक्त ही नहीं है। इसी से साइबर क्राइम बढ़ता जा रहा है। वास्तव में यह सोशल निगलिजेंस यानी सामाजिक अवहेलना या उपेक्षा से उपजा अपराध है। जो अपराध कर रहे हैं या जो पीड़ित हैं, दोनों ही पक्षों में कहीं न कहीं सामाजिक उपेक्षा का भाव है। घर में अकेलापन, सदस्यों का आपसी मेल-मिलाप न होना, किसी स्कूल या कॉलेज में किसी वजह से उपेक्षित रहना। दफ्तर में तनाव रहना कई कारण हैं, जिससे लोग दूर रहने के लिए फोन का सहारा लेते हैं, क्योंकि फोन बदले में न कोई सलाह देता है न ताने मारता है। ऐसे में कई बार वे अपराधियों के चुंगल में फंस जाते हैं और इसी तरह अपराध करने वाले भी कई बार खेल-खेल में ऐसा करते हैं और बात में पेशेवर अपराधी के रूप में तब्दील हो जाते हैं। इसे रोकने का एक ही उपाय है कि झूठे प्रेम को पहचानने की समझ लोगों में विकसित हो।

पुरुषोत्तम माखीजा | भोपाल, मध्य प्रदेश

 

कविताई मरहम

6 मार्च के अंक में, ‘दुनिया की पहली पोएट्री फॉर्मेसी’ लेख दिल को छू गया। मानसिक रोगों का, अवसाद, उदासी का इलाज करने का यह नायाब तरीका है। यह सोचने वाली बात है कि भारतीय साहित्य में भी अच्छी कविताओं की कोई कमी नहीं है। भारत में साहित्यकारों की भी कमी नहीं है। लेकिन फिर भी किसी ने यहां ऐसा करने का नहीं सोचा। शब्दों से अच्छा मरहम भला और क्या हो सकता है। शब्दों की ताकत के बारे में तो सब बात करते हैं, लेकिन शब्दों के उपयोग के बारे में आज तक किसी ने कुछ नहीं सोचा। निराशा के क्षण में वाकई यदि एक अच्छी कविता पढ़ने को मिल जाए, तो इससे अच्छा कुछ नहीं हो सकता। लेकिन यह इतना भी आसान नहीं रहा होगा। पहली बार डेबोरा अल्मा ने जब कविताओं को छांटना शुरू किया होगा, तो उन्हें खुद पता नहीं होगा कि कौन सी कविता किस स्थिति में एकदम फिट बैठेगी। लेकिन आखिर उन्होंने यह कर दिखाया। खुशी की तलाश में यदि ऐसे किसी कैफे में जाना भी पड़े, तो व्यक्ति खुश होने के साथ कितना समृद्ध हो कर लौटेगा। यह सोच कर ही मन खुश हो जाता है। भारत में भी यदि ऐसा एक कैफे हो, जहां कविताई मरहम के लिए कतार लगी हो, इससे अच्छा क्या हो सकता है।

नूर काजी | भोपाल, मध्य प्रदेश

 

नई दुनिया

आउटलुक के नए अंक में, दुनिया की पहली पोएट्री फॉर्मेसी में कविता के दवाखाने के बारे में पता चला। ऐसी चमत्कारिक दवा की दुकान हो, तो कोई जाना क्यों पसंद नहीं करेगा। मानसिक रोगों से दरअसल ऐसे ही लड़ा जा सकता है। क्योंकि यह रोग नहीं बल्कि अवस्था रहती है, जिसमें दवा की नहीं भावनाओं की जरूरत होती है। कविताएं भले ही सभी को समझ न आएं, लेकिन इनके शब्द राहत तो देते ही हैं। खुश होने पर भी यहां जा सकते हैं। यानी अगर लगातार गए, तो तनाव होने की संभावना भी खत्म हो जाएगी। इंग्लैंड और वेल्स के सीमावर्ती कस्बे बिशप कैसल में तो हर कोई जा नहीं सकता। अच्छा हो कि भारत में ऐसा एक प्रयोग शुरू किया जाए। इसके लिए तो अल्मा को साधुवाद देना चाहिए कि पहले लोग इस कस्बे की खूबसूरती और ऐतिहासिक दुर्ग के अवशेष देखने आते थे अब इस पोएट्री फॉर्मेसी के कारण आने लगे हैं। किसी जगह को इस तरह समृद्ध करना भी कम बड़ी बात नहीं है। चाय-कॉफी, केक और कविता। इससे अच्छी दुनिया और क्या हो सकती है। मशहूर कवियों की कविताओं से रू-ब-रू होने का मौका मिले, लोगों से मिलें और सारे गम जैसे धुल जाएं। पोएट्री फार्मेसी में खुली हुई कविता की किताबें अलग ही सुकून देती होंगी। धन्यवाद कि आपने इस लेख को प्रकाशित किया। इसी के सहारे हमने नई दुनिया देख ली।

आलमगीर शाह | नागपुर, महाराष्ट्र

 

बेरोजगारी की सूनामी

आउटलुक की 20 फरवरी की आवरण कथा, ‘सुंदर सपना बीत गया’ नौकरी की दुनिया की पड़ताल करती है। नौकरी किसी भी नागरिक का हक है लेकिन यह सभी के लिए सुलभ नहीं है। हर छोटे-बड़े शहर, कस्बे और महानगरों में हर दिन नागरिक बस दौड़ रहे हैं। छोटी से छोटी नौकरी पाने के लिए भी कड़ी प्रतियोगिता है। कुछ लोग अल सुबह से देर रात तक खुद को दफ्तर में ही खपा देते हैं ताकि नौकरियां चलती रहें। ऐसे में यदि किसी का अमेरिका जाने का सपना टूट जाए, तो यह उसके लिए जीवन के अंतिम दिन जैसा ही होगा। खुद को संभालने के साथ परिवार की जद्दोजहद में हर दिन घुटते भारतीयों की नौकरियों का सपना वाकई इतना सुंदर है कि यदि इसमें खरोंच भी आती है, तो वह इसे सह नहीं पाएंगे। कहने को तो भारत सबसे युवा देश है, यहां की अर्थव्यवस्था के बारे में बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं लेकिन सच्चाई यही है कि यदि विदेश से भारतीयों की नौकरियां गईं तो भारत में बेरोजगारी की सूनामी आ जाएगी।

डॉ. पूनम पांडे | अजमेर, राजस्थान

 

विज्ञान से इतर

आउटलुक में 20 फरवरी 2023 को ‘चमत्कार या अंधविश्वास’ लेख पढ़ा। भारत हमेशा से धार्मिक और आध्यात्मिक देश रहा है। लेकिन आज अध्यात्म और धर्म की आड़ में कुछ लोग अपना धंधा चला रहे हैं और आम जनता को मूर्ख बना रहे हैं। यह कहना ठीक नहीं कि सभी धार्मिक गुरु गलत हैं। भारत में गुरुओं की लंबी परंपरा रही है। विज्ञान और तकनीक के बीच भी बहुत कुछ होता है और इसे समझना जरूरी है। बेशक आज के कुछ धार्मिक गुरुओं और बाबाओं ने धर्म को नुकसान पहुंचाया है लेकिन एक लाठी से सभी को नहीं हांका जा सकता। मौजूदा दौर में मानसिक शांति किसी के पास नहीं है, ऐसे में व्यक्ति इसकी तलाश में धर्म की शरण में ही जाएगा। श्रद्धा और विश्वास के चक्कर में कई बार लोग गलत बाबाओं के चक्कर में पड़ कर उनकी बेकार की बातों को भी चमत्कार मान बैठते हैं। इस गलत चमत्कार पर बात होनी चाहिए न कि इसे धार्मिक कट्टरपंथ कह कर या पाखंड कह कर नकार दिया जाना चाहिए। इससे देश में मौजूद करोड़ों लोगों की श्रद्धा और विश्वास पर चोट लगती है। रहा सवाल मन की बात जानने का, तो यह बात विज्ञान भी मानता है कि हिप्नोटाइज कर दिमाग पढ़ा जा सकता है। बेशक वैज्ञानिक चेतना और चमत्कार दो अलग-अलग चीजें हैं लेकिन विज्ञान के इस युग में पुनर्जन्म जैसे चमत्कार भी हुए ही है। इसे समझ कर ही टिप्पणी की जाए, तो सभी के लिए यह बेहतर होगा।

सुनील कुमार महला | पटियाला, पंजाब

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पुरस्कृत पत्र: नई सूनामी

जितने फोन स्मार्ट होते जाएंगे, इंसान उतने ही अहमक होते जाएंगे। इस बार की आवरण कथा (मोबाइल मधुर फांस, 6 मार्च 2023) पढ़ कर यही लगा। यदि दूसरा पहलू देखें, तो लगता है कि अकेलापन और अवसाद बढ़ गया है, रिश्ते टूट रहे हैं, ऐसी हालत में व्यक्ति को जहां से दो मीठी बातें सुनने को मिलती है वह वहीं उलझ कर रह जाता है। आम व्यक्ति जानता भी नहीं है कि वह इस जाल में उलझ कर वह प्रतिष्ठा और पैसे का नुकसान कर बैठेगा। जैसे सरकार अपनी योजनाओं का लगातार प्रचार करती है वैसे ही हर माध्यम पर साइबर अपराध पर कोई न कोई लेख, विज्ञापन आदि प्रकाशित होने चाहिए। दिल को काबू में करने का कोई उपाय नहीं है लेकिन जानकारी के अभाव में दिमाग बेकाबू नहीं होना चाहिए।

शरबाणी बनर्जी | पश्चिम बंगाल