Advertisement

संपादक के नाम पत्र

भारत भर से आई पाठको की चिट्ठियां
पिछले अंक पर आई प्रतिक्रियाएं

बदलाव की बयार

12 जून के अंक में ‘24 की टिक टिक’ में यशवंत सिन्हा जी का साक्षात्कार रोचक है। उनकी बातें गौर करने लायक हैं। विपक्षी एकता पर वे ठीक कह रहे हैं कि इस मामले पर सोचने की जगह कर्नाटक का फार्मूला लागू करके कांग्रेस पार्टी को 2024 का संग्राम जीत ही लेना चाहिए। साथ ही मोदी की घटती लोकप्रियता पर भी उनकी टिप्पणी सही है कि अब सरकार पर खार निकालने वालों की वे लोग सराहना कर रहे हैं। यानी अब जनमत बदलाव की ओर उन्मुख है।

डॉ. पूनम पांडे | अजमेर, राजस्थान

 

हटें राह के कांटें

12 जून की आवरण कथा, ‘24 की टिक टिक’ पढ़ कर ही पता चलता है कि सरकार इस बात को समझ गई है कि देश की जनता महज वोट बैंक नहीं है। कर्नाटक का जनादेश ही अगर पूरे भारत के मन का जनादेश है, तो यह हर राजनीतिक दल के लिए जागरूक होने का समय है। जनता को थाली में पूरा भोजन चाहिए, जुमले की खुराक नहीं। जनता को पानी और बिजली के अभाव में जूझते हुए अपने प्रधान सेवक को फैंसी ड्रेस में देखना पसंद नहीं आ रहा है। गरीब आदमी दूध-दही में जीएसटी दे रहा है और राजनीतिक रैली में नेता फूलों से तौले जा रहे हैं। अब वक्त आ गया है कि दूसरे राजनीतिक दल आकर आम जनता के तलवों में चुभ रहे कांटे हटाए।

मुगधा | नई दिल्ली

 

मंझे हुए नाविक

आउटलुक के 12 जून के अंक में प्रकाशित लेख, ‘भाजपा को कोई फर्क नहीं’ में सही लिखा गया है कि आगामी 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में कनार्टक विधानसभा चुनाव का असर भाजपा पर नहीं पड़ने वाला। भाजपा के लोग राजनीति के समुद्र के कुशल और मंझे हुए नाविक हैं, जो हताशा के गहरे सागर में भी मंजिल पा ही लेते हैं। भाजपा हार को गले लगा कर नहीं रखती, बल्कि वो हताशा छोड़ आगे बढ़ जाती है। भाजपा को रोकने के लिए विपक्ष एक मंच पर आने के लिए कई प्रयोग कर रहा है लेकिन अब तक कोई फार्मूला नहीं बन सका है। हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक गंवाने के बाद भी वे लोग विचलित नहीं है। विपक्षी दल इस बात को लेकर हैरान हैं कि दो राज्यों में हार के बाद भी भाजपा तरोताजा महसूस कर रही है। भारतीय जनता पार्टी में किसी ने एक दूसरे पर हार का ठीकरा नहीं फोड़ा और न ही आपस में कोई खींचतान हो रही है। लक्षित चुनावी रणनीति भाजपा को निश्चय ही अन्य दलों से अलग पहचान देती है।

युगल किशोर राही | छपरा, बिहार

 

तकदीर बदल दें

‘चौपड़ चौबीसी’ (12 जून) का विश्लेषण बहुत सटीक है। जैसा दिखता है, वैसा हमेशा होता नहीं है। भारतीय जनता पार्टी कितना भी कहे कि उसे चुनावी हार से कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन सच्चाई तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही जानते हैं कि उनका दिल कितना टूटा होगा। यह राहुल गांधी के लिए बहुत अच्छा अवसर है। वे चाहें, तो देश की तकदीर बदल सकते हैं। राहुल में वह दम भी है कि वे ऐसा कर सकते हैं। बस कमी है, तो इच्छाशक्ति की। कभी-कभी उन्हें देख कर या उनके भाषण सुन कर लगता है कि वे कुछ करना ही नहीं चाह रहे हैं, जो तकदीर से मिल जाएगा उसे अपना लेंगे। 2024 में होने वाले चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा। चुनाव के लिहाज से 10-11 महीने कुछ भी नहीं होते। अब उन्हें चाहिए कि वे कमर कस कर मैदान में उतरें और कर्नाटक के नतीजों की तरह लोकसभा के नतीजों को भी अपने पक्ष में ले आएं।

सर्वेश शांडिल्य | जयपुर, राजस्थान

 

आईना दिखा दिया

कर्नाटक के लोगों ने भाजपा को दिखा दिया है कि वहां के लोग बहुत समझदार हैं। राजनीति में मतदाताओं ने कभी किसी बड़बोली पार्टी को नहीं छोड़ा। मोदी शायद यह भूल गए थे, इसलिए वहां के मतदाताओं नें बताया कि आगामी चुनाव पार्टी के लिए आसान नहीं रहने वाले हैं। नई आवरण कथा, ‘चौपड़ चौबीसी’ (12 जून) कांग्रेस के भारी बहुमत से जीतने और भारतीय जनता पार्टी की बुरी हार से भी आगे की कथा कहती है। इस चुनाव में जो मुद्दे उभर कर आए, उनसे कांग्रेस में नई ऊर्जा का संचार हुआ है। ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, चंद्रशेखर राव, अखिलेश यादव और मायावती को चाहिए कि वे अपने-अपने हित कुछ दिन के लिए छोड़ दें और कांग्रेस के साथ मिल कर भाजपा का मुकाबला करें। यही वक्त है, जब विपक्षी एकता भाजपा को घुटनों के बल ला सकती है। यह मौका छूटा, तो फिर शायद कभी न मिले।

सत्यदेव शरण | मोगा, पंजाब

 

जीत के जतन

12 जून के अंक में ‘चौपड़ चौबीसी’ कई बातों की ओर ध्यान दिलाती है। भाजपा खुद को चुनावी राजनीति की महारथी समझती थी। वैसे तो नरेंद्र मोदी खुद को अपराजेय समझते थे। पार्टी को लगता था कि हर जगह सिर्फ मोदी का नाम लेने से काम हो जाएगा। लेकिन वे लोग यह नहीं जानते कि हर राज्य अपने स्थानीय लोगों को ज्यादा तवज्जो देता है ताकि पहुंच आसान हो। मोदी के अलावा पार्टी के पास कुछ नहीं है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तक कर्नाटक की कई रैलियों में यही कहते रहे कि राज्य मोदी जी के हवाले कर दें। यह तो सोचने वाली बात है कि मोदी हर जगह तो हो नहीं सकते। मतदाता को तो स्थानीय चेहरा चाहिए जिससे वह जुड़ाव महसूस कर सके। भाजपा यहीं मात खा गई। भाजपा ने भी जीत के लिए जतन किए लेकिन उसकी कोई नीति सफल नहीं हुई। केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य में वसवराज बोम्मई सरकार की एंटी-इन्कंबेंसी से निपटने के लिए ज्यादा उम्मीदवारों को बदल देने और मोदी की छवि पर लड़ने की रणनीति अपनाई। लेकिन इस रणनीति से रत्ती भर फर्क नहीं पड़ा। इससे अच्छा होता कि पार्टी वहां किसी स्थानीय नेता को आगे करती ताकि मतदाता का भरोसा बढ़ता।

चंद्रिका प्रसाद | पटना, बिहार

 

दल-बदल

12 मई की आवरण कथा को आगामी चुनाव की पूर्व पीठिका कहा जा सकता है। यह सुखद बदलाव के संकेत है कि अब नेता भाजपा छोड़ कर कांग्रेस में जा रहे हैं। कर्नाटक के बाद मध्य प्रदेश में भी यही हो रहा है। यह भाजपा का गुरूर ही था जो उसने जगदीश शेट्टार, लक्ष्मण सावदी जैसे नेताओं को जाने से नहीं रोका। भाजपा को यह भी समझना चाहिए कि हर जगह ध्रुवीकरण नहीं चल सकता जैसा कि यहां भी उन्होंने बजरंग बली के नाम पर करना चाहा। यदि मोदी सत्ता में वापसी चाहते हैं, तो उन्हें कोई पराक्रम दिखाना होगा। कर्नाटक में अभी से लिंगायत नेता बी.एस. येदियुरप्पा की जगह नया नेता खड़ा करना होगा। दिल्ली में बैठ कर यहां की सियासत चलाने के बजाय यहीं से जमीनी नेताओं को खोज कर उन्हें नेतृत्व सौंपना होगा। वरना कर्नाटक की तरह हर राज्य हाथ से निकलते जाएंगे।

उमेश परिहार | झुंझनूं, राजस्थान

 

सामने कोई नहीं

12 जून के प्रथम दृष्टि, ‘व्यक्तित्व या विचारधारा’ में चुनाव की सुगबुगाहट और मोदी की ताकत दोनों का ही अच्छा विश्लेषण है। दरअसल देश के मतदाताओं के पास फिलहाल मोदी के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है। इसलिए हमें हर जगह मोदी मैजिक ही दिखाई पड़ता है। कर्नाटक में हार के बाद भी उत्तर भारतीय मतदाताओं का फैसला बदलेगा, ऐसा लगता नहीं है। मोदी नेता की तरह लगते हैं और नेता की तरह व्यवहार भी करते हैं। उनके सामने अभी सभी नेता बौने दिखाई पड़ते हैं। उनमें एक खासियत तो है कि वे निर्णय लेने का माद्दा रखते हैं। वे बिना डरे फैसले लेते हैं। यह कम बड़ी बात नहीं है। नेता के तौर पर भी और व्यक्ति के तौर पर भी उनके सामने अभी कोई नहीं टिक पाएगा।

श्रीश मिश्रा | पटना, बिहार

 

आगे ले जाने की चाहत

12 जून के प्रथम दृष्टि, ‘व्यक्तित्व या विचारधारा’ में कई बातें उठाई गई हैं। लेकिन एक सवाल है, जो बना ही हुआ है कि मोदी नहीं तो कौन। यह बड़ा सवाल है, जिसका उत्तर हर कोई खोज रहा है। नौ साल के कार्यकाल में प्रधानमंत्री के रूप में मोदी ने कई ऐसे काम किए जिन पर किसी भी भारतीय को गर्व हो सकता है। अभी के माहौल को देख कर तो लग रहा है कि मोदी की अगुआई में 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा फिर सरकार बनाएगी। यह उनकी सिर्फ हैट्रिक बनाने की चाहत नहीं है बल्कि देश को और आगे ले जाने की चाहत है। कोई कुछ भी कहे लेकिन उनमें कुछ बात तो है। संपादकीय में आशंका जाहिर की गई है कि क्या मोदी सरकार भी बाकी दलों की तरह लोकलुभावन घोषणाओं का सहारा लेगी। लेकिन मोदी सरकार ने दो हजार रुपये के नोट बंदकर अपने इरादे तो जाहिर कर दिए हैं। इस कदम से काले धन पर नियंत्रण भले न हो लेकिन चुनावी राजनीति में यह कदम असर डालेगा। जो पार्टियां धन के बल पर चुनाव लड़ती हैं, उनके लिए यह फैसला भारी साबित होगा।

नीति दुबे | धार, मध्य प्रदेश

 

हीरो बने जीरो

12 जून के अंक में लेख ‘नायक नहीं खलनायक!’ बताता है कि जरूरत से ज्यादा लालच और होशियारी भारी पड़ती है। खुद को सुपर कॉप समझ रहे वानखेड़े आखिरकार शिकंजे में आ ही गए। हीरो बनने चले थे लेकिन जीरो बन कर रह गए। ऐसे ही अफसर ईमानदार अफसरों को भी संदेह के घेरे में ला देते हैं। इन लोगों को काम करने के लिए सिस्टम मिलता है, ताकत मिलती है और ये लोग सिस्टम के साथ ही खिलवाड़ शुरू कर देते हैं। 

श्रुति मालवीय | जयपुर, राजस्थान

 

कड़ी सजा मिले

12 जून के अंक में लेख ‘नायक नहीं खलनायक!’ पढ़ कर दुख हुआ कि अफसर अपने विभाग की इज्जत के बारे में भी कुछ नहीं सोचते। एसआइटी ने पिछले साल ही केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (सीएटी) को वानखेड़े के बारे में रिपोर्ट सौंप दी थी। फिर भी कार्रवाई में देर हुई। आर्यन खान की गिरफ्तारी के बाद मीडिया ने समीर वानखेड़े को न भूता न भविष्यति की तरह अफसर बताया था। अब जब उनके खिलाफ विदेश यात्राओं पर जाने, कीमती घड़ियां और कई भारी-भरकम खर्चे पर सीबीआइ की जांच चल रही है तो कोई कुछ नहीं बोल रहा। अब वानखेड़े का दांव उल्टा पड़ गया है। एसआइटी ने अपनी जांच में स्पष्ट कहा है कि वानखेड़े अपनी विदेश यात्रा के स्रोत की जानकारी नहीं दे पाए हैं। यह गंभीर मामला है और इसके लिए उन्हें कठोर से कठोर सजा मिलनी चाहिए।

संजय तिवारी | बनारस, उत्तर प्रदेश

 

पुरस्कृत पत्र: सही फैसले की जरूरत

12 जून की आवरण कथा, ‘24 की टिक टिक’ अच्छी है। लेकिन इस आवरण कथा पर पार्टियों को नहीं बल्कि जनता को ध्यान देना है। हर पार्टी के नेता आएंगे और अपने झोले से वादे निकालते जाएंगे। उनकी इसी जादूगरी के कारण जनता भांप ही नहीं पाती कि असली मुद्दा क्या है और उन्हें किसे चुनना है। टीवी पर चलने वाली अंतहीन बहसों, अखबारों में छपने वाली एकतरफा खबरों के बीच सही गलत का फैसला लेना ही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है। चुनावी रैलियों और उस वक्त चल रहे मुद्दों के बीच जनता पुरानी बातें लगभग भूल जाती है। यही वजह है कि गलत नेता संसद में पहुंचते हैं। कायदे से तो यह यह टिक टिक मतदाता के दिमाग में चले तो ही कुछ फायदा हो सकता है। वरना फिर वही ढाक के तीन पात।

सौरभ जोशी | देहरादून, उत्तराखंड