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1 मई 2023 · MAY 01 , 2023

पत्र संपादक के नाम

भारत भर से आई पाठको की चिट्ठियां
पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं

ध्यान बंटेगा नहीं

17 अप्रैल की आवरण कथा, ‘मंडल कमंडल 2.0’ प्रभावी रही। सरकार ने राहुल गांधी को संसद से निकालकर भारत के लोगों के दिल में स्थापित कर दिया। लेकिन वे भूल गए हैं कि यह लोकतंत्र है और यहां कभी भी कुछ भी हो सकता है। जब जाति आधारित जनगणना का काम बिहार में शुरू हो गया है और दूसरे राज्यों में इसकी सुगबुगाहट शुरू हो गई है, तो जाहिर है कोई नया मुद्दा सत्ता दल को चाहिए ही था। इस नए मुद्दे में राहुल से अच्छा और क्या हो सकता था। इस नई गोलबंदी से सत्ता पक्ष जल्द ही अलग-थलग दिखाई पड़ेगा। ये लोग चाहे जो कर लें, जनगणना से किसी का ध्यान नहीं बंटेगा।

डॉ. पूनम पांडे | अजमेर, राजस्थान

 

वोट पर फोकस

चुनावी साल में हर पार्टी की कोशिश रहती है कि उसके लोग ज्यादा से ज्यादा आम जनता के बीच दिखें और उनके मुद्दों की चर्चा हो। पिछले कुछ साल से राजनीति की दिशा और दशा बिलकुल बदल गई है। 17 अप्रैल की आवरण कथा ‘मंडल कमंडल 2.0’ ऐसी कोई नई अवधारणा को नहीं बताती लेकिन इस समय के लिए यह महत्वपूर्ण विषय है। भारतीय जनता पार्टी पूरी कोशिश कर रही है कि तीसरी बार वह सत्ता में आ सके। इसके लिए वे कांग्रेस नेता राहुल गांधी को गिराने की पूरी कोशिश भी कर रहे हैं। क्योंकि उनकी भारत जोड़ो यात्रा से कांग्रेस फिर मुख्य लड़ाई में शामिल हो गई है। लेकिन नीतीश ने जाति जनगणना का कार्ड खेल कर माहौल को अचानक अपनी तरफ मोड़ लिया है। चुनाव से पहले यदि नीतीश जातिगत जनगणना के आंकड़े सामने ला पाते हैं, तो फिर भाजपा के ईशारे पर काम कर रही ईडी, सीबीआई भी कुछ नहीं कर पाएगी। जाति की गिनती होने से अगले चुनाव की फिजा बिलकुल बदली होगी, यह बात मोदी बेहतर तरीके से समझ रहे हैं। लेकिन इसका तोड़ न तेजस्वी यादव को ईडी के दफ्तर बुलाना है न राहुल की संसद की सदस्यता समाप्त करना। यह देखना दिलचस्प होगा कि अब मोदी क्या करेंगे।

चरणजीत सिंह | मोहाली, पंजाब

 

जाति से ऊपर तरक्की

17 अप्रैल की आवरण कथा, ‘मंडल कमंडल 2.0’ हर पहलू पर ध्यान दिलाती है। लेकिन यह बात गौर करने लायक है कि मंडल कमंडल की राजनीति को लंबा अरसा बीत गया है। एक पीढ़ी थी, जिसके लिए जातिगत पहचान ही सबसे महत्वपूर्ण थी। तब लोगों के पास बहुत साधन नहीं थे इसलिए नेता जाति के नाम पर राजनीति कर लेते थे। लेकिन अब जिस तरह से भाजपा आक्रामक हो कर चुनाव लड़ती है, उससे लगता नहीं कि जाति जनगणना के परिणाम आने से भाजपा के वोट बैंक पर कुछ असर पड़ेगा। क्योंकि अब युवा समझते हैं कि जाति-जाति का राग अलाप कर कहीं नहीं पहुंचा जा सकता। बिहार के लोग भी जानते हैं कि लालू के परिवार ने सिर्फ अपना और अपने परिवार का भला देखा। अगर कल को तेजस्वी मुख्यमंत्री बन भी जाएं, तो उनके पास विजन नहीं है न ही वे कुशल प्रशासक साबित होंगे। अब युवाओं को तरक्की चाहिए, मौके चाहिए। जाति के गणित से अब वे ऊपर उठ गए हैं। भाजपा ने दलितों या पिछड़ों के लिए बहुत किया है। भाजपा की जमीन बहुत मजबूत है और किसी भी तरह की जनगणना के आंकड़े आ जाएं, उनका वोट बैंक हिलेगा नहीं।

प्रीति साहू | बिलासपुर, छत्तीसगढ़

 

तैयारी पूरी

आगामी लोकसभा चुनाव होने में अभी पूरा साल है लेकिन बिसात अभी से बिछ गई है। अब देखना यह है कि अगली चुनावी फसल किस मुद्दे पर लहलहाती है। आवरण कथा, ‘मंडल कमंडल 2.0’ (17 अप्रैल) में हर इंटरव्यू, प्रमुख लेख सभी में लिखा है कि जातिगत जनगणना के बाद भाजपा को मुश्किल का सामना करना होगा। लेकिन पिछड़ी जातियों के लिए मौजूदा सरकार ने बहुत काम किया है और लगता नहीं कि बिहार में होने वाली जनगणना का राष्ट्रव्यापी असर होगा। हां, इतना जरूर है कि इससे विपक्षी पार्टियों में थोड़ी फुर्ती आएगी। लेकिन जमीन पर जाति जनगणना के आंकड़ों से फायदा लेना टेढ़ी खीर लग रहा है। विपक्ष तैयारी पूरी रखे, तो हो सकता है कि इस जनगणना का फायदा उठा पाए।

सीमा व्यास | जयपुर, राजस्थान

 

जमीनी तैयारी जरूरी

17 अप्रैल के अंक में चुनाव विश्लेषक और सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार का इंटरव्यू (‘जातियों के आंकड़े निकलें तो नई गोलबंदी संभव’) संतुलित लगा। उनका मानना है कि यदि जाति जनगणना के आंकड़े आते हैं, तो राजनीति में नया जोर पैदा हो सकता है। इसमें कोई शक नहीं कि विपक्ष मुद्दे में हवा भरने में कोई कमी नहीं छोड़ेगा। कायदे से उन्हें इतने अच्छे मौके में कोई कोताही बरतना भी नहीं चाहिए। चुनाव का जिस तरह से साल दर साल स्वरूप बदल रहा है उससे बहुत सी शंकाएं भी उभरती हैं। पिछड़ी जातियों में भी अब वैसा पिछड़ापन नहीं रह गया है। इसलिए इन्हें साधने की कवायद में नए तरह के टूल की जरूरत होगी। केवल संख्या से इस वर्ग में हलचल नहीं दिखेगी। जैसा कि संजय कुमार ने खुद कहा है कि जाति आधारित राजनीति जिसे मंडल की राजनीति भी कहते हैं, के मुकाबले में आडवाणी जी ने रथयात्रा निकाली थी। तब भाजपा का कोई आधार नहीं था, तब उन्होंने यह नायाब तरीका खोज लिया था। अब तो मोदी जैसा आक्रमक नेता भाजपा के पास है और उसका जनाधार क्या है यह किसी को बताने की जरूरत नहीं। इसलिए विपक्ष को सिर्फ यह सोच कर ही खुश नहीं होना चाहिए कि बिहार की जाति जनगणना के नतीजों से उनका भविष्य सुधर जाएगा। उन लोगों को अभी से जमीनी स्तर पर मेहनत करनी चाहिए ताकि वे लोग ट्विटर और टीवी शो के बजाय जमीन पर दिखाई दें।

श्वेतकमल आनंद | दिल्ली

 

सोची समझी साजिश

नए अंक में संपादकीय (17 अप्रैल, ‘पंच परमेश्वर’) बहुत महत्वपूर्ण मुद्दे पर बात करता है। भारत में तो लगता है ट्रोलिंग नए धंधे के रूप में फल-फूल रहा है। जरा सी बात पर जिस तरह लोग सोशल मीडिया पर लिंचिंग करने लगते हैं, उससे लगता है जैसे यह पूरा तंत्र है, जो हर बात पर किसी को भी ट्रोल करने के लिए तैयार रहता है। लेकिन ऐसा जब सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के साथ भी होने लगे, तो यह चिंता का विषय बन जाता है। सोशल मीडिया ने कई तरह की आजादी दी है लेकिन इस आजादी में दूसरों को नीचा दिखाना या हर बात में अपनी राय जाहिर करना अतिरिक्त रूप से शामिल हो गया है। जस्टिस चंद्रचूड़ पहले न्यायमूर्ति नहीं हैं जो ट्रोलिंग का शिकार हो रहे हैं। उनसे पहले सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व न्यायाधीशों को अपने फैसलों के कारण सोशल मीडिया पर आलोचना का सामना करना पड़ा। पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने पर आरोप लगाना एक बात है और आपत्तिजनक टिप्पणियां लिखना अलग बात। सोशल मीडिया की ट्रोल ब्रिगेड को भले ही उस विषय की जानकारी न हो। पता न हो कि देश या दुनिया में क्या चल रहा है लेकिन ये लोग हर बात में अपनी राय जाहिर करने से बाज नहीं आते हैं। इससे कई बार बातों की गंभीरता खत्म हो जाती है और बहस इन टिप्पणियों की ओर ही मुड़ जाती है। इस ब्रिगेड का काम ही है कि जहां कुछ हुआ नहीं कि दर्जन के हिसाब से ट्वीट करो और मुद्दे को इतना हल्का कर दो कि कोई उस पर बात करने से ही कतराए। यकीनन यह एक पूरा तंत्र है, जो सोची-समझी साजिश के तहत ऐसा करता है।

जी.एस. बरड़िया | मुंबई, महाराष्ट्र

 

अनुचित हस्तक्षेप

आउटलुक के 17 अप्रैल के अंक में प्रकाशित प्रथम दृष्टि ‘पंच परमेश्वर’ में सही आकलन किया गया है कि सोशल मीडिया का उपयोग उन लोगों द्वारा किया जा रहा है जिनके न्यायाधीशों के निर्णयों के खिलाफ रचनात्मक आलोचनात्मक मूल्यांकन के बजाय केवल अर्ध-सत्य है। यह प्रवृत्ति न्यायिक संस्थान को नुकसान पहुंचा रही है और इसकी गरिमा को कम कर रही है। सुनवाई अनिवार्य रूप से अदालत द्वारा की जाने वाली एक प्रक्रिया है। हालांकि, आधुनिक समय के संदर्भ में, डिजिटल मीडिया द्वारा परीक्षण न्याय वितरण की प्रक्रिया में एक अनुचित हस्तक्षेप है। सुप्रीम कोर्ट के एक जज के अनुसार लक्ष्मण रेखा को पार करना चिंताजनक है, खासकर तब जब आधे-अधूरे सच रखने वाले लोग न्यायिक प्रक्रिया की जांच करने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं।

युगल किशोर राही | छपरा, बिहार

 

अंदाज कपिल का

आउटलुक पत्रिका के 3 अप्रैल अंक की आवरण कथा, ‘एक्सिडेंटल कॉमेडियन’ जोरदार लगी। कपिल शर्मा ने अपने अंदाज में कॉमेडी कर पूरे कॉमेडियन तबके को शोहरत दिलाई है। आज की आपाधापी और भागदौड़ भरी जिंदगी में हर तरफ जहां तनाव, अवसाद बिखरा पड़ा है, वहां कॉमेडी और कॉमेडियन हर किसी के लब पर मुस्कान लाने का काम कर रहे हैं। मुस्कराहट लाना वास्तव में कठिन काम है।

सुनील कुमार महला | पटियाला, पंजाब

 

मानवीय संवेदनाएं

आउटलुक के 20 मार्च के अंक में डॉक्टरों के फ्रॉड के बारे में पढ़ा। पढ़कर बहुत कष्ट हुआ। मुझे प्रेमचंद की कहानी मंत्र याद हो आई, जिसमें डॉ. चड्ढा अपने खेल के समय में बूढ़े भगत के मरणासन्न बेटे को नजर भर देखता तक नहीं। जबकि बाद में वही बूढ़ा भगत डॉ. के लड़के की जान बचाता है, जब डॉ. के लड़के को सांप काट लेता है। बूढ़ा अपनी पत्नी के मना करने के बावजूद डॉ. के लड़के का इलाज करता है। यह होती है मानवीय संवेदनाएं, जो ऐसे फर्जी डॉक्टरों में भला कहां से आएंगी। गांधी जी कहते थे कि डॉक्टर चाहता है कि समाज में रोग बढ़े। वकील चाहता है कि समाज में झगड़ा बढ़े। क्योंकि दोनों ही मुनाफा चाहते हैं। आज समाज के नैतिक पतन का यही कारण है।

विवेक सत्यांशु | इलाहबाद, उत्तर प्रदेश

 

कोरा ढकोसला

6 मार्च के अंक में, ‘हर दल लुभाए दलित’, राजनीति की नई करवट को बताता है। शिवराज सिंह चौहान जोर-शोर से दलितों को भ्रमित कर अपने पाले में खींचने की जुगाड में लगे हुए हैं। भाजपा दलित राजनीति का खूब प्रोपेगंडा करती है। जैस, दलितों के पैर छूना, उनके घर जाकर खाना खाना, उनकी कन्याओं का कन्यादान करना। वे पूरे भारत में अपने तरीके से दलित राजनीति की बिसात बिछाते हैं। इस पार्टी के नेता संत रविदास और डॉ. आंबेडकर के नाम की माला जपने में कसर नहीं छोड़ते। इनकी कथनी और करनी में बहुत अंतर है। लेकिन सब जानते हैं कि भाजपा में दलित प्रेम कोरा ढकोसला या दिखावा ही है।

डॉ. जसवंतसिंह जनमेजय | नई दिल्ली

 

पुरस्कृत पत्र : घिर गई सरकार

आगामी लोकसभा चुनाव बहुत दिलचस्प होंगे इसमें किसी को कोई संदेह नहीं है। 17 अप्रैल की आवरण कथा ‘मंडल कमंडल 2.0’ इसी का ट्रेलर है। खुद नरेन्द्र मोदी को नहीं पता कि अगले चुनाव में वह क्या मुद्दा लाएं। चूंकि उनकी सरकार तीसरी बार जीतने के लिए लड़ेगी इसलिए मुद्दे भी नए-नवेले होने चाहिए। विपक्ष जाति गोलबंदी के रूप में तगड़ा कार्ड ला पाएगी ऐसी उम्मीद की जा सकती है। यह ऐसा चक्रव्यूह है, जिसमें घुसना एकदम असंभव है। इस मुद्दे का भारतीय जनता पार्टी के पास फिलहाल कोई तोड़ नहीं है। यदि चुनाव जाति जनगणना के आसपास सिमट जाएं, तो भाजपा को वाकई मुश्किल हो सकती है। जाति के आगे हर मुद्दा गौण हो जाता है। विपक्ष को चाहिए कि हर राज्य में ऐसी जनगणना कराए।

शिवानी कुमारी | बगूसराय, बिहार